देश के सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर सुधार यानी वस्तु एवं सेवा कर (GST) के लागू होने के नौ साल बाद इसमें एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। कारोबारियों और निवेशकों के लिए यह राहत भरी खबर हो सकती है, क्योंकि टैक्स अधिकारियों के पास मौजूद गिरफ्तारी (Arrest) के अधिकारों को खत्म करने पर विचार किया जा रहा है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य निवेशकों के मन में विश्वास बढ़ाना और कर अधिकारियों के कथित रूप से अधिकारों के अतिरेक (overreach) को लेकर जताई जा रही चिंताओं को दूर करना है।
7 अक्टूबर को होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक पर टकटकी
आगामी 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के तहत अपराधों को अपराधमुक्त (decriminalise) करने के इस प्रस्ताव को प्रमुखता से उठाया जाएगा। पिछले आठ-नौ महीनों से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच इस मुद्दे पर लगातार उच्च स्तर पर बैठकें चल रही थीं। व्यापार जगत की तरफ से लगातार यह शिकायत मिल रही थी कि जीएसटी के तहत मिलने वाली गिरफ्तारी की शक्तियां कारोबार में एक बड़ी बाधा बन रही हैं और इसका इस्तेमाल कई बार उत्पीड़न के रूप में किया जाता है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यदि काउंसिल इस प्रस्ताव पर सहमति जताती है, तो संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इससे जुड़े विधाई संशोधन लाए जा सकते हैं। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वित्तीय धोखाधड़ी करने वाले बच जाएंगे। जानबूझकर किए जाने वाले गंभीर घोटालों और धोखाधड़ी के मामलों में अधिकारियों द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) के आपराधिक प्रावधानों के तहत ही कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारियां की जाएंगी, लेकिन सीधे जीएसटी कानूनों के तहत मिलने वाली यह शक्ति हटाई जा सकती है।
क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत?
जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से ही टैक्स प्रशासन फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) क्लेम करने और फर्जी बिल बनाने वाले गिरोहों से जूझता रहा है। केंद्रीय जीएसटी फॉर्मेशन द्वारा साल 2021-22 से 2024-25 के बीच सामने आए 72,393 मामलों में कुल 887 गिरफ्तारियां की गई थीं। इसमें राज्य के अधिकारियों द्वारा की गई गिरफ्तारियां शामिल नहीं हैं।
मौजूदा नियमों के तहत, सीजीएसटी अधिनियम की धारा 69 कमिश्नर की मंजूरी के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देती है। अधिकारियों के पास 'विश्वास करने के ठोस कारण' (reasons to believe) होने पर यह कार्रवाई की जाती थी। हालांकि, उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि ये प्रावधान कई बार उत्पीड़न का हथियार बन गए थे, खासकर सेवा क्षेत्र, बैंकिंग और बीमा सेक्टर में।
शुरुआत से ही उठती रही हैं आवाजें
जीएसटी के शुरुआती दौर में भी इन अधिकारों को लेकर कई राज्यों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। दिसंबर 2016 में हुई पांचवीं जीएसटी काउंसिल की बैठक के दौरान महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों ने गिरफ्तारी के प्रावधानों को लेकर चिंता जताई थी। उनका तर्क था कि इस तरह के प्रावधान 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (ease of doing business) की अवधारणा के अनुकूल नहीं हैं।
दूसरी ओर, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि कर चोरी करने वाले बेईमान लोगों से निपटने के लिए कड़े प्रावधान जरूरी हैं, जिससे कर अनुशासन बना रहे। लेकिन अब बदलते आर्थिक परिदृश्य और निवेशकों के सेंटीमेंट को ध्यान में रखते हुए सरकार इस दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है।
प्रत्यक्ष करों में भी हो चुका है बदलाव
यह केवल अप्रत्यक्ष करों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) के मोर्चे पर भी अपराधों को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने सितंबर महीने में ही कर वसूली के नियमों से गिरफ्तारी और हिरासत के प्रावधानों को 1 अप्रैल 2026 से पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospective effect) से हटा दिया है, जिससे टैक्स अधिकारियों को टैक्स डिफॉल्ट के मामलों में गिरफ्तारी करने से रोक दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जीएसटी कानून से भी गिरफ्तारी की शक्तियां हट जाती हैं, तो यह भारत में व्यापार करने के माहौल को और अधिक सुगम बनाएगा और कारोबारियों के मन से टैक्स आतंकवाद का डर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।