देश की सड़कों पर दौड़ती कैब और बाइक-टैक्सी में महिलाओं की सुरक्षा एक बार फिर से बहस के केंद्र में है।
सार्वजनिक परिवहन के साधनों में रोजाना सफर करने वाली लाखों महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा कदम उठाया है। हाल ही की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राइड-शेयरिंग प्लेटफॉर्म्स जैसे उबर और रैपिडो के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया है। अदालत का यह रुख साफ संकेत देता है कि महिला यात्रियों की सुरक्षा के मामले में अब किसी भी तरह की लापरवाही या कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
शहरी इलाकों में रोजाना सफर करने के लिए कैब और बाइक-टैक्सी आज के समय में परिवहन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं। ऑफिस जाने वाली कामकाजी महिलाओं से लेकर कॉलेज की छात्राओं तक, हर वर्ग की महिलाएं इन सेवाओं पर भारी मात्रा में निर्भर हैं। लेकिन हाल के दिनों में इन वाहनों के चालकों द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी और आपराधिक वारदातों की बढ़ती घटनाओं ने यात्रियों और उनके परिजनों को गहरी चिंता में डाल दिया है। इसी गंभीर पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए या संबंधित याचिका पर यह सख्त रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट की सख्ती: क्या हैं मुख्य बिंदु?
अदालत की इस कड़ी कार्रवाई के पीछे मुख्य उद्देश्य कैब और बाइक-टैक्सी सेवाओं के संचालन में सुरक्षा के नियमों को और अधिक कड़ा और पारदर्शी बनाना है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से जानना चाहा है कि यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वर्तमान में कंपनियों द्वारा कौन-कौन से सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है।
- ड्राइवरों और राइडर्स का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन कितना प्रभावी है?
- सफर के दौरान किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए ऐप में कौन से पैनिक बटन या फीचर्स मौजूद हैं?
- क्या सरकार द्वारा तय किए गए एग्रीगेटर नियमों का पूरी तरह से पालन हो रहा है या नहीं?
इन सभी बिंदुओं पर अदालत ने गहरी चिंता जताई है और संबंधित पक्षों को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कंपनियों की जवाबदेही और तकनीकी खामियां
उबर और रैपिडो जैसी बड़ी टेक-ड्रिवन मोबिलिटी कंपनियों का दावा हमेशा से यह रहा है कि वे यात्रियों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। इनमें लाइव जीपीएस ट्रैकिंग, राइड शेयरिंग डिटेल्स और 24/7 हेल्पलाइन सपोर्ट जैसी सुविधाएं शामिल हैं। हालांकि, ज़मीनी हक़ीकत कई बार इन दावों से कोसों दूर नजर आती है।
कई मामलों में यह देखा गया है कि ऐप पर रजिस्टर्ड ड्राइवर के बजाय कोई दूसरा व्यक्ति गाड़ी चला रहा होता है, जिसे सबलेटिंग या अकाउंट शेयरिंग कहा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सुरक्षा खतरा है, क्योंकि यदि कोई अप्रिय घटना घटती है, तो पुलिस के पास सही व्यक्ति का रिकॉर्ड नहीं पहुंच पाता। उच्च न्यायालय की इस सख्ती के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि इन कंपनियों को अपनी तकनीकी प्रणालियों और वेरिफिकेशन प्रोसेस में कड़े बदलाव करने होंगे ताकि ऐसे फर्जीवाड़े रोके जा सकें।
केंद्र सरकार और नियामक संस्थाओं की भूमिका
केवल निजी कंपनियों पर भरोसा करने के बजाय, इस पूरी व्यवस्था में सरकारी नियमन और सख्त निगरानी की भी उतनी ही जरूरत है। मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइन्स के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को कैब कंपनियों के संचालन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। बावजूद इसके, कई बार ग्राउंड लेवल पर इनका सख्ती से पालन होता नहीं दिखता है।
अदालत द्वारा केंद्र सरकार से जवाब मांगे जाने का अर्थ यह है कि सरकार को यह बताना होगा कि वह इन नियमों के क्रियान्वयन को लेकर कितनी गंभीर है। क्या कैब एग्रीगेटर्स पर लगाम कसने के लिए कोई नया और मजबूत फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है? क्या ड्राइवरों के लिए पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य रूप से समय-समय पर रिन्यू किया जाता है? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में देश के परिवहन ढांचे की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
यात्रियों के अधिकार और सुरक्षा के प्रति जागरूकता
कानूनी लड़ाई और अदालती कार्रवाइयों के बीच यह भी उतना ही जरूरी है कि आम नागरिक, विशेषकर महिला यात्री अपने अधिकारों और सुरक्षा उपायों के प्रति जागरूक रहें। सफर के दौरान कुछ सावधानियां बरतकर संभावित खतरों को काफी हद तक टाला जा सकता है:
- गाड़ी में बैठने से पहले हमेशा नंबर प्लेट और ऐप में दिए गए वाहन नंबर का मिलान करें।
- ड्राइवर की तस्वीर और ऐप में दिख रही उसकी प्रोफाइल को वेरिफाई करें।
- सफर के दौरान अपनी लाइव लोकेशन अपने किसी करीबी परिजन या दोस्त के साथ अवश्य साझा करें।
- यदि यात्रा के दौरान ड्राइवर का व्यवहार संदेहास्पद लगे या वह तय रूट से अलग रास्ता ले, तो तुरंत गाड़ी रुकवाएं और संबंधित कंपनी या पुलिस को सूचित करें।
- ऐप में दिए गए 'SOS' या पैनिक बटन का इस्तेमाल करने में बिल्कुल संकोच न करें।
आगे की राह: क्या बदलेंगे नियम?
उच्च न्यायालय के इस सख्त कदम से यह साफ हो गया है कि डिजिटल एग्रीगेटर कैब और बाइक-टैक्सी सेवाओं के लिए अब मनमानी करना आसान नहीं होगा। आने वाले हफ्तों में जब उबर, रैपिडो और केंद्र सरकार अपना जवाब कोर्ट के सामने रखेंगी, तो यह देखना बेहद दिलचस्प और अहम होगा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कौन से ठोस और दीर्घकालिक उपाय सुझाए जाते हैं।
यदि अदालत के निर्देशों के बाद कड़े नियम लागू होते हैं, तो न केवल देश के महानगरों बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी कैब और बाइक-टैक्सी का सफर महिलाओं के लिए काफी हद तक सुरक्षित हो सकेगा। तकनीक और कानून का यह तालमेल अंततः आम जनता के विश्वास को बहाल करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।