उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग और गन्ना किसानों से जुड़े एक बेहद अहम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने गन्ना आवंटन प्रक्रिया में बरती जा रही अनियमितताओं और भेदभावपूर्ण रवैये पर गहरी चिंता जताई है। बदायूं स्थित यदु शुगर लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने गन्ना आयुक्त को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रदेश की सभी चीनी मिलों को उनकी स्थापित और वास्तविक पेराई क्षमता के अनुपात में ही गन्ने का आवंटन किया जाए। अदालत के इस फैसले से राज्य के चीनी उद्योग जगत में एक नया और सकारात्मक संदेश गया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों पहुंचा कोर्ट?
यह पूरा कानूनी विवाद बदायूं जिले के सुजानपुर-बिसौली इलाके में स्थित यदु शुगर लिमिटेड की याचिका से जुड़ा हुआ है। इस मिल की स्थापित पेराई क्षमता प्रतिदिन 7,000 टन की है, जो इसे क्षेत्र की एक बड़ी औद्योगिक इकाई बनाती है। कंपनी ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया था कि राज्य के गन्ना आयुक्त द्वारा उसकी आवश्यकताओं की अनदेखी की जा रही है। याचिकाकर्ता के अनुसार, कार्यालय ज्ञापनों के तहत वर्ष 2025-30 के लिए कंपनी की कुल अनुमानित गन्ना आवश्यकता 100.80 लाख क्विंटल तय की गई थी, लेकिन इसके बावजूद उसे उसकी मांग और क्षमता के मुकाबले बेहद कम गन्ना मिल रहा था।
अदालत में न्यायमूर्ति जेने मुनिर और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने इस मामले की बेहद बारीकी से सुनवाई की। याचिकाकर्ता कंपनी के वकील दीपतिमान सिंह ने कोर्ट के समक्ष आंकड़े रखते हुए बताया कि राज्य की अन्य चीनी मिलों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि पिछले एक दशक में मिल की गन्ना आवश्यकता या मांग में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आई है, फिर भी अधिकारियों की मनमानी नीति के कारण आवंटन में भारी कटौती की गई।
सात मिलों को पूरा आवंटन, यदु शुगर के साथ भेदभाव का आरोप
याचिका में उठाए गए सबसे गंभीर बिंदुओं में से एक यह था कि उत्तर प्रदेश की कुल आठ प्रमुख चीनी मिलों में से सात मिलों को उनकी अनुमानित आवश्यकता के मुकाबले 100 प्रतिशत या उससे भी अधिक मात्रा में गन्ने का आवंटन किया गया। इसके विपरीत, यदु शुगर लिमिटेड को उसकी जरूरत से बहुत कम मात्रा दी गई, जिससे मिल का संचालन संकट में पड़ गया।
अदालत में पेश किए गए आंकड़ों और राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए गए चार्ट के विश्लेषण से यह साफ हुआ कि आवंटन की प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से असमानता बरती गई है। कम मात्रा में गन्ना मिलने के कारण मिल के 'ड्रॉल प्रतिशत' में भारी गिरावट दर्ज की गई। नतीजतन, लगातार चार से पांच साल तक वित्तीय घाटे का सामना करने के बाद प्रबंधन को मजबूरी में अपनी मिल का संचालन बंद करना पड़ गया।
मौजूदा औद्योगिक इकाइयों को बचाना सरकार का दायित्व: कोर्ट
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक कल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा को रेखांकित करते हुए बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि एक कल्याणकारी सरकार और उसके प्रशासकों की नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे न केवल नए उद्योगों और मिलों के लिए रास्ते खुले रहें, बल्कि राज्य में पहले से ही स्थापित और कार्यरत मौजूदा चीनी मिलों को भी बचाया जा सके।
कोर्ट ने माना कि यदि मौजूदा मिलें घाटे के कारण बंद होती हैं, तो इसका सीधा असर क्षेत्र के हजारों किसानों की आजीविका, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार तथा राज्य के कुल औद्योगिक उत्पादन पर पड़ता है। इसलिए प्रशासनिक स्तर पर ऐसा कोई भी निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए जो किसी एक इकाई को अनुचित लाभ पहुंचाए और दूसरी को दिवालिया होने की कगार पर धकेल दे।
पारदर्शी और समान अवसर की उम्मीद
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में गन्ने के आवंटन की पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तर्कसंगत और निष्पक्ष होगी। अदालत के निर्देशों से उन सभी छोटी और मझोली मिलों को एक नई कानूनी उम्मीद मिली है जो कथित तौर पर प्रशासनिक प्राथमिकताओं के चलते भेदभाव का शिकार हो रही थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गन्ना विभाग इस आदेश का कड़ाई से पालन करता है, तो इससे न केवल मिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित होगी, बल्कि गन्ना किसानों को भी अपनी उपज का उचित मूल्य और समय पर भुगतान मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। यह फैसला साल 2026 के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश के कृषि और उद्योग क्षेत्र के संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकता है।