पुणे महानगरपालिका (मनपा) की हालिया सामान्य सभा में उस वक्त माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया, जब शहर की एक प्रमुख और व्यस्त सड़क पर लगातार हो रहे हादसों का मुद्दा सदन के पटल पर रखा गया। कात्रज-कोंढवा मार्ग पर पिछले कुछ समय में हुई त्रासदियों, विशेषकर एक 16 वर्षीय युवती की असमय मौत ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। इस गंभीर घटना के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के पार्षदों ने मिलकर प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
कात्रज-कोंढवा मार्ग बना मौत का कुआँ: अब तक 21 जिंदगियां खत्म
मनपा की नई इमारत में स्थित 'हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक श्री छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह' में आयोजित सामान्य सभा की कार्यवाही शुरू होते ही कात्रज-कोंढवा सड़क का मुद्दा छा गया। कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और शिवसेना (ठाकरे गुट) के 50 से अधिक पार्षदों ने इस चर्चा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पार्षदों का आरोप है कि इस सड़क का निर्माण कार्य पिछले कई वर्षों से कछुए की गति से चल रहा है और इसके चलते यह मार्ग आम नागरिकों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।
सदन में आंकड़े रखते हुए पार्षदों ने दावा किया कि इस अधूरी सड़क और लचर यातायात प्रबंधन के कारण अब तक 20 से 21 लोगों की जान जा चुकी है। निर्माण स्थल पर ठेकेदारों द्वारा किसी भी प्रकार के सुरक्षा मानक, जैसे कि बैरिकेडिंग, चेतावनी संकेत या लाइटिंग की व्यवस्था नहीं की गई है, जिसके चलते रात के अंधेरे में वाहन चालक अक्सर गंभीर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।
महापौर मंजूषा नागपुरे का कड़ा रुख और प्रशासनिक नाकामी
सभा की अध्यक्षता कर रहीं महापौर मंजूषा नागपुरे ने इस पूरे मामले पर प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने तीन महीने पहले दिए गए उस आदेश की याद दिलाई, जिसके तहत अधिकारियों को अपनी कार्यशैली में सुधार लाने और जमीन पर उतरकर स्थिति का जायजा लेने को कहा गया था। महापौर के तीखे तेवरों से साफ जाहिर हो रहा था कि पिछले आदेशों को कागजों तक ही सीमित रखा गया और धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
महापौर ने अधिकारियों से पूछा कि उनके पिछले निर्देशों का पालन करने में इतनी ढिलाई क्यों बरती गई? क्या शहर की जनता की सुरक्षा अधिकारियों की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं है?
तीन महीने पुराने आदेश पर उठे सवाल: क्या कागजों में सिमट गई व्यवस्था?
बता दें कि लगभग तीन महीने पहले शहर अभियंता कार्यालय की ओर से एक विशेष निर्देश जारी किया गया था। इसके तहत क्षेत्रीय कार्यालयों के अधिकारियों को यह आदेश दिया गया था कि वे प्रतिदिन सुबह के वक्त दो घंटे अपने-अपने क्षेत्र की सड़कों का अनिवार्य रूप से निरीक्षण करें। यही नहीं, अधिकारियों को चार पहिया वाहनों के आराम को छोड़कर दोपहिया वाहनों से सड़कों के गड्ढों और वास्तविक स्थिति का जायजा लेने को कहा गया था, ताकि हर एक कमी की सटीक रिपोर्ट प्रशासन तक पहुंच सके।
सामान्य सभा के दौरान महापौर ने इसी आदेश की वर्तमान स्थिति पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने प्रशासन से यह सवाल किया कि:
- कितने अधिकारियों ने वास्तव में रोजाना दो घंटे सड़कों पर बिताए?
- कितने जिम्मेदारों ने कार के बजाय दोपहिया वाहन से सड़क की जमीनी हकीकत को परखा?
- इस निरीक्षण की तथ्यात्मक और लिखित रिपोर्ट अब तक क्यों प्रस्तुत नहीं की गई?
शहर अभियंता का गोलमोल जवाब और पार्षदों की नाराजगी
सदन में बढ़ते दबाव को देखते हुए पुणे महानगरपालिका के शहर अभियंता अनिरुद्ध पावसकर ने लगभग पौन घंटे तक प्रशासन का पक्ष रखने का प्रयास किया। उन्होंने शहर के विभिन्न हिस्सों में ट्रैफिक जाम की समस्या को सुलझाने के लिए चल रही परियोजनाओं और भविष्य की योजनाओं का एक लंबा-चौड़ा खाका पेश किया।
हालांकि, उनके इस जवाब से न तो पार्षद संतुष्ट हुए और न ही महापौर। सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि शहर अभियंता यह स्पष्ट नहीं कर सके कि ये तमाम प्रस्तावित परियोजनाएं जमीन पर उतरेंगी कब? इसके अलावा, महापौर द्वारा पूछे गए चार प्रमुख और सीधे सवालों पर भी प्रशासन की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया, जिससे सदन में असंतोष और अधिक बढ़ गया।
महापौर द्वारा पूछे गए चार अहम सवाल
प्रशासन की टालमटोल रवैया को देखते हुए महापौर मंजूषा नागपुरे ने नगरसेवकों की मांगों का समर्थन करते हुए चार मुख्य मुद्दों पर स्पष्ट और बिंदुवार उत्तर देने का निर्देश दिया:
- नए गांवों में बुनियादी सुविधाएं: मनपा सीमा में हाल ही में शामिल किए गए नए गांवों में सड़क, फुटपाथ और अन्य जरूरी नागरिक सुविधाएं विकसित करने के लिए कुल कितनी निधि (फंड) की आवश्यकता है?
- बजट प्रावधान: चालू वित्त वर्ष के वार्षिक बजट में इसके लिए कितनी राशि का प्रावधान किया गया है और क्या वह पर्याप्त है?
- एक साथ निर्माण की संभावना: क्या पर्याप्त फंड और संसाधनों के अभाव के बावजूद एक साथ सभी सड़कों का निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है, या इसकी कोई क्रमिक योजना है?
- रखरखाव का खर्च: वर्तमान समय में शहर में पहले से मौजूद सड़कों की मरम्मत और उनके नियमित रखरखाव के लिए कुल कितने कोष की जरूरत होगी? इसकी विस्तृत वित्तीय रिपोर्ट पेश की जाए।
आगे की राह: जनता की सुरक्षा सर्वोपरि
पुणे की सड़कों की बदहाली और प्रशासनिक सुस्ती ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब तक जनप्रतिनिधि कड़ा रुख नहीं अपनाएंगे, तब तक आम जनता की जान की कीमत पर चलने वाली लापरवाही का यह सिलसिला थमता नजर नहीं आएगा। कात्रज-कोंढवा सड़क का यह मामला अब केवल एक राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि शहर के हर उस नागरिक की सुरक्षा का बन चुका है जो रोज इन सड़कों से गुजरता है। अब देखना यह होगा कि मनपा प्रशासन महापौर के कड़े सवालों और पार्षदों के अल्टीमेटम के बाद कितनी जल्दी जमीनी स्तर पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करता है।