देशभर में 14 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस अत्यंत उत्साह और ऊर्जा के साथ मनाया जा रहा है। इसी क्रम में झारखंड की राजधानी रांची में भी एक भव्य और प्रेरणादायक आयोजन देखने को मिला। दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के प्रमंडलीय राजभाषा कार्यालय में आयोजित इस विशेष समारोह में देश के जाने-माने साहित्यकार, कवि, प्रशासनिक अधिकारी और प्रबुद्ध नागरिक एकत्र हुए। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री का वह दूरदर्शी संबोधन रहा, जिसमें उन्होंने हिंदी भाषा को केवल संवाद और साहित्य तक सीमित रखने के बजाय इसे विज्ञान, तकनीकी नवाचार (Innovation) और रोजगार से जोड़ने की पुरजोर वकालत की।
कपूर से कन्याकुमारी तक एकता का मजबूत सूत्र
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत देश की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई एकता के ताने-बाने से की। उन्होंने कहा कि हिंदी महज एक भाषा नहीं है, बल्कि यह कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक पूरे भारत को एक अदृश्य और मजबूत सूत्र में पिरोती है।
उन्होंने आगे कहा कि जब हम अपनी मातृभाषा में सोचते और बात करते हैं, तो यह सिर्फ विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय एकता, अखंडता और भावात्मक एकजुटता की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हिंदी ने देश को हर मोड़ पर एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाई है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में मौलिकता की चुनौती
आज का दौर तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) का दौर है। इस आधुनिक परिदृश्य पर चिंता और संभावना दोनों व्यक्त करते हुए उपायुक्त भजंत्री ने एक बेहद अहम मुद्दा उठाया। उन्होंने रेखांकित किया कि आज के इस एआई-प्रधान युग में मौलिक सोच और भाषा की समृद्धि को बचाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि यदि हमें आने वाली पीढ़ी को तकनीकी रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाना है, तो उनकी स्कूली शिक्षा और पठन-पाठन मातृभाषा में होना चाहिए। मातृभाषा में अध्ययन करने से किशोरों और युवाओं के भीतर वैज्ञानिक सोच (Scientific Temperament) का स्वाभाविक विकास होता है, जो उन्हें रटन विद्या से दूर कर मौलिक अन्वेषण की ओर प्रेरित करता है.
विज्ञान, शोध और रोजगार से जुड़े हिंदी
आधुनिक समय की मांग को समझते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब समय आ गया है जब हमें हिंदी को केवल कवि सम्मेलनों, गजलों या कहानियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे विज्ञान, तकनीकी शोध, और रोजगार के अवसरों के साथ बड़े पैमाने पर जोड़ा जाना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने उपस्थित तमाम सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से भी यह आह्वान किया कि वे अपने दैनिक प्रशासनिक कामकाज में हिंदी के प्रयोग को और अधिक बढ़ाएं। जब सरकारी नीतियां, तकनीकी शोध और रोजगार के नए अवसर हिंदी में सुलभ होंगे, तभी देश का आम नागरिक真正 अर्थों में विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेगा।
दीप प्रज्ज्वलन और गरिमामयी उपस्थिति
इस भव्य कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर और अतिथियों के स्वागत-सत्कार के साथ की गई। समारोह का कुशल संचालन उप निदेशक, राजभाषा रविशंकर मिश्रा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्रशासनिक महकमे के कई दिग्गज अधिकारी मौजूद रहे, जिनमें दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त के सचिव रविंद्र कुमार गगराई, रांची सदर एसडीओ कुमार रजत, अपर जिला दंडाधिकारी (विधि-व्यवस्था) धनंजय, अपर समाहर्ता रामनारायण सिंह, उप परिवहन आयुक्त अजय कुमार रजक और उप निर्वाचन पदाधिकारी बिवेक सुमन प्रमुख रूप से शामिल थे। इन अधिकारियों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि प्रशासन भी मातृभाषा के प्रचार-प्रसार और उसके व्यावहारिक उपयोग के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
कवियों की कविताओं ने बांधा समां
विचारों के इस बौद्धिक आदान-प्रदान के बाद कार्यक्रम का सांस्कृतिक और साहित्यिक सत्र शुरू हुआ, जिसने पूरे माहौल को जीवंत बना दिया। एक शानदार कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें देश और क्षेत्र के नामचीन रचनाकारों ने अपनी कविताओं से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस कवि सम्मेलन में अपनी रचनाओं का पाठ करने वाले प्रमुख रचनाकारों में शामिल थे:
- डॉ. जंगबहादुर पांडेय
- डॉ. राजश्री जयंती
- डॉ. सुरिंदर कौर नीलम
- नसीर अफसर
- नरेश कुमार बंका
- शालिनी नायक
- सदानंद सिंह यादव
- सूरज श्रीवास्तव
- डॉ. रजनी शर्मा 'चन्दा'
- डॉ. विनोद सिंह गहरवार
इन कवियों की कविताओं में जहां एक ओर देशप्रेम और सामाजिक सरोकार की महक थी, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर चित्रण भी देखने को मिला।
सकारात्मक संदेश के साथ समापन
कार्यक्रम का समापन दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त के सचिव रविंद्र कुमार गगराई के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने इस सफल आयोजन के लिए सभी अतिथियों, कवियों, अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
यह आयोजन इस बात का सुबूत है कि हिंदी केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत की तकनीकी, वैज्ञानिक और आर्थिक प्रगति की रीढ़ बनने की पूरी क्षमता रखती है। बस जरूरत है तो इसे सही दिशा में आधुनिक संदर्भों के साथ ढालने की।