झारखंड की राजधानी रांची की सड़कों पर गूंजता छात्रों का यह स्वर सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन भर नहीं था, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ शंखनाद था, जो युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) की नियुक्ति प्रक्रियाओं में कथित धांधली, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध पिछले कई दिनों से सुलग रही चिंगारी ने शुक्रवार को एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले लिया। राज्यभर के चौबीस जिलों का लंबा सफर तय करने के बाद आखिरकार 'भर्ती व्यवस्था सुधार यात्रा' का समापन रांची की ऐतिहासिक धरती पर हुआ। लेकिन इस समापन को लेकर छात्रों और युवा नेताओं के तेवर यह साफ बयां कर रहे हैं कि यह किसी अंत की शुरुआत नहीं, बल्कि एक लंबी लड़ाई का नया अध्याय है।
बापू वाटिका से अल्बर्ट एक्का चौक तक निकला आक्रोश मार्च
शुक्रवार को इस राज्यव्यापी यात्रा के 18वें और अंतिम दिन राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान स्थित बापू वाटिका से इस पदयात्रा की भव्य शुरुआत हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद हजारों की संख्या में प्रतियोगी छात्र, युवा और विभिन्न जिलों से पहुंचे अभ्यर्थी सड़कों पर उतरे। हाथों में तख्तियां लिए और न्याय की मांग करते ये युवा जब आगे बढ़े, तो पूरा प्रशासनिक अमला भी मुस्तैद हो गया।
यह पदयात्रा मोरहाबादी से निकलकर रेडियम रोड के रास्ते सीधे अल्बर्ट एक्का चौक पर पहुंची। यहां देश के महान सपूत और परमवीर चक्र विजेता शहीद अल्बर्ट एक्का की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया गया। इस दौरान राजधानी के मुख्य मार्गों पर युवाओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिसके कारण कुछ समय के लिए यातायात भी प्रभावित हुआ। हालांकि, आम नागरिकों ने भी इस यात्रा के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए छात्रों का हौसला बढ़ाया। अल्बर्ट एक्का चौक से होते हुए यह कारवां कोकर स्थित भगवान बिरसा मुंडा की समाधि स्थल की ओर बढ़ा। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ ही इस बहुप्रतीक्षित राज्यव्यापी 'भर्ती सुधार यात्रा' का विधिवत समापन किया गया।
'आंदोलन खत्म नहीं हुआ, यह तो बस एक शुरुआत है'
समापन समारोह के दौरान अल्बर्ट एक्का चौक पर एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए युवा नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सरकार और व्यवस्था को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही इस चरण की यात्रा पूरी हो चुकी है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि छात्रों का आंदोलन समाप्त हो गया है।
"छात्रों की यह यात्रा संपन्न हुई है, लेकिन हमारा आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। सरकार को अपने वादों के मुताबिक नियुक्ति परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं से जुड़े तमाम ठोस साक्ष्य अदालत के समक्ष मजबूती से रखने होंगे। इसके साथ ही, इस पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की अनुशंसा करते हुए पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।" - देवेंद्र नाथ महतो
उन्होंने जोर देकर कहा कि पिछले कई दिनों के दौरान इस यात्रा के माध्यम से राज्य के कोने-कोने में मौजूद युवाओं, बेरोजगारों और आम जनता तक यह संदेश पहुंचाया गया है कि भ्रष्टाचारयुक्त व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार को अब कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि युवाओं की यह आवाज अब दबने वाली नहीं है।
क्यों पड़ी इस राज्यव्यापी यात्रा की जरूरत?
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब न्यायालय में विभिन्न परीक्षाओं से जुड़ी धांधली और अनियमितताओं के साक्ष्यों को प्रस्तुत करने के मामले में सरकार की कथित उदासीनता सामने आई। इस सुस्त रवैये और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ ही इस राज्यव्यापी पदयात्रा का खाका खींचा गया था।
इस यात्रा की शुरुआत झारखंड के राजनीतिक और वैचारिक इतिहास में विशेष महत्व रखने वाली भूमि यानी दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जन्मस्थली नेमरा से की गई थी। नेमरा से शुरू होकर यह यात्रा झारखंड के सभी 24 जिलों के सुदूर इलाकों से गुजरी। इस दौरान न सिर्फ शहरों में बल्कि ग्रामीण अंचल के युवाओं को भी एकजुट किया गया और परीक्षा सुधारों को लेकर एक मजबूत जनमत तैयार किया गया।
युवाओं की भारी भागीदारी और भविष्य की रणनीति
इस पूरी यात्रा की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसमें किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं, बल्कि केवल और केवल हक और अधिकार की मांग करने वाले प्रतियोगी छात्रों का जनसैलाब नजर आया। रांची, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, पलामू, संथाल परगना और कोल्हान समेत हर क्षेत्र से आए युवा इस मुहीम से जुड़ते चले गए। दिन-रात लाइब्रेरी में बैठकर अपनी किस्मत आजमाने वाले ये छात्र अब सड़क पर उतरकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने को मजबूर हैं, जो कि वर्तमान व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
आगे क्या होगा?
- न्यायिक लड़ाई: छात्र और उनके प्रतिनिधि न्यायालय में मजबूती से पक्ष रखने के लिए कानूनी विशेषज्ञों के संपर्क में हैं।
- सीबीआई जांच की मांग: राज्य की सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी की केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग पर छात्र अड़े हुए हैं।
- पारदर्शी कैलेण्डर: परीक्षाओं का एक निश्चित और पारदर्शी कैलेंडर जारी करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।
बहरहाल, रांची में भले ही इस यात्रा का समापन हो गया हो, लेकिन इसके सियासी और सामाजिक गलियारों में दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। झारखंड का युवा अब जाग चुका है और उसकी नजरें पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि सरकार आने वाले दिनों में इन मांगों पर क्या और कितना ठोस कदम उठाती है। एक बात बिल्कुल साफ है—भर्ती सुधार की यह मांग अब केवल कुछ छात्रों की आवाज नहीं, बल्कि पूरे राज्य के नौनिहालों के भविष्य का अहम सवाल बन चुकी है।