रांची के जैन समाज में इन दिनों अध्यात्म और आत्मशुद्धि की बयार बह रही है। जैन धर्मावलंबियों के सबसे बड़े महापर्व पर्युषण के पांचवें दिन को विशेष रूप से 'अहिंसा दिवस' के रूप में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। श्री साधुमार्गी जैन संघ के तत्वावधान में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान ने शहर के आध्यात्मिक वातावरण को पूरी तरह से सराबोर कर दिया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने मन, वचन और कर्म से अहिंसा के पालन पर विशेष जोर दिया।
अहिंसा केवल एक विचार नहीं, जीने की कला है
धार्मिक अनुष्ठान के दौरान स्वाध्यायी वक्ता पुष्पा ओस्तवाल और ज्योति ओस्तवाल ने अपने प्रेरणादायी प्रवचनों से उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पुष्पा ओस्तवाल ने अहिंसा के गूढ़ रहस्यों को समझाते हुए कहा कि अहिंसा को केवलता किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि यह जीवन जीने की एक उत्कृष्ट कला है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में होने वाली सूक्ष्म से सूक्ष्म हिंसा के प्रति भी सचेत रहना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक अहिंसा वही है जिसमें मन में किसी के प्रति बुरा विचार न आए, वचन से किसी को ठेस न पहुँचे और कर्म से किसी जीव को कष्ट न हो।
पौराणिक कथाओं के माध्यम से धर्म और करुणा का पाठ
प्रवचन सत्र को अधिक प्रभावी बनाते हुए वक्ताओं ने प्राचीन कथाओं का सुंदर उदाहरण दिया। अर्जुन माली की कथा का जिक्र करते हुए उन्होंने अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े होने और सदैव धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। इसके साथ ही, चंडकौशिक सर्प के प्रसिद्ध प्रसंग के जरिए भगवान महावीर की असीम करुणा और अहिंसा की जादुई शक्ति को जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम में सुदर्शन श्रावक की कथा का भी विशेष उल्लेख किया गया, जिसके माध्यम से श्रद्धालुओं को अटूट श्रद्धा, संयम और धर्मनिष्ठा का संदेश दिया गया। वक्ताओं का मुख्य उद्देश्य यही था कि लोग धर्म को केवल सुनें या मानें नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण और व्यवहार में उतारें।
आगार और अनागार धर्म की रूपरेखा
इस अवसर पर भगवान महावीर द्वारा बताए गए आगार और अनागार धर्म की विस्तृत चर्चा की गई। उपस्थित विद्वानों ने समझाया कि:
- आगार धर्म: यह गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए है, जो दैनिक भागदौड़ के बीच संयम, नैतिकता और अहिंसा का पालन करने की प्रेरणा देता है।
- अनागार धर्म: यह पूर्णतः साधु-साध्वियों के लिए है, जो संसार का पूर्ण त्याग कर कठिन संयम और साधना के मार्ग पर चलते हैं।
यह पर्व हर व्यक्ति को आत्मचिंतन का अवसर देता है ताकि वह अपने जीवन को अधिक संयमित, करुणामय और अहिंसक बना सके।
तपस्वियों की साधना और समाज की सहभागिता
पर्युषण महापर्व के इन दिनों में तप-साधना का दौर भी चरम पर है। इस विशेष अवसर पर विशाल दसानी, खुशबू दसानी, पूजा बोहरा, पायल कोठारी और ममता पिंचा जैसे कई निष्ठावान तपस्वियों द्वारा की जा रही कठोर तपस्या की उपस्थिति सभी श्रावक-श्राविकाओं ने सराहना की। समाज के लोगों ने तपस्वियों के इस त्याग की अनुमोदना करते हुए उनके आत्मकल्याण और उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना की।
इस धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में श्री साधुमार्गी जैन संघ के प्रमुख पदाधिकारियों और सदस्यों की सक्रिय भूमिका रही। कार्यक्रम में राजेश पींचा, अशोक सुराणा, कोमल गेलड़ा, प्रकाश नहाटा, जय पींचा, सुमन बच्छावत और करुणा चोरड़िया सहित सैकड़ों की संख्या में गणमान्य नागरिक और जैन धर्मावलंबी उपस्थित रहे, जिन्होंने पूरे अनुशासन के साथ धर्म लाभ लिया।