दुनियाभर में जब भी अर्थव्यवस्था और वित्तीय लेन-देन की बात होती है, तो भारत का नाम हमेशा एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आता है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष एजेंसी की रिपोर्ट ने भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत को एक बार फिर वैश्विक मंच पर साबित कर दिया है। पिछले एक दशक के भीतर भारत में विदेशों से आने वाले पैसों यानी रेमिटेंस (Remittance) के आंकड़ों में ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला है। यह उछाल सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह विदेशों में बसने वाले भारतवंशियों के पसीने, उनकी मेहनत और अपनी माटी के प्रति अटूट प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल है।
एक दशक में ढाई गुना बढ़ा विदेशों से मिलने वाला धन
अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) द्वारा जारी की गई ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को विदेशों से मिलने वाला रेमिटेंस साल 2016 के मुकाबले ढाई गुना से ज्यादा बढ़ चुका है। आंकड़े बताते हैं कि जहां एक दशक पहले यानी 2016 में यह राशि लगभग 63 अरब डॉलर हुआ करती थी, वहीं अब यह बढ़कर सीधे 151 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गई है।
यह बढ़ोतरी अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। दुनिया के कई विकासशील देश आज आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में भारत की यह उपलब्धि दर्शाती है कि यहाँ का प्रवासी वर्ग न केवल अपने परिवारों को आर्थिक संबल दे रहा है, बल्कि देश की कुल जीडीपी और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को भी मजबूत कर रहा है।
वैश्विक स्तर पर क्या है तस्वीर?
केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी रेमिटेंस के प्रवाह में बड़ा बदलाव आया है। आईएफएडी (IFAD) की रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि दुनिया के तमाम हिस्सों में काम करने वाले प्रवासी कामगार अपने गृह देशों को भारी-भरकम राशि भेज रहे हैं। हालांकि, इस वैश्विक दौड़ में भारत ने अन्य सभी देशों को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष स्थान पर अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों (Middle East) के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के अन्य विकसित देशों में बसने वाले कुशल भारतीय पेशेवर (White-collar professionals) इस रेमिटेंस का एक बहुत बड़ा हिस्सा भेज रहे हैं। इसके साथ ही, ब्लू-कॉलर जॉब्स में काम करने वाले हमारे कामगारों का योगदान भी इसमें अतुलनीय रहा है।
आधार और यूपीआई (UPI) की क्रांतिकारी भूमिका
विदेशों से आने वाले इस धन के प्रबंधन और सीधे लाभार्थियों तक पहुँचने में तकनीक ने एक गेम-चेंजर की भूमिका निभाई है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर ने जिस रफ्तार से प्रगति की है, उसने पूरे सिस्टम को पारदर्शी और सुगम बना दिया है।
- डिजिटल पेमेंट्स का विस्तार: भारत के यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) ने सीमा पार से होने वाले लेन-देन को बेहद आसान बना दिया है। कई देशों के साथ यूपीआई के एकीकरण से पैसे भेजना और पाना अब कुछ ही सेकंड का खेल रह गया है।
- आधार कार्ड की ताकत: आधार आधारित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और मजबूत डिजिटल पहचान प्रणाली ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रवासियों द्वारा भेजा गया पैसा बिचौलियों के हाथ में जाने के बजाय सीधे उनके परिजनों के बैंक खातों तक सुरक्षित पहुंचे।
- औपचारिक चैनलों को बढ़ावा: तकनीकी सुगमता के कारण अब लोग हवाला या अन्य अवैध माध्यमों के बजाय औपचारिक बैंकिंग चैनलों का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं।
अर्थव्यवस्था पर इसके दूरगामी प्रभाव
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना उसकी रीढ़ की हड्डी जैसा होता है। 151 अरब डॉलर का यह रेमिटेंस प्रवाह भारत के लिए कई मायनों में बेहद खास है:
सबसे पहले, यह ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बढ़ाता है। विदेशों से आने वाला यह पैसा अक्सर सीधे परिवारों के पास जाता है, जिससे वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में खपत बढ़ती है, निर्माण कार्यों को बढ़ावा मिलता है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
दूसरे, यह देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit - CAD) को पाटने में सरकार और केंद्रीय बैंक (RBI) की बड़ी मदद करता है। जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं या अन्य कारणों से आयात महंगा होता है, तो यह मजबूत रेमिटेंस कुशन का काम करता है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
भले ही आज आंकड़े बेहद उत्साहजनक नजर आ रहे हैं, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक हालात, मंदी की आशंकाएं और खाड़ी देशों में श्रम कानूनों में होने वाले बदलाव भविष्य में कुछ चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं। हालांकि, भारतीय प्रवासी जिस तेजी से अपनी योग्यता के बल पर उच्च पदों पर काबिज हो रहे हैं और तकनीकी रूप से देश का सिस्टम मजबूत हो रहा है, उसे देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में यह ग्राफ और ऊपर ही जाएगा।
यह सफलता सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों सपनों की जीत है जो अपने घरों से कोसों दूर सात समंदर पार मेहनत की रोटी कमाते हैं, लेकिन उनका दिल हमेशा अपनी मातृभूमि के लिए धड़कता है। 151 अरब डॉलर का यह मुकाम इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत और उसके प्रवासियों का यह अटूट रिश्ता हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है।