देशभर में अपनी स्वच्छता के लिए सातवें आसमान पर रहने वाला इंदौर शहर इन दिनों एक अजीब और अप्रत्याशित दौर से गुजर रहा है। जिस शहर की गलियों और सड़कों को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते थे, आज उसी शहर की फिजा में कचरे की बदबू घुलने लगी है। वजह साफ है—नगर निगम के सफाई कर्मचारी अपनी पांच सूत्रीय मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ चुके हैं। इस हड़ताल का सीधा और गहरा असर शहर की सड़कों पर दिखने लगा है, जहां जगह-जगह कचरे के पहाड़ खड़े हो गए हैं।
नेहरू नगर से लेकर शहर के कई हिस्सों में पसरा कचरा
हड़ताल के पहले ही दिन से शहर की सफाई व्यवस्था चरमरा गई है। नेहरू नगर और उसके आसपास के इलाकों का हाल सबसे बुरा है। आमतौर पर सुबह सवेरे गलियों में झाड़ू की सरसराहट और कचरा गाड़ी की घंटी सुनाई देती थी, लेकिन इन दिनों वहां केवल कचरे के बिखरे हुए ढेर नजर आ रहे हैं।
स्थानीय रहवासियों का कहना है कि नियमित रूप से कचरा कलेक्शन न होने के कारण स्थिति हाथ से निकलती जा रही है। चिलचिलाती धूप और गर्मी के इस मौसम में खुले में पड़े कचरे से उठने वाली सड़न और बदबू ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। बच्चों और बुजुर्गों का घर से बाहर निकलना तक दूभर हो गया है, और मक्खी-मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगा है।
आखिर क्या हैं सफाई कर्मचारियों की पांच सूत्रीय मांगें?
सफाई व्यवस्था को देश में एक नया आयाम देने वाले ये कर्मचारी आज अपनी बुनियादी और वाजिब मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। कर्मचारियों की मुख्य पांच सूत्रीय मांगों में वेतन विसंगतियों को दूर करना, नियमितीकरण, समय पर पारिश्रमिक, और स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा उपकरण शामिल हैं।
कर्मचारियों का रोष इस बात को लेकर है कि लगातार प्रशासन के सामने अपनी बातें रखने के बावजूद उनकी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। मजबूरन उन्हें काम का बहिष्कार करना पड़ा, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर आम जनता और शहर की प्रतिष्ठा को भुगतना पड़ रहा है।
नंबर वन शहर की साख पर लगा दाग?
स्वच्छता सर्वेक्षण में लगातार नंबर वन का ताज पहनने वाला इंदौर अपनी कार्यशैली और मैनेजमेंट के लिए जाना जाता है। नगर निगम हर साल अपनी पीठ थपथपाता है कि इंदौर का कचरा प्रबंधन मॉडल देश का सबसे बेहतरीन मॉडल है। लेकिन इस मौजूदा संकट ने एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी शहर की स्वच्छता केवल मशीनों और विज्ञापनों से चल सकती है, या उसकी असली रीढ़ वे सफाईकर्मी हैं जो जमीन पर मेहनत करते हैं?
यदि शहर की इस रीढ़ यानी सफाई कर्मचारियों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं किया गया, तो यह नंबर वन का तमगा कागजी साबित होने में देर नहीं लगेगी। जनता अब यह पूछने लगी है कि करोड़ों रुपये के स्वच्छता अभियानों के बावजूद क्या एक प्रशासनिक नाकामी के कारण शहर को इस स्थिति में पहुंचना ही था?
ग्राउंड जीरो पर उतरी टीम: क्या है जमीनी हकीकत?
नगर निगम के दावों और जमीनी हकीकत के बीच जमीन-आसमान का फर्क साफ देखा जा सकता है। एक तरफ जहां निगम के अधिकारी लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जा रही हैं और सफाई व्यवस्था को ठप नहीं होने दिया जाएगा, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
ग्राउंड जीरो पर हमारी पड़ताल के दौरान यह सामने आया कि वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है। अधिकांश वार्डों में गाड़ियां या तो पहुंची ही नहीं, या फिर कर्मचारियों के अभाव में वे आधे-अधूरे रास्ते से ही लौट गईं। यदि यह हड़ताल आने वाले कुछ और दिनों तक यूं ही जारी रही, तो स्थिति महामारी का रूप भी ले सकती है क्योंकि बारिश या गर्मी के दिनों में कचरे का सड़ना शहर के स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।
प्रशासन और कर्मचारियों के बीच कब टूटेगा गतिरोध?
फिलहाल नगर निगम के उच्च अधिकारी और कर्मचारी संघ के प्रतिनिधियों के बीच दौर की बातचीत जारी है। अधिकारी मामले को सुलझाने और कर्मचारियों को मनाने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कर्मचारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। जब तक कोई ठोस और लिखित समझौता नहीं हो जाता, तब तक काम पर लौटने की संभावना कम ही नजर आ रही है।
इंदौर की जनता को अब उस पल का इंतजार है जब शहर की फिजा एक बार फिर से साफ-सुथरी होगी और सड़कों पर कचरे के बजाय स्वच्छता की वही पुरानी चमक वापस लौटेगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर सिखा दिया है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता में हर एक निचले स्तर के कर्मचारी की भूमिका कितनी अहम होती है, जिसे कभी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।