न्याय की देवी की आंख भले ही पट्टी से बंधी हो, लेकिन समाज में हो रहे अन्याय को भांपने के लिए उसकी नजरें बेहद पैनी होती हैं। बिहार की न्यायपालिका ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कागजी पेचीदगियों और तकनीकी अड़चनों की आड़ में किसी के हक को छीना नहीं जा सकता। पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो प्रशासनिक सुस्ती और अधिकारियों के दोहरे रवैये पर सीधा तमाचा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केवल गोदनामे (Adoption Deed) की रजिस्ट्री की तारीख को आधार बनाकर किसी जरूरतमंद की अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) को खारिज करना पूरी तरह से कानूनन गलत और अनुचित है।
क्या है पूरा मामला? जानिए बेगूसराय का यह चर्चित प्रकरण
यह पूरा कानूनी संघर्ष बिहार के बेगूसराय जिले के रहने वाले विजय कुमार साह से जुड़ा हुआ है। मामला साल 1999 का है, जब विजय को उनकी नानी रेशमा देवी ने गोद लिया था। रेशमा देवी बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी (एनबीपीडीसीएल - NBPDCL) में मेसेंजर के पद पर कार्यरत थीं। इस गोद लेने की प्रक्रिया में नानी और विजय के जैविक माता-पिता, दोनों की सहमति शामिल थी। शुरुआत में यह प्रक्रिया एक कानूनी हलफनामे (Affidavit) के जरिए शुरू की गई थी, जिसके बाद विधिवत रूप से साल 2001 में इस गोदनामे की रजिस्ट्री कराई गई।
सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी साल 2007 में सेवाकाल के दौरान ही सरकारी कर्मचारी यानी रेशमा देवी का निधन हो गया। माता की मृत्यु के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसी विकट स्थिति में परिवार का भरण-पोषण करने के लिए विजय कुमार साह ने नियमों के तहत अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने के लिए बिजली विभाग के समक्ष औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया। लेकिन इसके बाद शुरू हुआ फाइलों का वह दौर, जिसने एक युवा को न्याय के लिए सालों-साल अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया।
बिजली विभाग के बेतुके तर्क और कोर्ट की कड़ी फटकार
बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी के अधिकारियों ने विजय कुमार साह के आवेदन को सिरे से खारिज कर दिया। विभाग की ओर से जो दलीलें दी गईं, वे बेहद अजीबोगरीब थीं। विभाग का कहना था कि:
- गोदनामे की रजिस्ट्री के वक्त याचिकाकर्ता (विजय) की उम्र 15 वर्ष से अधिक थी।
- यह आवेदन तय की गई पांच साल की समय सीमा के बाद जमा किया गया था।
- उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) केवल सेवानिवृत्ति के वित्तीय लाभों के लिए ही वैध है, नौकरी के लिए नहीं।
इन तमाम तर्कों को आधार बनाते हुए 22 दिसंबर 2017 को विभाग ने विजय की अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी को पूरी तरह से रद्द कर दिया। इस मनमाने फैसले के खिलाफ विजय ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ के समक्ष हुई। अदालत ने विभाग के इन कुतर्कों और रवैये पर बेहद सख्त रुख अपनाया।
अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस कुमार मनीष की पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़े शब्दों में टिप्पणी की कि सरकारी दफ्तरों की सुस्ती और लालफीताशाही (Red Tapism) का हर्जाना आम नागरिक क्यों भुगते? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गोद लेने की पूरी कानूनी प्रक्रिया साल 1999 के हलफनामे के साथ ही शुरू हो चुकी थी। उस शुरुआती बिंदु पर विजय कुमार साह की उम्र 15 वर्ष से कम थी, जो कि गोद लेने के वैध नियमों के बिल्कुल अनुकूल है। केवल प्रशासनिक देरी या कागजी रजिस्ट्री में वक्त लगने की वजह से किसी बच्चे के कानूनी अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
अदालत ने विभाग के दोहरे चरित्र को भी बेनकाब किया। जज ने बेहद तार्किक सवाल उठाया कि— 'जब उसी गोदनामे और पारिवारिक रिश्ते के आधार पर विभाग ने आवेदक को भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और पेंशन जैसे तमाम वित्तीय लाभ दे दिए, तो ठीक उसी रिश्ते को अनुकंपा नौकरी देते वक्त नकारना कैसे जायज हो सकता है?' यह प्रशासनिक विभाग का दोहरा और संवेदनहीन रवैया दिखाता है, जिसे अदालत कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।
अधिकारियों की लापरवाही और सालों की लंबी दौड़
यह मामला केवल एक नौकरी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की संवेदनहीनता का भी एक जीवंत उदाहरण है। साल 2010 से ही यह पीड़ित युवक न्याय की आस में अधिकारियों की टेबल के चक्कर काट रहा था। विभाग के बाबू और अधिकारी जानबूझकर बार-बार नए-नए दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों की मांग करते रहे, जिससे प्रक्रिया में जानबूझकर देरी हुई। जब पांच साल की समय सीमा का रोड़ा विभाग ने अटकाया, तो कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब फाइलें खुद अधिकारियों के दफ्तरों में धूल फांक रही थीं और दस्तावेजों की मांग खुद विभाग कर रहा था, तो देरी के लिए आवेदक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश: 3 महीने में दें नौकरी
मामले के सभी पहलुओं, कानूनी दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों को गहराई से सुनने के बाद पटना हाईकोर्ट ने बिजली विभाग (NBPDCL) के 22 दिसंबर 2017 को जारी किए गए उस खारिज आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति को नामंजूर किया गया था।
इसके साथ ही, अदालत ने बिजली कंपनी को यह सख्त निर्देश दिया है कि वे आदेश की प्रति मिलने के ठीक 3 महीने के भीतर याचिकाकर्ता विजय कुमार साह को कानूनी रूप से गोद लिया गया पुत्र मानें। कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें बिना किसी हीला-हवाली के अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के मामले पर नए सिरे से विचार कर तत्काल नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की जाए।
इस फैसले के दूरगामी मायने
कानूनी जानकारों का मानना है कि पटना हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के अन्य विभागों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण बनेगा। अक्सर देखने में आता है कि सरकारी महकमों में अनुकंपा के मामलों को या तो वर्षों लटकाए रखा जाता है या फिर छोटी-मोटी तकनीकी कमियों (जैसे उम्र की गणना की तारीख या रजिस्ट्री के साल) का बहाना बनाकर गरीबों के अधिकार छीन लिए जाते हैं। इस फैसले के बाद अब प्रशासनिक अधिकारियों को किसी भी मामले में मनमाने फैसले लेने से पहले सौ बार सोचना होगा।
बेगूसराय के विजय कुमार साह के लिए यह फैसला लगभग दो दशकों के संघर्ष के बाद मिली एक बड़ी राहत है। नानी की छांव खोने के बाद जिस प्रकार इस युवक ने सिस्टम से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, वह संघर्ष आज रंग लाया है। न्यायपालिका ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आम आदमी की उम्मीदों और अधिकारों की रक्षा के लिए कानून की आंखें हमेशा खुली रहती हैं।