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24 साल देश की रक्षा कर घर लौटे सैनिक कमलेश, ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी से हुआ भव्य स्वागत

24 साल देश की रक्षा कर घर लौटे सैनिक कमलेश, ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी से हुआ भव्य स्वागत

देश की सीमाओं की सुरक्षा करना कोई आम बात नहीं है। इसके लिए वर्षों का कड़ा संघर्ष, अपनों से दूरी और हर पल जान जोखिम में डालने का जज्बा चाहिए होता है। जब कोई सैनिक अपनी जवानी के दो दशक से ज्यादा का समय देश के नाम समर्पित कर देता है और फिर वर्दी उतारकर अपने घर लौटता है, तो वह पल केवल उस परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गर्व का विषय बन जाता है। कुछ ऐसा ही भावुक और दिल को छू लेने वाला नजारा देखने को मिला झारखंड के मुसाबनी इलाके में, जहां भारतीय सेना के एक जांबाज जवान कमलेश कुमार 24 वर्षों की लंबी और गौरवशाली सेवा के बाद सेवानिवृत्त होकर अपने घर वापस लौटे।

कमलेश कुमार की घर वापसी किसी बड़े उत्सव से कम नहीं थी। परिवार, रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों ने मिलकर उनके स्वागत में ऐसे इंतजाम किए थे कि पूरा माहौल जश्न में डूब गया। ढोल-नगाड़ों की थाप, आतिशबाजी की गूंज और फूलों की वर्षा के बीच जब इस वीर सपूत ने अपने घर की देहरी पर कदम रखा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें खुशी से नम हो गईं। आइए विस्तार से जानते हैं इस खास और प्रेरणादायक वापसी की पूरी कहानी, जिसने हर किसी के दिल को झकझोर कर रख दिया है।

दो दशक से ज्यादा का सफर और अनगिनत चुनौतियां

कमलेश कुमार ने 20 सितंबर 2002 को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित '25 एयर डिफेंस रेजिमेंट' में बतौर सैनिक अपना योगदान दिया था। देश के प्रति कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ उन्होंने अपनी शुरुआत की थी। इसके बाद उनका मिलिट्री ट्रेनिंग का दौर शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने नासिक और बेंगलुरु जैसे प्रमुख सैन्य केंद्रों में कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस कठिन ट्रेनिंग ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से देश की हर बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार किया।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद कमलेश कुमार की तैनाती देश के विभिन्न संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों पर की गई। अपने 24 साल के लंबे करियर के दौरान उन्होंने अंबाला, जोधपुर, ग्वालियर, उधमपुर और मुंबई जैसे अहम स्थानों पर अपनी सेवाएं दीं। लेकिन उनके इस सफर का सबसे कड़ा और चुनौतीपूर्ण हिस्सा वह रहा, जब उन्हें देश के सबसे संवेदनशील और आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र यानी जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया।

जम्मू-कश्मीर में 13 साल तक दी सेवाएं

एक सैनिक के लिए कश्मीर घाटी या सीमावर्ती इलाकों में तैनात रहना अग्निपरीक्षा के समान होता है। कमलेश कुमार ने अपने लंबे सेवाकाल में से लगभग 13 वर्ष अकेले जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा, पुंछ और श्रीनगर जैसे बेहद संवेदनशील और आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में बिताए। इन इलाकों में हर पल मौत का साया और लगातार बनी रहने वाली सुरक्षा चुनौतियां आम बात होती हैं। बावजूद इसके, कमलेश ने बिना किसी डर के, अदम्य साहस और पूरी कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।

बर्फ से ढके पहाड़ों से लेकर उग्रवाद प्रभावित घाटियों तक, उन्होंने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में अपना अहम योगदान दिया। जब वे इन पुरानी यादों और अपने साथियों के साथ बिताए पलों को याद करते हैं, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। हालांकि, इन 24 वर्षों में परिवार से दूर रहना उनके और उनके परिजनों के लिए आसान नहीं था, लेकिन देश सेवा का यह जज्बा हमेशा हर मुश्किल पर भारी पड़ा।

परिवार ने दी गजब की विदाई, आतिशबाजी से गूंजा मुसाबनी

जब कमलेश कुमार की सेवानिवृत्ति की घोषणा हुई और उनके घर लौटने की तारीख पक्की हुई, तो मुसाबनी स्थित उनके घर और ससुराल में उत्साह का माहौल बन गया। परिवार के सदस्यों ने पहले ही उनके स्वागत की भव्य तैयारियां कर ली थीं। जैसे ही वह अपने घर पहुंचे, उनकी मां यशोदा देवी ने आगे बढ़कर बेटे की आरती उतारी और उन्हें माथे पर तिलक लगाकर लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया।

इस पारिवारिक मिलन में एक बेहद खूबसूरत पल तब आया जब उनकी सास शीला देवी ने दामाद का पारंपरिक तरीके से तिलक-चंदन लगाकर अभिनंदन किया। वहीं, उनकी पत्नी अनुराधा रानी ने अपने वीर पति पर पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत किया। परिवार के अन्य सदस्यों और रिश्तेदारों ने उन्हें फूल-मालाएं पहनाईं, बुके भेंट किए और इस खुशी के मौके पर केक काटकर जश्न मनाया। मुसाबनी की गलियां उस समय आतिशबाजी की रोशनी और ढोल-नगाड़ों की गूंज से सराबोर थीं।

रिश्तेदारों और शुभचिंतकों का लगा तांता

एक सैनिक की सफलता केवल उसकी अपनी नहीं होती, बल्कि उसके पूरे परिवार और समाज के समर्थन का परिणाम होती है। कमलेश कुमार के घर लौटने पर उनके रिश्तेदारों और शुभचिंतकों का तांता लग गया। इस अवसर पर उनके ससुर सूर्यनारायण ठाकुर, साला सुमित कुमार, सरहज शीतल कुमारी, किरण सिंह, और सिको पासवान सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने बारी-बारी से पहुंचकर कमलेश कुमार का स्वागत किया और उनकी इस लंबी तथा बेदाग सैन्य सेवा के लिए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

वहां मौजूद लोगों का कहना था कि कमलेश ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और ऊर्जावान 24 वर्ष देश की रक्षा में बिताए हैं। उन्होंने जिस निष्ठा के साथ अपना फर्ज निभाया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल है। मुसाबनी के युवाओं के लिए अब वह किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं।

जीवन की नई पारी की शुरुआत

वर्दी पहनकर सरहदों की रखवाली करने वाले कमलेश कुमार अब अपने परिवार और समाज के बीच रहकर अपनी जिंदगी के एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे हैं। इतने लंबे समय तक सेना के अनुशासन और सख्त दिनचर्या में रहने के बाद, अब वह अपने प्रियजनों के साथ सामान्य जीवन व्यतीत करेंगे। हालांकि, उनके भीतर का सैनिक हमेशा जीवित रहेगा, क्योंकि देश के लिए बहाया गया पसीना और दी गई सेवाएं कभी भुलाई नहीं जा सकतीं।

यह घर वापसी सिर्फ एक व्यक्ति का घर लौटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि जब देश का कोई जवान अपनी ड्यूटी पूरी करके अपने घर लौटता है, तो पूरा देश उसके सम्मान में खड़ा होता है। कमलेश कुमार की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे चैन से सोने के पीछे इन सैनिकों का कितना बड़ा त्याग और बलिदान छिपा होता है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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