भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया शब्द चर्चा के केंद्र में आ गया है—'दिमागी नक्सल' (Dimagi Naxal)। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले से दिए गए भाषण के बाद से शुरू हुई यह बहस थमने का नाम नहीं ले रही है। विपक्ष के लगातार तीखे सवालों और हमलों के बीच, अब मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री किरेन रिजिजू ने मैदान में उतरकर इस शब्द की एक स्पष्ट परिभाषा दी है और सरकार का रुख पूरी तरह से साफ किया है।
आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान के मायने क्या थे? क्या यह किसी राजनीतिक दल या विशेष विपक्षी नेताओं पर साधा गया निशाना था, या फिर इसके पीछे कोई और वैचारिक लड़ाई छिड़ी हुई है? आइए जानते हैं इस पूरे विवाद और किरेन रिजिजू द्वारा दी गई सफाई की पूरी कहानी।
किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर बताई ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा
विपक्ष की तरफ से लगातार यह आरोप लगाए जा रहे थे कि सरकार असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए इस तरह के नए शब्दों गढ़ रही है। इस पर पलटवार करते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा किया। उन्होंने साफ किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसी भी विपक्षी राजनेता को 'दिमागी नक्सल' नहीं कहा है।
रिजिजू के मुताबिक, सरकार उन लोगों और विचारधाराओं को इस दायरे में रखती है जो देश की अखंडता और संविधान के खिलाफ काम करते हैं। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए तीन मुख्य बिंदुओं का ज़िक्र किया:
- माओवाद और संविधान को नकारने वाले: जो तत्व माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं और देश के सर्वोच्च कानून यानी भारतीय संविधान को स्वीकार करने से इंकार करते हैं।
- अलगाववाद के पैरोकार: जो लोग देश विरोधी अलगाववादी ताकतों के साथ खड़े होते हैं और अनुच्छेद 370 जैसी व्यवस्थाओं की बहाली की बात करके देश की एकता को चुनौती देते हैं।
- भारत को तोड़ने की भाषा बोलने वाले सरकार के अनुसार, वे लोग जो देश के पूर्वोत्तर राज्यों को भारत के बाकी हिस्सों से अलग करने के लिए 'चिकन नेक' (सिलगुरी कॉरिडोर) को काटने या बंद करने जैसी खतरनाक और भड़काऊ बातें करते हैं।
"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निशाना देश के विपक्षी दल नहीं, बल्कि देश को अंदर से खोखला करने वाली उन अलगाववादी और अराजक विचारधाराओं पर था जो हिंसा और वैमनस्य को बढ़ावा देती हैं।" — किरेन रिजिजू, केंद्रीय मंत्री
लाल किले से क्या कहा था पीएम मोदी ने?
यह पूरा विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस संबोधन से शुरू हुआ, जो उन्होंने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिया था। लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने देशवासियों को ‘दिमागी नक्सल’ नाम की वैचारिक बीमारी से सचेत रहने की अपील की थी।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत ने हथियारबंद नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी है और काफी हद तक सफलता भी पाई है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि नक्सलवाद के वैचारिक समर्थक अब भी समाज के भीतर मौजूद हैं, जो लगातार हिंसा, अराजकता और फूट डालने के नए-नए मौके तलाशते रहते हैं। पीएम ने ऐसे तत्वों की पहचान करके उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की ज़रूरत पर बल दिया था।
विपक्ष का तीखा हमला: ‘अर्बन नक्सल’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक
प्रधानमंत्री के इस बयान के आते ही राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया। विपक्षी दलों ने इसे वैचारिक असहमति को कुचलने और सरकार की हर आलोचना को राष्ट्रविरोधी करार देने की एक सोची-समझी रणनीति बताया।
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार पहले असंतुष्टों और आलोचकों को ‘अर्बन नक्सल’ (Urban Naxal) कहती थी और अब नया जुमला ‘दिमागी नक्सल’ ले आई है ताकि हर उस आवाज़ को चुप कराया जा सके जो सरकार से सवाल पूछती है। वहीं, कांग्रेस के दिग्गज नेता पी. चिदंबरम और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सरकार की इस शब्दावली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय और भविष्य की दिशा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक और गरमा सकता है। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक शुद्धता से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बता रहा है। बहरहाल, किरेन रिजिजू की इस सफाई के बाद यह तो साफ हो गया है कि सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है, बल्कि वह अपनी इस वैचारिक लाइन को आक्रामक तरीके से जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले किसने किया था?
इस शब्द का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 78वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के अपने लाल किले के भाषण के दौरान किया था।
2. किरेन रिजिजू के अनुसार 'दिमागी नक्सल' कौन हैं?
किरेन रिजिजू के मुताबिक, जो लोग माओवाद का समर्थन करते हैं, अलगाववादी ताकतों के साथ खड़े होते हैं, अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं या देश को तोड़ने जैसी बातें (जैसे चिकन नेक काटने की धमकी) करते हैं, वे इस श्रेणी में आते हैं।
3. विपक्ष इस बयान का विरोध क्यों कर रहा है?
विपक्षी दलों (जैसे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस) का आरोप है कि सरकार इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करके लोकतांत्रिक विरोध और सरकार विरोधी आलोचनाओं को दबाना चाहती है।: