सीमा प्रहरियों के चार टांगों वाले बेजोड़ साथी
हिमालय की गोद में बसे लद्दाख की बर्फीली वादियां जितनी खूबसूरत दिखती हैं, वहां की भौगोलिक चुनौतियां उतनी ही खौफनाक और जानलेवा हैं। समुद्र तल से चौदह हजार फीट से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित इन इलाकों में आम इंसान का सांस लेना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं होता। लेकिन, इन विपरीत परिस्थितियों में भी देश की सरहदों की हिफाजत करने वाले हमारे वीर जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले कुछ ऐसे खामोश प्रहरी भी हैं, जो बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल का सामना करते हैं। ये कोई और नहीं, बल्कि भारतीय सेना के विशेष रूप से प्रशिक्षित मिलिट्री डॉग्स हैं।
कड़ाके की ठंड, हड्डियों को जमा देने वाली हवाएं और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच ये श्वान दस्ता (Remount and Veterinary Corps - RVC) देश के लिए एक मजबूत ढाल साबित होता है। हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार, इन मूक सैनिकों को इतनी कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए महीनों की कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक तरीकों से तैयार किया जाता है। इनकी ट्रेनिंग का दायरा केवल आज्ञा पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि इन्हें दुखों और खतरों के बीच सबसे आगे रहकर दुश्मन के मंसूबों को नाकाम करने के लिए गढ़ा जाता है।
अकथनीय ठंड और पतली हवा से मुकाबला: एक क्रमिक प्रक्रिया
लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में सीधे तौर पर किसी भी जीव को भेजना असंभव और घातक हो सकता है। वहां की हवा में ऑक्सीजन का स्तर मैदानी इलाकों की तुलना में काफी कम होता है, जिससे हाइपोक्सिया (Hypoxia) और अन्य स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यही वजह है कि सेना के पशु चिकित्सकों और प्रशिक्षकों (Trainers) की देखरेख में इन श्वानों की ट्रेनिंग एक बहुत ही वैज्ञानिक और चरणबद्ध तरीके से शुरू होती है।
प्रशिक्षण की शुरुआत कम ऊंचाई वाले बेस कैंपों से होती है, जहां इन्हें धीरे-धीरे मौसम के अनुकूल (Acclimatization) ढाला जाता है। तापमान में गिरावट के साथ-साथ इनके शरीर की सहनशक्ति को मापने के लिए छोटे-छोटे शारीरिक परीक्षण किए जाते हैं। जब ये श्वान उस माहौल के अभ्यस्त हो जाते हैं, तब इन्हें और अधिक ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों की ओर ले जाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इनकी डाइट, आराम और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि अत्यधिक ठंड और बर्फ के बीच इनकी कार्यक्षमता पर कोई असर न पड़े।
विस्फोटक पहचान से लेकर गश्त तक: विशेष कौशल का विकास
लद्दाख जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा के मोर्चे पर जरा सी चूक भारी पड़ सकती है। इसलिए मिलिट्री डॉग्स को कई तरह के विशेष कार्यों में पारंगत बनाया जाता है:
- विस्फोटक और आईईडी (IED) का पता लगाना: इनकी सूंघने की शक्ति इंसानों से कई गुना ज्यादा तेज होती है, जिससे ये छिपे हुए विस्फोटकों को आसानी से ढूंढ निकालते हैं।
- गश्त लगाना और ट्रैकिंग: बर्फीले रास्तों और अंधेरे में भी ये दुश्मन की आहट को भांप लेते हैं और पेट्रोलिंग पार्टी का नेतृत्व करते हैं।
- खोजी अभियान (Search and Rescue): भारी हिमस्खलन (Avalanche) या बर्फबारी के दौरान मलबे या बर्फ के नीचे दबे जवानों या नागरिकों को तलाशने में इनकी भूमिका अहम होती है।
कठोर अनुशासन और अटूट वफादारी का प्रतीक
मिलिट्री डॉग्स की जिंदगी किसी आम पालतू कुत्ते की तरह नहीं होती। इनके दिन की शुरुआत अहले सुबह कड़े अनुशासन के साथ होती है। इन्हें विभिन्न प्रकार के भू-भागों (Terrains) पर दौड़ने, बाधाओं को पार करने और अलग-अलग तरह के कमांड सीखने की ट्रेनिंग दी जाती है। हैंडलर और डॉग के बीच का रिश्ता इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी ताकत होता है। एक हैंडलर अपने डॉग को न केवल एक साथी समझता है, बल्कि अपनी जान बचाने वाले सहकर्मी के रूप में देखता है।
इन श्वानों को ऐसे हालात में भी शांत रहने की ट्रेनिंग दी जाती है जहां तेज धमाके, गोलियों की आवाज या अचानक मौसम खराब होने का खतरा रहता है। ये बिना डरे अपने हैंडलर के एक इशारे पर अपनी जान की बाजी लगाने के लिए तैयार रहते हैं।
देश की सुरक्षा में मूक योद्धाओं का अतुलनीय योगदान
लद्दाख के दुर्गम पहाड़ों पर तैनात ये मिलिट्री डॉग्स इस बात के प्रमाण हैं कि देश की रक्षा केवल बूटों की आवाज से नहीं, बल्कि वफादारी की खामोश ताकत से भी होती है। जब देश के आम नागरिक अपने घरों में सुरक्षित होते हैं, तब ये मूक योद्धा शून्य से भी नीचे के तापमान में अपनी सीमाओं की रक्षा कर रहे होते हैं। इनकी यह असाधारण ट्रेनिंग और देश के प्रति समर्पण हर भारतवासी के लिए गर्व का विषय है। सेना का यह श्वान दस्ता इस बात की याद दिलाता है कि राष्ट्र सेवा में उम्र, भाषा या रूप मायने नहीं रखता, बल्कि निष्ठा और बहादुरी ही सबसे बड़ा धर्म है।