मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोल देने वाली एक बेहद चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां का मुख्य जिला चिकित्सालय इन दिनों किसी भूतिया बंगले की तरह अंधेरे में डूबने को मजबूर है। अस्पताल के पुराने भवन में पिछले पांच दिनों से बिजली और जेनरेटर की व्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ी है, जिसके कारण मरीज और उनके तीमारदार मोबाइल की टॉर्च या फिर हाथ वाली टॉर्च के सहारे अपना इलाज कराने को मजबूर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ जहां नया भवन और सोलर पैनल जगमगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गंभीर मरीजों का इलाज अंधेरे के साये में हो रहा है।
जेनरेटर का पैनल खराब, वैकल्पिक व्यवस्था शून्य
मिली जानकारी के अनुसार, जिला चिकित्सालय का मुख्य जेनरेटर पैनल पिछले कई दिनों से खराब पड़ा हुआ है। अस्पताल प्रबंधन ने इसे सुधार के लिए तो भेज दिया है, लेकिन अब तक वह वापस नहीं लौट सका है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब मुख्य जेनरेटर खराब था, तो क्या अस्पताल प्रशासन के पास आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए कोई वैकल्पिक योजना (Backup Plan) नहीं थी? बिजली गुल होने की स्थिति में मरीजों की जान जोखिम में डाल दी जाती है। अनूपपुर के इस सरकारी अस्पताल की यह लापरवाही किसी बड़ी अनहोनी को खुला निमंत्रण दे रही है।
अस्पताल के पुराने भवन में आज भी कई बेहद संवेदनशील विभाग संचालित होते हैं। इनमें ओपीडी (बाह्य रोगी विभाग), दवा वितरण केंद्र, ड्रेसिंग रूम, आपातकालीन उपचार कक्ष (इमरजेंसी) और पुरुष तथा महिला भर्ती वार्ड शामिल हैं। इसके साथ ही, इसके पास स्थित ट्रामा यूनिट सेंटर में करोड़ों रुपये की लागत से आई एक्सरे, सोनोग्राफी और एमआरआई जैसी आधुनिक मशीनें स्थापित हैं। ठीक इसी परिसर में पुलिस सहायता केंद्र भी मौजूद है, इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की आंखें मूंदी हुई हैं।
गुरुवार को दिनभर चली बिजली की आंख-मिचौली
स्थिति तब और अधिक भयावह हो गई जब गुरुवार को सुबह से लेकर दोपहर करीब 3 बजे तक बिजली की आंख-मिचौली का खेल चलता रहा। बिजली कुछ मिनट के लिए आती और फिर लंबे समय के लिए गायब हो जाती। इस दौरान अस्पताल की पूरी व्यवस्था पटरी से उतर गई। डॉक्टरों को स्मार्टफोन की फ्लैशलाइट जलाकर मरीजों के घाव देखने पड़े और उनका इलाज करना पड़ा। नर्सों को दवाइयां बांटने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जबकि खून की जांच और रिपोर्ट तैयार करने का काम पूरी तरह से ठप पड़ गया। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आए मरीज घंटों तक लाइनों में खड़े रहे, लेकिन उन्हें न तो समय पर डॉक्टर की सलाह मिल पाई और न ही जांच रिपोर्ट।
अधिकारियों की कार्यशैली पर खड़े हो रहे बड़े सवाल
कुछ समय पहले ही जिला कलेक्टर रत्नाकर झा और जिला पंचायत सीईओ अर्चना कुमारी ने जिला चिकित्सालय का औचक निरीक्षण किया था। स्थानीय नागरिकों और मरीजों के मन में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर उन वरिष्ठ अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान अस्पताल की इन बुनियादी कमियों को क्यों नहीं देखा? क्या कागजों पर सब कुछ ठीकठाक दिखाकर फाइलों को बंद कर दिया गया? ठीक एक साल पहले भी इसी तरह के हालात बने थे, तब मीडिया के हस्तक्षेप के बाद एक सप्ताह बीत जाने के बाद सिविल सर्जन की नींद टूटी थी। इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है और मरीजों की जान पर बन आई है।
दिल्ली से मंगाए गए हैं पार्ट्स: सिविल सर्जन
इस पूरे मामले पर जब जिला चिकित्सालय अनूपपुर के सिविल सर्जन डॉ. एसआर परस्ते से बातचीत की गई, तो उन्होंने अपनी सफाई में बताया कि अस्पताल परिसर में लगे डायलिसिस यूनिट के लिए एक डीजी (डीजल जनरेटर) सुचारू रूप से काम कर रहा है। हालांकि, अस्पताल के पीछे लगे दो अन्य डीजी में से एक पूरी तरह खराब है और दूसरे ऑटोमेटिक डीजी के पार्ट्स में तकनीकी खराबी आ गई है। उन्होंने आगे बताया कि शहडोल से आए मिस्त्री ने इसकी जांच कर ली है और जरूरी पार्ट्स विशेष तौर पर दिल्ली से मंगवाए गए हैं। जैसे ही ये पार्ट्स यहां पहुंचेंगे, जेनरेटर को ठीक कर सुचारू रूप से चालू कर दिया जाएगा।
विद्युत विभाग को नहीं है कोई जानकारी
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ जहां अस्पताल प्रबंधन तकनीकी खराबी का रोना रो रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय विद्युत वितरण कंपनी के अधिकारी इस समस्या से पूरी तरह अनजान नजर आए। अनूपपुर विद्युत कंपनी के डीई राहुल श्रीवास्तव ने स्पष्ट रूप से बताया कि उन्हें चिकित्सालय प्रबंधन की तरफ से बिजली या जेनरेटर खराब होने की आधिकारिक तौर पर कोई सूचना नहीं दी गई है। यदि अस्पताल की ओर से उन्हें पहले ही अवगत करा दिया जाता, तो शायद इस तरह की गंभीर स्थिति से बचा जा सकता था और मरीजों को इतनी जिल्लत नहीं झेलनी पड़ती।
जनता का आक्रोश और भविष्य की चेतावनी
अनूपपुर के इस जिला अस्पताल की बदहाली ने सरकार के उस दावे की हवा निकाल दी है, जिसमें हर नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की बात कही जाती है। अगर समय रहते इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। फिलहाल, मरीज और उनके परिजन भगवान भरोसे अंधेरे में इलाज कराने को विवश हैं और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।