पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर प्रशासनिक नियुक्तियों और केंद्रीय दौरों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा ने देश के गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बंगाल दौरे को लेकर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। मोइत्रा का दावा है कि केंद्रीय गृह मंत्री के कार्यक्रमों और बैठकों से जानबूझकर मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों को दूर रखा गया, जो कि प्रशासनिक ढांचे में भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण है।
सोशल मीडिया पर महुआ मोइत्रा का तीखा हमला
अपने बयानों और तीखे तेवरों के लिए पहचानी जाने वाली महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर खुलकर इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने अखिल भारतीय सेवा संघों—आईएएस एसोसिएशन और आईपीएस एसोसिएशन—की चुप्पी पर भी सवालिया निशान खड़े किए हैं। मोइत्रा ने सीधे तौर पर उन अधिकारियों का जिक्र किया जिन्हें कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री के कार्यक्रमों से बाहर रखा गया था।
अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा, "नमस्ते आईपीएस एसोसिएशन और आईएएस एसोसिएशन। पश्चिम बंगाल में जब देश के गृह मंत्री आए, तो क्या प्रशासनिक प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया गया? सिलीगुड़ी के कमिश्नर ऑफ पुलिस वकार रजा को वेलकम लाइनअप से बाहर कर दिया गया। डीजी एसटीएफ जावेद शमीम को किसी भी अहम बैठक में नहीं बुलाया गया। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी खलील अहमद को मीटिंग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। क्या आप इस तरह की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाएंगे?"
सुरक्षा बैठक और सिलीगुड़ी कॉरिडोर का सामरिक महत्व
राजनीतिक गलियारों में उठ रहे इन सवालों के बीच, यह जानना भी बेहद जरूरी है कि आखिर यह पूरा दौरा किस संदर्भ में था। गृह मंत्री अमित शाह का यह दौरा देश की आंतरिक सुरक्षा, खासकर सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ की समस्या को रोकने और चाक-चौबंद व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए था। इस हाई-लेवल मीटिंग में देश के सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा और विशेष तौर पर 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' की सुरक्षा व्यवस्था पर गहन चर्चा की गई थी।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामरिक दृष्टि से 'चिकन नेक' के नाम से भी जाना जाता है, भारत के लिए बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण भूभाग है। यह पश्चिम बंगाल में स्थित लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा गलियारा है, जो देश की मुख्यभूमि को उसके उत्तर-पूर्व के आठ राज्यों (सेवन सिस्टर्स) से आपस में जोड़ता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए यहां हर एक प्रशासनिक और सुरक्षा कदम बेहद अहम माना जाता है.
प्रशासनिक हलकों में सुगबुगाहट तेज
महुआ मोइत्रा के इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद से बंगाल के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालांकि, केंद्र सरकार या संबंधित महकमों की तरफ से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या खंडन सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से एक सीनियर सांसद ने सीधे तौर पर प्रशासनिक भेदभाव का मुद्दा उठाया है, उसने एक नया राजनीतिक विवाद जरूर छेड़ दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आरोप सीधे तौर पर देश की सिविल सेवा (Civil Services) की निष्पक्षता और उसकी तटस्थता पर सवाल खड़े करते हैं। ब्यूरोक्रेसी को देश की रीढ़ माना जाता है, जो किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से ऊपर उठकर काम करने के लिए संविधान के प्रति शपथबद्ध होती है। ऐसे में यदि प्रशासनिक स्तर पर धर्म या समुदाय के आधार पर दूरी बनाए जाने के दावे सच साबित होते हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय बन सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने के पूरे आसार हैं। विपक्षी दल इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाने की तैयारी में हैं, वहीं सत्ता पक्ष की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल राजनीतिक प्रोपेगंडा करार दिया जा सकता है। देखना यह होगा कि क्या आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन इस मामले में कोई संज्ञान लेते हैं या फिर यह मामला सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित रहकर दम तोड़ देता है।
