सनातन संस्कृति और वैचारिक पुनर्जागरण के इस दौर में मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन से एक बेहद दिलचस्प और गूंजता हुआ बयान सामने आया है। प्रसिद्ध गीतकार और लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला ने उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दौरान खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक रूप से उस दिशा में आगे बढ़ चुका है जिसकी कल्पना दशकों पहले दूरदर्शी विचारकों ने की थी।
डॉ. हेडगेवार के सपने और आज के भारत की तस्वीर
उज्जैन के इस प्रतिष्ठित आयोजन के दूसरे दिन ‘धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व’ विषय पर एक विशेष संवाद सत्र का आयोजन किया गया था। इस सत्र को संबोधित करते हुए मनोज मुंतशिर ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कहा कि वर्ष 1940 में डॉ. हेडगेवार ने यह भविष्यवाणी की थी कि एक ऐसा समय अवश्य आएगा जब पूरा देश भगवामय हो जाएगा। आज की तारीख में वह परिस्थिति जमीन पर उतरती दिख रही है और लगभग 90 प्रतिशत भारत इस सांस्कृतिक प्रवाह से जुड़ चुका है।
उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए इस बात पर जोर दिया कि केवल संख्या बल से काम नहीं चलेगा, बल्कि देश की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और मूल संस्कृति से गहराई से जुड़ना होगा। आधुनिक चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के बीच अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए उन्होंने युवाओं को श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण का अध्ययन करने की सलाह दी। उनके अनुसार, ये ग्रंथ केवल धार्मिक पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने की कला और हर समस्या का अचूक समाधान हैं।
स्वामी विवेकानंद और वसुधैव कुटुंबकम का संदेश
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने लगभग 133 साल पहले शिकागो में दिए गए स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि जब स्वामी विवेकानंद ने ‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ अमेरिका’ कहकर वहां मौजूद पश्चिमी देशों के विद्वानों को संबोधित किया था, तो कई लोगों को यह समझ नहीं आया था कि वे उन्हें भाई-बहन क्यों कह रहे हैं। असल में, वह भारतीय संस्कृति की उस मूल भावना का प्रसार था जो पूरे विश्व को एक ही परिवार यानी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ मानती है।
"जब कोई राष्ट्र तीन पीढ़ियों तक अपनी सभ्यता और जड़ों से दूर रहता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और पुरखों की दो पीढ़ियां अंग्रेजों से संघर्ष करने में बीत गईं। अब समय आ गया है कि हम अपनी संस्कृति को अपनाएं और यह तय करें कि हमें भारतीय परंपरा के साथ चलना है या किसी अन्य मार्ग पर।"
महर्षि अरविंद के कथन का हवाला और दो पीढ़ियों का संघर्ष
महर्षि अरविंद के एक प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि किसी भी राष्ट्र की संस्कृति उसकी रीढ़ होती है। यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी सभ्यता से कट जाती हैं, तो राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि युवाओं को धर्म को केवल एक सतही शब्द के रूप में नहीं जानना चाहिए, बल्कि उसे आत्मसात करना होगा। भारतीय परंपराओं और प्राचीन ग्रंथों से जुड़कर ही युवा अपने जीवन को एक सही दिशा दे सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकते हैं।
'इंडिया' से 'भारत' की ओर लौटने का आह्वान
इसी सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्रीनिवास बरखेड़ी ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने आधुनिकता और पारंपरिकता के बीच के अंतर को समझाते हुए कहा कि हमें ‘इंडिया’ की अवधारणा से वापस ‘भारत’ की मूल चेतना की ओर लौटना होगा और इस बड़े बदलाव की कमान देश के युवाओं के हाथ में ही है।
उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि युवाओं को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उन्हें क्या करना है, बल्कि यह भी बताना उतना ही जरूरी है कि उन्हें वह काम ‘क्यों’ करना है। जब युवा किसी कार्य के पीछे के गहरे तर्क और उद्देश्य को समझ जाएंगे, तो वे उसे पूरी शिद्दत के साथ पूरा करेंगे। उन्होंने यह भी खारिज किया कि आज की युवा पीढ़ी धर्म से दूर भाग रही है। उनका मानना था कि यदि सही मायनों में और सही तर्कों के साथ युवाओं के सामने बातें रखी जाएं, तो वे असंभव दिखने वाले कार्यों को भी संभव कर दिखाने की क्षमता रखते हैं।
एआई के दौर में इतिहास और विज्ञान की पुनर्वापसी
युवा धर्म संसद के इस मंच पर केवल धार्मिक और सांस्कृतिक चर्चा ही नहीं हुई, बल्कि आधुनिक तकनीक और इतिहास के पन्नों में छुपे सच पर भी खुलकर बात हुई। अनादि फाउंडेशन की प्रतिनिधि स्मृति अनंतलक्ष्मी ने आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि आज तकनीक के इस युग में यह पहचानना मुश्किल होता जा रहा है कि क्या सच है और क्या झूठ। हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इसके समाप्त होते ही किस तरह फर्जी संदेशों और सूचनाओं का दौर शुरू हो गया। उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों की वर्तमान स्थिति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज के छात्र विदेशी वैज्ञानिकों के बारे में तो सब कुछ जानते हैं, लेकिन उन्हें अपने देश के महान वैज्ञानिकों के योगदान की सुधि तक नहीं है।
उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों में मुगलों और बाहरी आक्रांताओं के इतिहास के लिए तो कई-कई पन्ने आरक्षित हैं, लेकिन भारत के गौरवशाली वैज्ञानिक इतिहास को केवल कुछ ही पंक्तियों में समेट दिया जाता है। इस व्यवस्था को बदलने की सख्त जरूरत है।
एआई का मुकाबला और भारतीय पंचांग की वैज्ञानिकता
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरों पर बात करते हुए स्मृति अनंतलक्ष्मी ने स्पष्ट किया कि एआई से उन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है जो तकनीक से अनजान हैं। यदि हमें डिजिटल युग की इन चुनौतियों से निपटना है, तो हमें एआई की नब्ज को समझना होगा।
इसके साथ ही उन्होंने भारतीय कालगणना और पंचांग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी परंपरा में पंचांग की हर एक तिथि का वैज्ञानिक और सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है, जबकि सामान्य अंग्रेजी कैलेंडर में ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता। कुल मिलाकर, उज्जैन की इस युवा धर्म संसद से एक साफ संदेश निकला है कि देश का युवा अब अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपनी परंपराओं को नए सिरे से समझने और अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा है।