काशी और अयोध्या के बाद अब उत्तर प्रदेश का ब्रज क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर सबसे तेजी से उभरते केंद्रों में शामिल है। भगवान कृष्ण की क्रीड़ा स्थली होने के कारण यहां साल के बाराहों महीने देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। पिछले एक दशक में ब्रज के स्वरूप को बदलने के लिए सरकार ने खजाने का मुंह खोल दिया है। सड़कों के चौड़ीकरण से लेकर भव्य द्वारों का निर्माण, रोशनी से जगमगाते भक्ति स्तंभ और बरसाना में राधारानी मंदिर के लिए रोपवे जैसी आधुनिक सुविधाएं अब यहां आम हो चुकी हैं।
आंकड़े इस बात की गवाही भी देते हैं कि इन बदलावों का सकारात्मक असर पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक साल में रिकॉर्ड 12 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने ब्रज की पावन भूमि का रुख किया। आने वाले दिनों में यह संख्या और बढ़ने की पूरी उम्मीद है। लेकिन, क्या विकास की इस तेज रफ्तार ने आम जनता और पर्यटकों की जिंदगी को सचमुच आसान बना दिया है? जमीन पर उतरकर जब इस सवाल का जवाब तलाशा जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती जितनी विज्ञापनों या कागजों में नजर आती है। विकास की इस अंधी दौड़ में जमीन से जुड़ी कुछ बुनियादी समस्याएं पीछे छूट गई हैं, जो आज नासूर बन चुकी हैं।
सड़कें चमकीं, पर जाम ने बढ़ाई श्रद्धालुओं की मुसीबत
ब्रज क्षेत्र में आने वाले हर पर्यटक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यातायात व्यवस्था और भयंकर जाम की है। आगरा-दिल्ली हाईवे को यमुना एक्सप्रेसवे से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन शहर के भीतर और प्रवेश मार्गों पर ट्रैफिक मैनेजमेंट की स्थिति आज भी बेहद लाचार नजर आती है। वीकेंड यानी शनिवार और रविवार को स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि वाहन रेंगते-रेंगते घंटों जाम में फंसे रहते हैं।
मथुरा से लेकर वृंदावन तक की सड़कों पर वाहनों का भारी दबाव रहता है। पार्किंग की उचित व्यवस्था न होने और सड़कों के किनारे बेतरतीब खड़े होने वाले वाहन जाम की स्थिति को और गंभीर बना देते हैं। दूर-दूर से भगवान बांकेबिहारी के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु जब घंटों जाम में फंसते हैं, तो उनकी सारी आस्था और उत्साह थकान में बदल जाती है। स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार विभागों द्वारा कई बार ट्रैफिक प्लान बदलने के दावे किए गए, लेकिन धरातल पर कोई स्थाई राहत देखने को नहीं मिली है।
थोड़ी सी बारिश और तालाब बन जाता है मथुरा
जाम के अलावा एक और समस्या है जो मथुरा के नागरिकों और बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए अभिशाप बन चुकी है—वह है जलभराव और लचर ड्रेनेज सिस्टम। शहर का ड्रेनेज सिस्टम इतना जर्जर हो चुका है कि मानसून या बेमौसम होने वाली थोड़ी सी बारिश में ही शहर के मुख्य मार्ग जलमग्न हो जाते हैं।
स्थिति यह हो जाती है कि प्रमुख सड़कों पर पानी भर जाता है और रेलवे के अंडरपास तो कृत्रिम तालाब में तब्दील हो जाते हैं, जहां से गुजरना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। सालों से यह समस्या जस की तस बनी हुई है। करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के बीच शहर के इस नासूर का हल आज तक नहीं निकाला जा सका है। जलभराव के कारण न सिर्फ आवागमन बाधित होता है, बल्कि गंदा पानी घरों और दुकानों में घुसने से संक्रामक बीमारियों का खतरा भी मंडराने लगता है।
वृंदावन के परिक्रमा मार्ग पर उफनता सीवेज
वृंदावन की पवित्र परिक्रमा का सनातन संस्कृति में विशेष महत्व है। देश और दुनिया के कोने-कोने से आने वाले भक्त नंगे पांव परिक्रमा लगाकर खुद को धन्य मानते हैं। लेकिन जरा सोचिए, उस वक्त उस श्रद्धालु पर क्या गुजरती होगी जब उसे पवित्र परिक्रमा मार्ग पर उफनते हुए गंदे सीवेज के पानी से होकर गुजरना पड़े।
जी हां, वृंदावन के परिक्रमा मार्ग की यह कड़वी सच्चाई है। विकास के दावों के बीच सीवेज ओवरफ्लो की समस्या यहां आम हो चुकी है। चमचम करते शहर और भव्य मंदिरों के बीच यह बदरंग तस्वीर उन विदेशी और स्थानीय श्रद्धालुओं को गहरी पीड़ा देती है जो पूरी श्रद्धा के साथ यहां आते हैं। व्यवस्था को कोसते हुए भक्त गंदे पानी से गुजरने को मजबूर होते हैं।
अब आगे क्या कदम उठाने की जरूरत है?
- मजबूत ट्रैफिक मास्टर प्लान: शहर के बाहरी इलाकों में बड़े पार्किंग स्थल बनाए जाएं ताकि भारी वाहन अंदर तक न आ सकें।
- ड्रेनेज सिस्टम का आधुनिकीकरण: बरसात के पानी की निकासी के लिए अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित ड्रेन नेटवर्क तैयार किया जाए।
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता वृद्धि: वृंदावन और मथुरा में सीवेज ओवरफ्लो की समस्या से निपटने के लिए एसटीपी का विस्तार जरूरी है।
- जवाबदेही तय हो: जितने भी विकास कार्य हो रहे हैं, उनके रख-रखाव (Maintenance) के लिए स्पष्ट नीतियां बनाई जाएं।
निसंदेह, सरकार और प्रशासन ने ब्रज के कायाकल्प के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं, और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। परंतु, जब तक आम नागरिकों और श्रद्धालुओं को जाम, जलभराव और गंदे पानी जैसी बुनियादी समस्याओं से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक विकास की यह इमारत अधूरी ही मानी जाएगी। समय आ गया है कि भव्यता के साथ-साथ शहर की बुनियादी जरूरतों पर भी उतनी ही गंभीरता से फोकस किया जाए, ताकि कान्हा की नगरी में आने वाला हर भक्त एक सुखद और अविस्मरणीय अनुभव लेकर वापस लौटे।