सहारनपुर से एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने देश के कानूनी और प्रशासनिक ढांचे पर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक प्राचीन मस्जिद को सुबह-सवेरे लगभग पांच बजे ध्वस्त किए जाने की घटना के बाद सियासी और सामाजिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस घटना पर देश के प्रमुख मुस्लिम संगठनों में शुमार जमीयत उलमा-ए-हिंद ने कड़ी आपत्ति जताई है और प्रशासन की कार्रवाई के तौर-तरीकों पर गहरे सवाल खड़े किए हैं।
सुबह-सवेरे प्राचीन मस्जिद पर कार्रवाई से सनसनी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सहारनपुर कलेक्ट्रेट के पास स्थित एक पुरानी और ऐतिहासिक मस्जिद को अहले सुबह बुलडोजर की मदद से जमींदोज कर दिया गया। जब तक स्थानीय लोग और संभ्रांत नागरिक कुछ समझ पाते या कानूनी विकल्प तलाशते, तब तक प्रशासनिक अमले ने अपनी कार्रवाई को अंजाम दे दिया था। इस एकतरफा और सुबह के वक्त की गई कार्रवाई को लेकर इलाके में भारी आक्रोश और मायूसी का माहौल देखा जा रहा है।
घटना की जानकारी मिलते ही तमाम स्थानीय नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और धार्मिक संगठनों के नुमाइंदे मौके पर पहुंचे और प्रशासन की इस कार्रवाई की তীব্র निंदा की। लोगों का कहना है कि किसी भी धार्मिक स्थल के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने से पहले विधिवत कानूनी नोटिस और बातचीत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था, लेकिन जिस जल्दबाजी में यह कदम उठाया गया, वह कई तरह के संदेह पैदा करता है।
मौलाना अरशद मदनी का तीखा हमला: 'बुलडोजर अब न्याय का प्रतीक नहीं'
इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गहरा दुख और क्षोभ व्यक्त किया है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रशासनिक मशीनरी और शासन व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि यह घटना सिर्फ एक इबादतगाह को गिराने का मामला नहीं है, बल्कि यह देश के संविधान, कानून के शासन और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर सीधा प्रहार है।
मौलाना मदनी ने अपने बयान में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा,
कानून अगर इस देश में सबके लिए एक है, तो उसे लागू करने में यह दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जाता है? आज हालात यह हो चुके हैं कि बुलडोजर न्याय, सुशासन या विकास का पैमाना नहीं रहा, बल्कि यह खुलेआम बदले, भेदभाव और नफरत की राजनीति का मुख्य प्रतीक बन चुका है।
संविधान और समानता के बुनियादी अधिकारों पर सवाल
मौलाना अरशद मदनी ने आगे विस्तार से बात करते हुए कहा कि देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को उसकी जाति, धर्म या वर्ग से ऊपर उठकर समानता का अधिकार देता है। संविधान की प्रस्तावना से लेकर मौलिक अधिकारों तक में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी दी गई है। ऐसे में जब किसी खास मजहब के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राज्य की निष्पक्ष भूमिका खतरे में पड़ चुकी है?
- समानता का सिद्धांत: क्या कानून की नजर में सभी नागरिक वास्तव में समान हैं या कुछ मामलों में नियमों को ताक पर रख दिया जाता है?
- धार्मिक स्वतंत्रता: क्या देश के संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक अधिकारों का पालन अब केवल कागजों तक सीमित रह गया है?
- प्रशासनिक निष्पक्षता: क्या राज्य और उसकी एजेंसियों की भूमिका पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बची है?
उन्होंने जोर देकर कहा कि सहारनपुर की यह घटना केवल एक स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का पैमाना है कि आने वाले समय में देश के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा की क्या स्थिति रहने वाली है।
देशभर के बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रियाएं
सहारनपुर की इस घटना के बाद से देशभर के विभिन्न हिस्सों से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग भी इस बात पर चिंता व्यक्त कर रहा है कि जिस प्रकार से बिना किसी पूर्व सूचना या पारदर्शी प्रक्रिया के धार्मिक स्थलों को ढहाया जा रहा है, वह लोकतंत्र की सेहत के लिए कतई ठीक नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी संपत्ति या जमीन को लेकर कोई कानूनी विवाद था भी, तो उसे अदालती प्रक्रिया के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाना चाहिए था। रातों-रात या सुबह के वक्त की जाने वाली ऐसी कार्रवाइयां समाज में अविश्वास की खाई को और अधिक चौड़ा करती हैं तथा कानून के प्रति आम जनता के भरोसे को कमजोर करती हैं।
आगे क्या होगी कानूनी और सामाजिक रणनीति?
सूत्रों के मुताबिक, जमीयत उलमा-ए-हिंद और स्थानीय पीड़ित पक्ष इस मामले को लेकर अब उच्च स्तर पर कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहा है। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और वकीलों की एक टीम इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं की गहराई से समीक्षा कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार आवाज उठाई जा सके और इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों पर रोक लगाई जा सके।
फिलहाल, सहारनपुर और आसपास के इलाकों में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है, लेकिन स्थानीय लोगों के दिलों में सुलग रहा यह आक्रोश आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक या सामाजिक मोड़ ले सकता है। इस पूरी घटना ने देश में एक बार फिर से 'बुलडोजर संस्कृति' और 'कानूनी समानता' के बीच चल रही वैचारिक जंग को नए सिरे से सतह पर ला दिया है।