स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के स्वास्थ्य और उनके पोषण को लेकर सरकारों का रुख अब और अधिक सख्त और संवेदनशील होता जा रहा है। इसी कड़ी में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला लिया है। सोमवार को मुंबई के सह्याद्री अतिथि गृह में प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना (पूर्व में मिड-डे मील योजना) की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने साफ निर्देश दिए हैं कि बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और समयबद्धता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।
पारंपरिक व्यवस्थाओं से इतर अब इस योजना को स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत करने की तैयारी है, ताकि हर एक छात्र तक ताज़ा, गर्म और पौष्टिक आहार समय पर पहुंच सके। आइए जानते हैं इस नई नीति और फैसलों के उन तमाम पहलुओं को, जो आने वाले समय में स्कूली बच्चों की थाली की तस्वीर पूरी तरह बदलने जा रहे हैं।
कक्षा 10वीं तक के विद्यार्थियों को मिल सकता है लाभ
मौजूदा समय में प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना का दायरा मुख्य रूप से कक्षा 8 तक के विद्यार्थियों के लिए ही सीमित है। लेकिन बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास की अहम उम्र को ध्यान में रखते हुए, अब इस दायरे को बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बैठक में संबंधित विभागों को यह निर्देश दिए हैं कि इस योजना को कक्षा 10वीं तक के विद्यार्थियों तक विस्तारित करने की संभावनाओं का गहराई से अध्ययन किया जाए। यदि यह प्रस्ताव पास होता है, तो माध्यमिक विद्यालयों के गरीब और जरूरतमंद बच्चों को भी इसका सीधा लाभ मिलेगा। इसके लिए स्कूल शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग को संयुक्त रूप से एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर जल्द ही मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है।
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मॉडल
भोजन की गुणवत्ता और समय पर वितरण को सुनिश्चित करने के लिए भूगोल के हिसाब से रणनीतियां तय की जा रही हैं। शहरी इलाकों और ग्रामीण-आदिवासी इलाकों की अपनी अलग चुनौतियां होती हैं, जिन्हें ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने दो अलग रास्ते चुने हैं:
- शहरी क्षेत्रों के लिए सेंट्रल किचन (केंद्रीय रसोई): बड़े शहरों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जहां सुगम यातायात और आधुनिक संसाधन उपलब्ध हैं, वहां 'सेंट्रल किचन' की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे बड़े पैमाने पर एक ही स्थान पर उच्च गुणवत्तायुक्त भोजन तैयार कर अलग-अलग स्कूलों तक पहुंचाया जा सके।
- आदिवासी और दूरदराज के इलाकों के लिए स्थानीय व्यवस्था: मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि दूरदराज के पहाड़ी या आदिवासी इलाकों में यदि केंद्रीय रसोई से भोजन भेजा जाए, तो रास्ते की दूरी के कारण भोजन के ठंडे होने या समय पर न पहुंचने का जोखिम रहता है। ऐसी जगहों पर ग्राम पंचायतों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर ही भोजन पकाने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।
स्वयं सहायता समूहों को मिलेगी जिम्मेदारी
स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने और महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से भोजन वितरण और निर्माण की जिम्मेदारी काफी हद तक स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups) को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। इससे न केवल स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिलेगा, बल्कि वे अपनी देखरेख में बच्चों के लिए ताजा और स्वादिष्ट खाना तैयार कर सकेंगी।
इसके अलावा, जिला कलेक्टर, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) और नगर आयुक्तों को यह अधिकार दिया गया है कि वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों, जरूरतों और व्यवहार्यता के आधार पर त्वरित और व्यावहारिक निर्णय लें।
मंत्रियों और अधिकारियों के अहम सुझाव
समीक्षा बैठक के दौरान मंत्रिमंडल के अन्य वरिष्ठ सदस्यों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिन्हें आगामी नीति में शामिल किया जा सकता है:
- स्कूल शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे: उन्होंने सुझाव दिया कि सेंट्रल किचन के दायरे को और बढ़ाया जाए तथा ग्राम पंचायतों को पर्याप्त निधि (फंड) उपलब्ध कराकर उन्हें स्थानीय स्तर पर पौष्टिक भोजन तैयार करवाने की जवाबदेही सौंपी जाए। इसके साथ ही, केंद्र सरकार से यह अनुरोध भी किया जाएगा कि कोटे के चावल की मात्रा को थोड़ा कम करके अन्य मोटे अनाजों या पौष्टिक खाद्यान्न को इसमें शामिल किया जाए ताकि बच्चों को संतुलित आहार मिल सके। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि छात्रों के स्वास्थ्य कार्ड बनाए जा रहे हैं और अब स्वास्थ्य परीक्षण अभिभावकों की प्रत्यक्ष उपस्थिति में किया जाएगा।
- महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे: उन्होंने बताया कि शहरी क्षेत्रों की चुनिंदा आंगनवाड़ियों में इस्कॉन (अन्नामृत फाउंडेशन) के माध्यम से पौष्टिक भोजन मुहैया कराने की पायलट जिम्मेदारी दी जा रही है। इन प्रयोगों के सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद इस व्यवस्था का दायरा और बढ़ाया जाएगा। साथ ही, जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली खाद्य समिति को स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय लेने की पूरी छूट होनी चाहिए।
- मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल: मुख्य सचिव ने बच्चों के स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए यह सख्त सुझाव दिया कि पोषाहार या भोजन के किसी भी मैन्युफैक्चरिंग में मैदे (Refined Flour) का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
भोजन की गुणवत्ता में किसी भी तरह की लापरवाही या कोताही को बर्दाश्त न करने की चेतावनी दी गई है। इसके लिए सरकार भोजन की गुणवत्ता, सेवा के स्तर और समय पर भुगतान के लिए बेहद स्पष्ट और पारदर्शी मानदंड (Norms) तय कर रही है। जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्कूल में मेनू के हिसाब से बच्चों को पौष्टिक भोजन मिले और इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न हो।
निष्कर्ष
कुपोषण के खिलाफ जंग और शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में महाराष्ट्र सरकार का यह कदम बेहद सराहनीय माना जा रहा है। जब स्कूली बच्चों को उनके ही स्थानीय परिवेश के मुताबिक ताजा और पौष्टिक आहार मिलेगा, तो निश्चित तौर पर स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ेगी और उनका स्वास्थ्य भी बेहतर होगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों विभाग मिलकर कितनी जल्दी इस संयुक्त नीति को अमलीजामा पहनाते हैं और मंत्रिमंडल से इसे हरी झंडी मिलती है।