अक्टूबर का महीना शुरू होते ही देश भर में नवरात्र की धूम और डांडिया-गरबे की गूंज सुनाई देने लगती है। इसी उल्लास के बीच पिछले कुछ वर्षों से गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर एक नया और संवेदनशील विवाद हर साल सिर उठाने लगता है। इस साल अक्टूबर 2026 में एक बार फिर यह मुद्दा गरमा गया है, और इस बार प्रतिक्रियाएं केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक संगठनों की तरफ से भी बड़े बयान सामने आ रहे हैं।
मुस्लिम त्यौहार कमेटी की दो टूक: युवाओं से बनाई दूरी बनाने की अपील
गरबे के आयोजनों में गैर-हिंदुओं, विशेषकर मुस्लिम समाज के युवाओं के प्रवेश पर चल रही तीखी बहसों के बीच अब ऑल इंडिया मुस्लिम त्यौहार कमेटी खुलकर सामने आई है। कमेटी ने एक आधिकारिक पत्र जारी कर देश, प्रदेश और तमाम शहरों के मुस्लिम नौजवानों से यह आग्रह किया है कि वे बहुसंख्यक समाज के इन धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें।
कमेटी का तर्क स्पष्ट है कि जब देश और प्रदेश के नीति-निर्माता, यानी मंत्री, विधायक और बहुसंख्यक समाज के लोग यह नहीं चाहते कि मुस्लिम युवा इन पंडालों में आएं, तो आत्मसम्मान और सौहार्द बनाए रखने के लिए युवाओं को खुद ही ऐसे आयोजनों से किनारा कर लेना चाहिए।
देशभर के उलेमाओं और काज़ियों से भी किया गया आग्रह
मामले की गंभीरता को देखते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम त्यौहार कमेटी ने केवल युवाओं को ही संदेश नहीं दिया है, बल्कि धार्मिक नेतृत्व से भी इसमें सहयोग मांगा है। कमेटी के संरक्षक शमशुल हसन की ओर से जारी निर्देशों में मध्यप्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों के तमाम काज़ियों, मुफ़्तियों, उलेमाओं और स्थानीय सामाजिक संगठनों से अपील की गई है कि वे अपने-अपने जिलों, कस्बों और मोहल्लों में युवाओं को समझाएं।
- युवाओं को गरबा पंडालों में न जाने के लिए प्रेरित करना।
- स्थानीय स्तर पर शांति और भाईचारा बनाए रखना।
- किसी भी प्रकार के विवाद या अप्रिय स्थिति से बचना।
कमेटी का मानना है कि इस तरह के कदमों से अनावश्यक तनाव पैदा होने से रोका जा सकता है और दोनों समुदायों के बीच किसी भी प्रकार की गलतफहमी को बढ़ने से बचाया जा सकता है।
राजनीतिक हलकों में उबाल: नेताओं के तीखे बयान
इस पूरे घटनाक्रम पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं आग में घी का काम कर रही हैं। हर दल के नेता अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों और विचारधारा के हिसाब से इस पर बयानबाजी कर रहे हैं, जिससे यह मामला और अधिक तूल पकड़ता जा रहा है।
बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा का विवादित बयान
भोपाल से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक रामेश्वर शर्मा ने गरबे में मुस्लिमों की एंट्री को लेकर एक बेहद तीखा और विवादित बयान दिया है। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "अकेले क्यों, बहन-बेटियों को लेकर आओ, हमारे छोरे भी यहां तैयार हैं।" उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में भूचाल आ गया है। विपक्षी दलों ने इस बयान की कड़ी आलोचना की है, वहीं इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है।
पूर्व मंत्री उषा ठाकुर की चिंताएं
मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री और अपनी बेबाक बयानी के लिए पहचानी जाने वाली नेता उषा ठाकुर ने भी इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है। उनका दावा है कि गरबे के आयोजनों से हर साल बड़ी संख्या में लड़कियां प्रभावित होती हैं, और ऐसे आयोजनों की आड़ में होने वाली गतिविधियों पर लगाम लगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्कृति और आस्था के इन केंद्रों की पवित्रता और सुरक्षा सर्वोपरि है, जिसके साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का पक्ष
दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इस पूरे विवाद पर अलग रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मुस्लिम समाज के लोगों का गरबे जैसे आयोजनों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। मसूद के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय के लोग आम तौर पर इस तरह के सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रमों में जाते ही नहीं हैं, इसलिए इस मुद्दे को तूल देकर बेवजह का माहौल खराब किया जा रहा है।
जमीनी हकीकत और आयोजकों की नई शर्तें
इस साल गरबा आयोजकों ने भी सुरक्षा और विवादों से बचने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं। कई बड़े शहरों में पंडालों के बाहर आयोजकों द्वारा सख्त निर्देश चस्पा किए गए हैं:
- पंडाल में प्रवेश के लिए आधार कार्ड या अन्य वैध पहचान पत्र की अनिवार्यता।
- दोषी पाए जाने पर या नियमों का उल्लंघन करने पर तुरंत कानूनी कार्रवाई।
- गरबा समितियों द्वारा निजी बाउंसरों और सुरक्षा गार्डों की तैनाती।
- गरबे की प्राचीन और पारंपरिक शैली को बढ़ावा देने पर जोर, ताकि आधुनिकता के नाम पर होने वाली गतिविधियों पर लगाम कस सके।
इन तमाम पाबंदियों और दिशा-निर्देशों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद क्या नया मोड़ लेता है।
सामाजिक ताने-बाने पर इसका क्या असर?
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विवाद समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच दूरियां बढ़ाने का काम करते हैं। त्योहार, जो मूल रूप से मेल-मिलाप और उत्सव का माध्यम होते हैं, यदि वे राजनीति और विवादों की भेंट चढ़ जाएं, तो उनका मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है। मुस्लिम त्यौहार कमेटी की ओर से आया यह ताजा बयान भले ही एहतियात के तौर पर दिया गया हो, लेकिन यह इस बात की गवाही देता है कि देश का सामाजिक ताना-बाना किस दौर से गुजर रहा है।
आम जनता और जागरूक नागरिकों का मानना है कि त्यौहार सभी के लिए खुशियां बांटने का जरिया होने चाहिए, न कि ध्रुवीकरण का अखाड़ा। फिलहाल, पुलिस और प्रशासन भी पूरी तरह से मुस्तैद हैं ताकि नवरात्र के इन नौ दिनों के दौरान किसी भी शहर में कानून व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े और सभी लोग शांतिपूर्वक अपने-अपने त्योहारों का आनंद ले सकें।