बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से एक ऐसा विचलित करने वाला और दिल को झकझोर देने वाला दृश्य सामने आया है, जो इंसान की बनाई व्यवस्था और प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। जिले के कटरा प्रखंड में बागमती नदी का जलस्तर बढ़ने और उसके रौद्र रूप के सामने सब कुछ तिनके की तरह बिखर चुका है। जिन इलाकों में कभी खुशियों के मंगलगीत और शहनाइयों की गूंज हुआ करती थी, आज वहां सिर्फ बागमती का मटमैला और भयावह पानी फैला हुआ है।
जब इंसानी हुक्मरानों और राहत के तमाम कागजी दावे धरे के धरे रह गए, तब कटरा की बेबस और लाचार महिलाओं ने किसी अधिकारी की ओर देखने के बजाय अपनी प्राचीन लोकसंस्कृति और आस्था का दामन थाम लिया। बाढ़ के बर्फीले या मटमैले पानी में कमर तक डूबी महिलाएं रुंधे गले से पारंपरिक लोकगीत गाकर मां गंगा को मनाने में जुटी हैं। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं।
व्यवस्था से टूटा भरोसा, अब केवल आस्था का सहारा
बाढ़ की विभीषिका झेल रहे कटरा के ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की तरफ से मदद के नाम पर केवल बयानबाजी हो रही है। धरातल पर न तो पर्याप्त नावें हैं और न ही कोई ठोस राहत सामग्री उन तक समय पर पहुंच पा रही है। तबाही के इस मंज़र के बीच तटबंधों और ऊंचे स्थानों पर खुले आसमान के नीचे रातें गुजारना इन विस्थापितों की मजबूरी बन चुका है।
सालों की मेहनत से बनाई गई गृहस्थी को अपनी आंखों के सामने पानी में बहते देखना किसी भी इंसान के लिए सहन करना मुश्किल होता है। प्रशासनिक सहायता की उम्मीद जब पूरी तरह टूट गई, तब इन महिलाओं ने अपनी लोकसंस्कृति के सुरों का सहारा लिया। पानी के बीच हाथ जोड़े खड़ी महिलाएं गा रही हैं— "टीका जो सोहे, मांगो गंगा माई के... राजा विराज हैं, गंगा मैया... ओढ़न के ओढ़निया हे गंगा माई..."।
सुहाग और परिवार की रक्षा की गुहार
पारंपरिक तौर पर ये लोकगीत घर-आंगन में शुभ अवसरों और खुशहाली के समय गाए जाते थे, लेकिन आज हालात इतने बदल चुके हैं कि यही गीत बागमती के प्रकोप को शांत करने की प्रार्थना बन गए हैं। पानी की तेज धार के सामने खड़ी महिलाएं अपने बच्चों, अपने सुहाग और अपने उजड़ते गांवों को बचाने के लिए मां गंगा से गिड़गिड़ा रही हैं।
- बागमती का कहर: कटरा प्रखंड के दर्जनों गांव जलमग्न हो चुके हैं।
- प्रशासनिक नाकामी: बाढ़ पीड़ितों का आरोप है कि सरकारी राहत महज कागजों तक सीमित है।
- लोकगीतों के जरिए प्रार्थना: व्यवस्था से नाउम्मीद महिलाएं अब पूरी तरह आस्था के भरोसे बैठी हैं।
कटरा के इन जलमग्न गांवों में सन्नाटे को चीरती हुई इन महिलाओं की कातर पुकार साफ सुनी जा सकती है। सूजी हुई और नम आंखों से लगातार पानी घटने का इंतजार कर रहीं इन माताओं-बहनों का साफ कहना है कि अब इंसान या सरकार की बनाई कोई भी व्यवस्था उनके काम नहीं आ रही, इसलिए अब सिर्फ मां गंगा ही इस बड़ी आपदा से उन्हें पार लगा सकती हैं।
बिहार के कई अन्य जिलों में भी बाढ़ जैसे हालात
मुजफ्फरपुर के कटरा और साहेबगंज इलाकों में हालात लगातार गंभीर बने हुए हैं। पश्चिम चंपारण के बाद अब मुजफ्फरपुर में भी नदियां उफान पर हैं और कई निचले इलाकों में बाढ़ का पानी लोगों के घरों के अंदर तक घुस चुका है। हालांकि स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए रखने और राहत कार्यों को तेज करने का दावा कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आ रही है।
फिलहाल, कटरा की इन महिलाओं की वेदना और उनके पारंपरिक लोकगीतों की गूंज यह बताने के लिए काफी है कि जब-जब सिस्टम और हुक्मरान जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने में नाकाम होते हैं, तब-तब देश की संस्कृति और अटूट आस्था ही लोगों को इस तरह के संकट से लड़ने की आंतरिक शक्ति प्रदान करती है।