प्रकृति का प्रकोप जब अपने विकराल रूप में सामने आता है, तो वह इंसानी बस्तियों को तहस-नहस करने के साथ-साथ पीछे छोड़ जाता है तबाही और दर्द का एक ऐसा समंदर, जिससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं। कुछ ऐसी ही दिल दहला देने वाली स्थिति इस समय हमारे पड़ोसी देश नेपाल में बनी हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद अब जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतर रहा है और मलबा हट रहा है, वैसे-वैसे खौफनाक सच सामने आ रहे हैं। कीचड़ और गाद के नीचे से सैकड़ों की संख्या में अज्ञात शव बरामद हो रहे हैं।
पानी उतरने के बाद सामने आ रहा तबाही का खौफनाक मंजर
नेपाल में हाल ही में हुई मूसलाधार बारिश और उसके बाद आई भयंकर आपदा ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा की चपेट में आकर न जाने कितने घर उजड़ गए और हजारों लोग लापता हो गए। स्थानीय प्रशासन, राहत दल और सेना लगातार बचाव और खोज अभियान में जुटी हुई है। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीत रहा है और जलस्तर कम हो रहा है, राहत कर्मियों के सामने एक नई और बेहद संवेदनशील चुनौती खड़ी हो गई है। कीचड़ और सिल्ट के नीचे दबे हुए इंसानी शव अब बड़ी संख्या में मिलने शुरू हो गए हैं, जिनका आंकड़ा डराने वाला है।
शवों की खराब हालत और पहचान का संकट
बरामद किए जा रहे इन शवों की स्थिति बेहद दयनीय और भयावह है। लंबे समय तक पानी और कीचड़ में डूबे रहने के कारण ये शव तेजी से डीकंपोज (सड़ने) होने लगे हैं। कई शव तो ऐसे हैं जिन्हें पहचान पाना तो दूर, यह बता पाना भी मुश्किल हो रहा है कि वे पुरुष के हैं या महिला के। चेहरों की बनावट पूरी तरह बिगड़ चुकी है और पहचान के कोई भी निशान सुरक्षित नहीं बचे हैं। ऐसे में नेपाल प्रशासन और फॉरेंसिक टीमों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर इन शवों की पहचान कैसे की जाए।
अंतिम संस्कार के पारंपरिक तरीकों से हटकर यह फैसला क्यों?
सनातन संस्कृति और नेपाल की स्थानीय परंपराओं के अनुसार, सामान्यतः मृतकों का अंतिम संस्कार अग्नि को समर्पित करके यानी दाह-संस्कार के जरिए किया जाता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने प्रशासन को इस पारंपरिक नियम से हटने के लिए मजबूर कर दिया है। जब इतनी बड़ी संख्या में अज्ञात और सड़े-गले शव मिलने लगे, तो दाह-संस्कार करना न केवल व्यावहारिक रूप से असंभव साबित हो रहा था, बल्कि इससे एक बहुत बड़ा स्वास्थ्य संकट भी पैदा हो सकता था।
स्वास्थ्य और स्वच्छता का गंभीर खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, भारी मात्रा में खुले में पड़े या डीकंपोज हो रहे शवों से घातक बीमारियां फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पानी में सड़ रहे इन शवों से उठने वाली दुर्गंध और बैक्टीरिया आसपास के बचे-खुचे इलाकों को संक्रमित कर सकते हैं, जिससे डायरिया, हैजा और अन्य जलजनित महामारियां फैलने की पूरी आशंका रहती है। इस मेडिकल इमरजेंसी को देखते हुए ही नेपाल प्रशासन ने अत्यंत कड़े और भारी मन से सामूहिक रूप से इन शवों को दफनाने (Mass Burial) का फैसला लिया है।सामूहिक दफनाने के बाद क्या परिजनों को मिल पाएगा अपनों का शव?
यह सबसे बड़ा और मानवीय सवाल है जो इस समय हर किसी के जहन में कौंध रहा है। जब सैकड़ों अज्ञात शवों को सामूहिक रूप से दफना दिया जाएगा, तो क्या वे कभी अपने परिवार वालों को मिल पाएंगे? क्या जिन लोगों के अपने इस आपदा में लापता हुए हैं, वे कभी जान पाएंगे कि उनका प्रिय इस दुनिया में रहा या नहीं?
प्रशासन द्वारा उठाए जा रहे वैज्ञानिक कदम
इस गंभीर सवाल को लेकर नेपाल प्रशासन पूरी तरह से सतर्क और संवेदनशील नजर आ रहा है। भले ही शवों को दफनाया जा रहा है, लेकिन ऐसा पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया और रिकॉर्ड के साथ किया जा रहा है ताकि भविष्य में पहचान की गुंजाइश बनी रहे:
- DNA सैंपलिंग: प्रत्येक शव को दफनाने से पहले उसका डीएनए सैंपल सुरक्षित रख लिया जा रहा है ताकि लापता लोगों के परिजन जब आएं तो मिलान किया जा सके।
- फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी: मृतकों के शरीर पर मौजूद कपड़ों, गहनों, टैटू या अन्य किसी विशिष्ट पहचान चिह्न की हाई-क्वालिटी तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए जा रहे हैं।
- डेटाबेस तैयार करना: दफनाने वाली जगहों पर बाकायदा नंबरिंग की जा रही है ताकि भविष्य में यदि डीएनए मैच होता है, तो उस विशेष कब्र से शव को सुरक्षित निकाला जा सके।
अपनों की तलाश में भटकते परिवार
राहत शिविरों और अस्पतालों के बाहर खड़े उन बदहवास परिजनों का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, जिनके अपने अभी भी लापता हैं। वे हर आने वाले नए शव की खबर पर सहम जाते हैं। एक तरफ आपदा का गम और दूसरी तरफ अपनों के जिंदा या मुर्दा होने की अनिश्चितता—यह स्थिति किसी भी इंसान को अंदर से तोड़ देने के लिए काफी है। नेपाल सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठन इन परिवारों की काउंसलिंग करने और उनकी हरसंभव मदद करने का प्रयास कर रहे हैं।
भविष्य के लिए एक बड़ा सबक
यह आपदा और उसके बाद की यह दर्दनाक प्रशासनिक मजबूरी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए हमारी व्यवस्थाएं कितनी तैयार हैं। मास डिजास्टर मैनेजमेंट (Mass Disaster Management) के तहत इस तरह की विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए फॉरेंसिक साइंस और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल अब अनिवार्य हो गया है।
फिलहाल, नेपाल में इस संकट की घड़ी से निपटना प्रशासन और सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। दफनाए गए इन अज्ञात शवों के जरिए भविष्य में परिवारों को न्याय और अपने प्रियजनों की अंतिम विदाई का सुकून मिल सके, इसके लिए डीएनए बैंक और पुख्ता रिकॉर्ड ही अब एकमात्र उम्मीद बचे हैं।
