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नेताजी के बेटे की कुर्सी सेफ: बिहार में बिना चुनाव लड़े कैसे मंत्री बने रहे दीपक प्रकाश?

नेताजी के बेटे की कुर्सी सेफ: बिहार में बिना चुनाव लड़े कैसे मंत्री बने रहे दीपक प्रकाश?

बिहार की राजनीति में एक बात हमेशा कही जाती है—यहाँ सत्ता के रास्ते कभी बंद नहीं होते, बस रास्ते थोड़े बदल दिए जाते हैं। कुछ ऐसा ही दिलचस्प वाकया बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के साथ देखने को मिला है। बिना कोई चुनाव लड़े सीधे कैबिनेट में जगह पाने वाले मंत्री जी की कुर्सी पर जो खतरा मंडरा रहा था, वह अब पूरी तरह टल चुका है।

6 महीने की मियाद और गद्दी बचाने की चुनौती

संवैधानिक नियमों के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य बने मंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसे 6 महीने के भीतर विधायक या एमएलसी बनना अनिवार्य होता है। दीपक प्रकाश जब मंत्री बने, तब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि उन्हें 6 महीने के अंदर विधान परिषद (MLC) भेज दिया जाएगा।

लेकिन राजनीति इतनी सरल कहाँ होती है! बिहार में भाजपा और सत्ताधारी गठबंधन के पास सीटों का अंकगणित काफी उलझा हुआ था। पार्टी को कई बड़े चेहरों और समीकरणों को साधना था, जिनमें भोजपुरी पावरस्टार पवन सिंह का नाम भी प्रमुखता से तैर रहा था। इस खींचतान में दीपक प्रकाश का एमएलसी बनना टलता दिख रहा था और उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी।

आखिरकार मिला 'राज्यपाल कोटे' का सहारा

जब चुनाव या उपचुनाव के जरिए रास्ता बनता नहीं दिखा, तब आखिरकार सरकार ने सबसे सेफ रास्ता चुना—राज्यपाल कोटा (Governor's Quota)। दीपक प्रकाश को राज्यपाल मनोनीत श्रेणी से विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया।

  • सीधे मंत्री पद: बिना विधायक बने कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली।
  • समय की पाबंदी: 6 महीने की संवैधानिक समय सीमा खत्म होने से पहले सदस्यता जरूरी थी।
  • मास्टरस्ट्रोक: राज्यपाल कोटे से MLC बनाकर मंत्री पद सुरक्षित कर लिया गया।

परिवारवाद पर फिर छिड़ी राजनीतिक बहस

इस पूरे घटनाक्रम के बाद बिहार का राजनीतिक तापमान एक बार फिर चढ़ गया है। विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि जो पार्टियां आरजेडी (RJD), सपा (SP) और कांग्रेस पर दिन-रात 'परिवारवाद' का आरोप लगाती हैं, वे खुद 'नेताजी के बेटे' को कुर्सी पर बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

बिना जनमत हासिल किए मंत्री बनना और फिर नामांकित कोटे से सदन में प्रवेश पाना—यह कदम आम जनता और कार्यकर्ताओं के बीच भारी चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि कुर्सी बचाने के इस राजनीतिक दांव का असर आने वाले चुनावों में क्या रंग दिखाता है।

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तनु उपाध्याय

तनु उपाध्याय

Senior Sub Editor

तनु उपाध्याय एंटरटेनमेंट जगत की हलचल को करीब से समझती हैं और उसे दर्शकों के सामने आकर्षक अंदाज में पेश करती हैं। फिल्मों, टीवी, ओटीटी और वायरल ट्रे...

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