पर्यावरण और जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर देश की सर्वोच्च हरित अदालत यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने एक बार फिर अपनी सख्ती का अहसास कराया है। झारखंड के हजारीबाग जिले के ऐतिहासिक ओकनी तालाब के जीर्णोद्धार और संरक्षण के मामले में लापरवाही बरतने पर एनजीटी ने जिला प्रशासन को आड़े हाथों लिया है। अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समय पर अनुपालन रिपोर्ट पेश न किए जाने को ट्रिब्यूनल ने बेहद गंभीरता से लिया है, जिसके बाद हजारीबाग के जिला दंडाधिकारी (डीएम) को सीधा नोटिस जारी किया गया है। इस कड़े कदम से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
कलकत्ता पीठ में हुई सुनवाई, अदालत ने जताई कड़ी नाराजगी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले की सुनवाई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की कोलकाता स्थित पूर्वी क्षेत्र पीठ (Eastern Zonal Bench) में हो रही है। विगत 10 सितंबर को इस मामले पर एक अहम सुनवाई तय थी। सुनवाई के दौरान जब पीठ ने पत्रावलियों और दस्तावेजों को खंगाला, तो यह बात सामने आई कि पूर्व में दिए गए आदेशों का अनुपालन करने के बाद जो रिपोर्ट दाखिल की जानी थी, वह तय समय सीमा के भीतर जमा नहीं कराई गई।
अदालत ने इसे प्रशासनिक शिथिलता और आदेशों की अवहेलना मानते हुए गहरी नाराजगी व्यक्त की। एनजीटी ने साफ कर दिया है कि पर्यावरण और जल स्रोतों से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसी के तहत जिला दंडाधिकारी को नोटिस जारी कर दो महीने के भीतर शपथपत्र (Affidavit) के रूप में विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया गया है।
व्यक्तिगत रूप से पेश होने या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ने का आदेश
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एनजीटी ने केवल लिखित रिपोर्ट मांगने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि आगामी सुनवाई के दौरान संबंधित सभी रिकॉर्ड और फाइलों के साथ जिला दंडाधिकारी को या तो व्यक्तिगत रूप से या फिर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अनिवार्य रूप से उपस्थित होना होगा।
इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई अब आगामी 20 नवंबर को मुकर्रर की गई है। इस तय तिथि से पहले प्रशासन को तालाब के संरक्षण को लेकर अब तक उठाए गए कदमों का पूरा लेखा-जोखा अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
हजारीबाग पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट ने उठाया था यह मुद्दा
यह पूरा कानूनी मामला तब प्रकाश में आया जब 'हजारीबाग पर्यावरण संरक्षण ट्रस्ट' के अध्यक्ष जयगोपाल राय ने इस ऐतिहासिक जल स्रोत की बदहाली के खिलाफ आवाज उठाई। ट्रस्ट की तरफ से एनजीटी के समक्ष याचिका दायर कर ओकनी तालाब के अस्तित्व को बचाने और इसके सौंदर्यीकरण की गुहार लगाई गई थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने इससे पहले तीन जुलाई 2025 को एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया था। उस आदेश में ट्रिब्यूनल ने हजारीबाग के जिला दंडाधिकारी को यह निर्देश दिया था कि वे नगर निगम द्वारा ओकनी तालाब के संरक्षण के लिए तैयार की गई कार्ययोजना (Action Plan) को धरातल पर लागू कराएं। अदालत ने इसके लिए तीन जुलाई 2026 तक का समय तय किया था, जिसमें कार्य को पूरा करने और 15 जुलाई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने की बात कही गई थी। लेकिन तय डेडलाइन बीत जाने के बाद भी जब रिपोर्ट नहीं पहुंची, तो एनजीटी को यह सख्त कदम उठाना पड़ा।
ऐतिहासिक ओकनी तालाब का महत्व और वर्तमान चुनौतियां
हजारीबाग शहर के बीचों-बीच स्थित ओकनी तालाब केवल एक जल निकाय नहीं है, बल्कि यह शहर की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर का एक अहम हिस्सा है। कभी यह तालाब आसपास के भूजल स्तर को बनाए रखने और स्थानीय लोगों के लिए जल का एक प्रमुख स्रोत हुआ करता था। समय के साथ शहरीकरण के दबाव, अतिक्रमण और रख-रखाव के अभाव में इस ऐतिहासिक धरोहर का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था।
- जल संचयन संकट: तालाब के सिकुड़ने और गंदे पानी के मिलने से इसका पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बिगड़ गया है।
- अतिक्रमण की समस्या: तालाब के आसपास अवैध निर्माणों और गंदगी के कारण स्थानीय लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
- प्रशासनिक सुस्ती: नगर निगम और जिला प्रशासन के बीच समन्वय की कमी के कारण पुनरुद्धार कार्य कछुए की गति से चल रहे हैं।
जिले में अन्य बुनियादी मुद्दों पर भी उठ रहे हैं सवाल
ओकनी तालाब के इस मामले के अलावा भी हजारीबाग जिले में इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर कई मोर्चों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में झारखंड हाई कोर्ट ने शहर के यातायात सुधार को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए हजारीबाग के प्रमुख 20 चौराहों पर ऑटोमेटेड ट्रैफिक लाइट लगाने का सख्त आदेश दिया है। इसके अलावा, सदर अस्पताल में एक महिला की मौत के बाद इलाज में कथित लापरवाही को लेकर स्थानीय लोगों का गुस्सा फूटा था और झंडा चौक पर जोरदार प्रदर्शन किया गया था। वहीं, खास महल की जमीन पर 11 महीने के एग्रीमेंट की आड़ में करोड़ों की इमारतें खड़े करने का खेल भी सुर्खियों में बना हुआ है।
क्या अब जागेगा जिला प्रशासन?
पर्यावरणविदों और आम नागरिकों का मानना है कि यदि एनजीटी जैसी संस्थाएं इस तरह का कड़ा रुख न अपनाएं, तो सरकारी फाइलों में ही योजनाएं दम तोड़ती रहेंगी। ओकनी तालाब मामले में नोटिस मिलने के बाद अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या आगामी 20 नवंबर को होने वाली सुनवाई से पहले प्रशासन तालाब के जीर्णोद्धार का काम तेजी से पूरा कर पाएगा और अदालत को संतुष्ट करने वाली रिपोर्ट पेश कर पाएगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस कानूनी चाबुक के बाद अब प्रशासन के लिए लापरवाही बरतना मुमकिन नहीं होगा।