जब वादों की नींव पर खड़े हों छलावा के महल, तो सुलग उठती है जमीन
झारखंड के बोकारो जिले का दुग्दा थाना क्षेत्र इन दिनों एक सुलगते हुए अंगार की तरह है। यहाँ की फिजाओं में कोयले की धूल के साथ-साथ एक गहरी नाराजगी और लाचारी की महक घुली हुई है। पिछले 17 महीनों से लगातार जमीन के सीने को चीरकर काला सोना (कोयला) निकाला जा रहा है, मुनाफा कमाया जा रहा है, बड़े-बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा रहा है, लेकिन जिन जमीनों के बूते यह सब हो रहा है, उनके असली मालिक आज भी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
भारत को ऊर्जा देने वाले इन इलाकों की हकीकत बेहद विचलित करने वाली है। पिछले 17 महीनों से मुआवजे और जमीन की रजिस्ट्री के नाम पर सिर्फ तारीखें बदली जा रही हैं, वादों के पुल बांधे जा रहे हैं और जब भी उम्मीद की कोई किरण दिखती है, प्रबंधन का एक और वादा कागजों पर दम तोड़ देता है। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि रिकॉर्ड बताते हैं कि यह आठवीं बार है जब प्रबंधन ने अपनी ही तय की हुई समयसीमा को तोड़ा है।
17 महीनों का लंबा इंतजार और खोखले आश्वासन
सिजुआ भूमि अधिग्रहण प्रभावित विस्थापितों का सब्र अब पूरी तरह से जवाब दे चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपनी उपजाऊ जमीनें, अपनी पुश्तैनी पहचान सिर्फ इस उम्मीद में देश के इस बड़े उपक्रम को सौंपी थी कि उनके और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन इसके उलट उन्हें मिला क्या? सिर्फ धोखे का एक लंबा सिलसिला।
- लगातार खनन: जमीन अधिग्रहण के बाद से भारी मशीनें लगातार कोयला निकाल रही हैं।
- ठप पड़ा मुआवजा: रैयतों के बैंक खातों में आज तक एक फूटी कौड़ी मुआवजे के तौर पर नहीं पहुंची है।
- रजिस्ट्री का खेल: जमीन के कागजात और मालिकाना हक की कानूनी प्रक्रियाओं को बार-बार जानबूझकर लटकाया जा रहा है।
- टूटे वादे: पिछले 17 महीनों के दौरान प्रबंधन की ओर से कई बार लिखित और मौखिक आश्वासन दिए गए, लेकिन हर बार वे झूठे साबित हुए।
अधिकारियों की कार्यशैली पर खड़े होते गंभीर सवाल
किसी भी औद्योगिक परियोजना के सफल संचालन के लिए स्थानीय लोगों का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है। लेकिन दुग्दा क्षेत्र में प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने जिस प्रकार की उदासीनता दिखाई है, उसने कॉर्पोरेट जिम्मेदारी (CSR) और नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जमीन देने वाले किसान जब अपने ही हक की भीख मांगने को मजबूर हों, तो यह व्यवस्था की एक बड़ी विफलता को दर्शाता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ बैठकों के नाम पर समय बर्बाद कर रहे हैं। जब भी विस्थापित अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते हैं, उन्हें कुछ हफ्तों का नया समय दे दिया जाता है। इस बार जब आठवीं बार वादा खिलाफी हुई, तो ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।
विस्थापितों का फूटा गुस्सा, अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान
बुनियादी अधिकारों से वंचित किए जा रहे इन विस्थापितों ने अब चुप बैठने से इनकार कर दिया है। दुग्दा थाना क्षेत्र के प्रभावित परिवारों ने एकजुट होकर हुंकार भरी है कि वे अब झूठे आश्वासनों के झांसे में नहीं आएंगे। उनका सीधा और स्पष्ट कहना है—'या तो पूरा मुआवजा और रजिस्ट्री का काम तुरंत पूरा हो, या फिर हमारी जमीन पर खनन कार्य पूरी तरह से बंद किया जाए।'
स्थानीय बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि समय रहते इस मामले पर गंभीर संज्ञान नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन विकराल रूप ले सकता है। कोयला उत्पादन बाधित होने से देश के ऊर्जा क्षेत्र पर भी असर पड़ सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी लापरवाह प्रबंधन की होगी।
आगे क्या होगी रणनीति?
ग्रामीणों की महापंचायत में यह तय किया गया है कि यदि आने वाले कुछ दिनों में खातों में मुआवजे की राशि और रजिस्ट्री प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, तो वे चक्का जाम करने से लेकर अनिश्चितकालीन धरने तक जाने के लिए बाध्य होंगे। ठंड और तमाम प्रशासनिक दबावों के बावजूद इन विस्थापितों के हौसले बुलंद हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या इस बार भी प्रशासनिक मशीनरी आश्वासन की घुट्टी पिलाकर मामले को दबाने में कामयाब होती है, या फिर 17 महीने के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार इन अन्नदाताओं और जमीन मालिकों को उनका हक मिल पाता है। सच्चाई यह है कि विकास की इस अंधी दौड़ में पिस रहे इन आम इंसानों का दर्द अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।