बिहार की ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण निरंजना (फल्गू) नदी को दोबारा सदानीरा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। नदी के पुनरुद्धार के लिए अगले दस वर्षों में इसके उद्गम से संगम तक 1,000 छोटे-बड़े चेकडैम बनाने और दोनों किनारों पर 10 लाख से अधिक पौधे रोपने की योजना पर काम चल रहा है।
हिंदू और बौद्ध धर्म में समान रूप से आदरणीय इस नदी के तट पर गया का प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर स्थित है। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार, इसी नदी के तट पर कठोर तपस्या के बाद सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ था। हालांकि, बारिश के कुछ महीनों को छोड़कर यह नदी साल के अधिकांश समय सूखी रहती है, जिससे दुनियाभर से आने वाले पर्यटकों, श्रद्धालुओं और पर्यावरण प्रेमियों को निराशा होती है।
झारखंड से निकलकर बिहार में बहती है नदी
यह नदी झारखंड के चतरा जिले के सिमरिया ब्लॉक के बेलगड्डा और लावालौंग क्षेत्र से निकलती है। हंटरगंज होते हुए जब यह बिहार में प्रवेश करती है, तो इसका दायरा बढ़ जाता है। बोधगया तक इसे निरंजना और उसके आगे फल्गू के नाम से पुकारा जाता है आगे चलकर यह पुनपुन नदी में मिल जाती है, जो कि गंगा की एक उपनदी है। बौद्ध साहित्यों में इस नदी में सालभर जल प्रवाह का उल्लेख मिलता है, लेकिन वर्तमान में यह मौसमी नदी बनकर रह गई है।
निरंजना रिवर रिचार्ज मिशन और सरकारी पहल
नदी को पुनर्जीवित करने के लिए औरंगाबाद निवासी संजय सज्जन सिंह के नेतृत्व में पिछले पांच वर्षों से 'निरंजना रिवर रिचार्ज मिशन' सक्रिय है। संजय सज्जन सिंह इससे पहले बिहार की रामरेखा नदी को भी पुनर्जीवित कर चुके हैं। इस मुहिम के तहत 22 अगस्त 2021 को बौद्ध भिक्षुओं, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नदी के तट पर प्रार्थना कर और दीप प्रज्जवलित कर मिशन की औपचारिक शुरुआत की थी। इसके अलावा, केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने भी इसके महत्व को समझते हुए 'नमामि गंगे' के अंतर्गत 'नमामि निरंजन अभियान' की शुरुआत की है। केंद्रीय मंत्रियों और प्रदेश के राज्यपाल समेत कई गणमान्य लोग इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा और जापान के प्रतिनिधियों से भी संपर्क साधा गया है।
पेड़ और चेकडैम से बदलेगी स्थिति
विशेषज्ञों और मिशन से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि नदी के दोनों किनारों पर पांच किलोमीटर के दायरे में वर्षा जल का अधिकतम संचयन और भूजल दोहन पर रोक लगाकर स्थिति बदली जा सकती है। इसी उद्देश्य के तहत 1,000 चेकडैम निर्माण और 10 लाख पेड़ लगाने का लक्ष्य है। पेड़ों की जड़ें जमीन में पानी को सोखकर आसपास के कुओं, तालाबों और नदियों तक पहुंचाती हैं। इस अभियान के तहत अब तक लगभग 450 करोड़ लीटर पानी की बचत के लिए जल संरचनाएं (वाटर बॉडीज) तैयार की जा चुकी हैं। स्थानीय मंदिरों, मस्जिदों और विशेष रूप से छठ पूजा समितियों को भी इस जल संरक्षण अभियान से जोड़ा जा रहा है ताकि जनसहभागिता सुनिश्चित की जा सके।