जब मेरठ जेल में बिछ गया था मौत का साया
साल 2014 की एक सर्द सुबह। उत्तर प्रदेश की मेरठ जिला जेल के भीतर का माहौल बेहद तनावपूर्ण और सन्नाटे से भरा हुआ था। हर तरफ सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे और जेल प्रशासन के अधिकारी अपनी घड़ियों की टिक-टिक पर नजर गड़ाए हुए थे। देश को दहला देने वाले बहुचर्चित 'निठारी कांड' के मुख्य दरिंदे सुरेंद्र कोली को फंदे पर लटकाने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी।
जेल के फांसी घर में हर एक चीज़ अपनी जगह पर थी। कानून के मुताबिक सभी औपचारिकताएं पूरी की जा चुकी थीं। मेरठ जेल प्रशासन ने नियमों का पालन करते हुए जल्लाद को भी बुलवा लिया था। रस्सी की जांच हो चुकी थी, फंदा पूरी तरह तैयार था और बस अंतिम आदेश का इंतजार किया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि पीड़ितों के परिजनों को आखिरकार न्याय मिलने ही वाला है, लेकिन इतिहास कुछ और ही पलटने वाला था।
अदालत का वह आदेश जिसने रोक दी सांसें
फांसी के तय समय से ठीक कुछ घंटे पहले, जब चारों तरफ मौत की खामोशी छाई हुई थी, अचानक सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसा कानूनी निर्देश आया जिसने जेल प्रशासन के हाथ-पांव फुला दिए। देश की सर्वोच्च अदालत ने आधी रात के वक्त सुनवाई करते हुए सुरेंद्र कोली की फांसी की सजा पर अचानक रोक लगा दी।
इस नाटकीय घटनाक्रम ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान निठारी कांड की तरफ खींच लिया। यह कोई आम फैसला नहीं था। देश के वरिष्ठ वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एक टीम ने रात के अंधेरे में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और तर्क दिया था कि दया याचिका पर राष्ट्रपति द्वारा फैसला लेने में हुई देरी और कुछ अन्य कानूनी बिंदुओं के आधार पर फांसी की सजा की समीक्षा की जानी चाहिए।
क्या था निठारी कांड और क्यों आज भी सिहर उठती है रूह?
यह कहानी है साल 2005 से 2006 के बीच की, जब दिल्ली से सटे नोएडा के सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी से ऐसी खौफनाक सच्चाइयां बाहर आईं जिन्हें सुनकर देश की अंतरात्मा हिल गई थी। इस कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर और उसका घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली थे। शुरुआत में जब इलाके से छोटे बच्चे और महिलाएं अचानक गायब होने लगे, तो किसी को अंदेशा नहीं था कि इस आलीशान बंगले के पीछे नरक का द्वार खुला हुआ है।
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने कोठी के पीछे बने नाले और आसपास के इलाकों से इंसानी कंकाल, हड्डियां और बच्चों के कपड़े बरामद किए। जैसे-जैसे परतें खुलीं, वैसे-वैसे देश के सामने इस खौफनाक अपराध की ऐसी दास्तान आई, जिस पर यकीन करना नामुमकिन सा लग रहा था। सुरेंद्र कोली ने पुलिस पूछताछ में जो खुलासे किए, उसने अच्छे-अच्छे इन्वेस्टिगेटरों के रोंगटे खड़े कर दिए थे।
कानूनी पेंच और लंबी न्यायिक लड़ाई
निठारी कांड के मामलों में निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई। सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर के खिलाफ कई मामलों में मुकदमे दर्ज किए गए। सबूतों के अभाव और कड़ियों को जोड़ने की जटिल प्रक्रिया के चलते कई मामलों में आरोपियों को बरी भी किया गया, तो वहीं कुछ मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई।
साल 2014 का वह वाकया जब कोली फांसी के फंदे तक पहुंचते-पहुंचते बचा, उसने भारतीय न्याय प्रणाली और डेथ पेनल्टी (मृत्युदंड) को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस को जन्म दे दिया था। जानकारों का मानना है कि देश में जब भी रेयर ऑफ द रेरेस्ट मामलों में फांसी की सजा पर अमल की बात आती है, तो कानूनी और मानवाधिकार संबंधी तमाम बारीकियों का सामना करना ही पड़ता है।
पीड़ितों के परिवारों का अंतहीन इंतजार
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दर्दनाक पहलू वे माता-पिता और परिवार हैं जिन्होंने अपने मासूम बच्चों को खोया है। वर्षों बीत जाने के बाद भी उनके मन में एक ही सवाल गूंजता है कि क्या उन्हें कभी असली और मुकम्मल न्याय मिल पाएगा? तारीखें बदलती हैं, अदालती प्रक्रियाएं लंबी खिंचती हैं, लेकिन उन परिवारों के घरों का सूनापन कभी कम नहीं होता।
आज भले ही साल 2026 चल रहा हो और इस घटना को दो दशक से अधिक का समय बीत चुका हो, लेकिन 'निठारी कांड' का नाम आते ही आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं और मन सिहर उठता है। मेरठ जेल में 12 साल पहले टली वह फांसी इस हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील मामले के सबसे बड़े मोड़ों में से एक के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है।