अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को आतंकवाद के खिलाफ मसीहा साबित करने की जुगत में लगा पाकिस्तान एक बार फिर अपने पुराने और फरेबी पैंतरों पर उतर आया है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की आगामी अहम बैठक से ठीक पहले पाकिस्तान सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे वैश्विक समुदाय आंखें मूंदकर स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। भारत के सबसे बड़े दुश्मनों में शुमार और वैश्विक आतंकी घोषित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर पर पाकिस्तान ने महज 70 लाख पाकिस्तानी रुपये का ईनाम घोषित किया है। इस नामात्र की रकम को देखकर विशेषज्ञ इसे सिर्फ एक ढकोसला और अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने की भद्दी कोशिश बता रहे हैं।
FATF की तलवार और पाकिस्तान की नींद
सितंबर 2026 के इस दौर में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के कड़े पैमाने तय किए जा रहे हैं, तब पाकिस्तान एक बार फिर FATF की 'ग्रे लिस्ट' या उससे भी बदतर 'ब्लैक लिस्ट' में जाने के डर से कांप रहा है। अक्टूबर महीने में होने वाली FATF की प्लीनरी बैठक से ठीक पहले इस तरह की घोषणाएं करना पाकिस्तान का पुराना हथकंडा रहा है। जब भी आतंकवाद के वित्तपोषण (Terror Financing) पर लगाम कसने के लिए वैश्विक दबाव बढ़ता है, इस्लामाबाद इस तरह के कागजी कदम उठाकर दुनिया को भ्रमित करने की कोशिश करता है.
मसूद अजहर, जिसने भारत में संसद हमले से लेकर पुलवामा और पठानकोट जैसे कई खौफनाक आतंकी हमलों की साजिश रची, उस पर पाकिस्तान द्वारा महज 70 लाख पाकिस्तानी रुपये (जो भारतीय मुद्रा में और भी कम बैठते हैं) का इनाम रखना, उसकी गंभीरता की पोल खोलने के लिए काफी है। दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादियों में से एक पर इतनी कम कीमत लगाना अपने आप में हास्यास्पद है.
धोखेबाजी का पुराना इतिहास
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह कार्रवाई पूरी तरह से दिखावे की है। अतीत में भी ऐसा कई बार देखा गया है जब पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैइया और जैश जैसे संगठनों के सरगनाओं के खिलाफ नाममात्र के मुकदमे दर्ज किए या उन पर दिखावटी इनाम रखे, लेकिन जब बात सजा देने की आई, तो वे या तो 'अज्ञातवास' में चले गए या उन्हें सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचा दिया गया।
- दिखावटी कार्रवाई: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दिखाने के लिए कि आतंकवादियों पर एक्शन लिया जा रहा है, कागजी कार्रवाई पूरी की जाती है।
- वित्तीय ढकोसला: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और FATF से बेलआउट पैकेज या राहत पाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं।
- सुरक्षित पनाहगाह: कागजों पर आतंकी घोषित करने के बाद भी इन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की सुरक्षा में रखना जारी रहता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पैनी नजर
इस बार हालांकि, ग्लोबल वॉचडॉग पाकिस्तान के इन छलावों को लेकर काफी सतर्क हो चुका है। अमेरिका और पश्चिमी देश अब सिर्फ बयानों या कागजी घोषणाओं से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। FATF के मानदंड बेहद सख्त हैं और वहां केवल दिखावे से काम नहीं चलता। पाकिस्तान को यह साबित करना होगा कि उसने वास्तव में अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकी नेटवर्क्स को नेस्तनाबूद किया है या नहीं।
मसूद अजहर पर घोषित यह 70 लाख का इनाम वैश्विक बिसात पर पाकिस्तान की खोखली चाल से ज्यादा कुछ नहीं है। जानकारों का कहना है कि यह रकम इतनी कम है कि खुद पाकिस्तान के भीतर भी इस पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या एक खूंखार वैश्विक आतंकी की कीमत सिर्फ इतनी ही आंकी जा सकती है?
भारत की कड़ी प्रतिक्रिया और कूटनीतिक रुख
भारत सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए है। नई दिल्ली का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से ऑपरेट हो रहे तमाम आतंकी बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से नष्ट नहीं करता और अपराधियों को भारत को नहीं सौंपता, तब तक ऐसे किसी भी दिखावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की यह पैंतरेबाज़ी उसकी पुरानी रणनीति का ही हिस्सा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य वैश्विक निगरानी संस्थाओं को गुमराह करना है। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दोहरे चरित्र को लगातार बेनकाब करता रहा है और आने वाले दिनों में FATF की बैठक में भी इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा सकता है।
आगे क्या होगा?
अक्टूबर में होने वाली FATF की बैठक तय करेगी कि पाकिस्तान को राहत मिलेगी या उसकी मुश्किलें और बढ़ेंगी। लेकिन इतना तय है कि मसूद अजहर पर 70 लाख का यह इनाम पाकिस्तान की नीयत और उसकी व्यवस्था पर एक बार फिर गहरा सवालिया निशान छोड़ गया है। दुनिया अब शब्दों पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों पर यकीन करती है, और पाकिस्तान का यह नया पैंतरा एक बार फिर से उसके वैश्विक स्तर पर बेनकाब होने का कारण बन रहा है।