राजधानी के सबसे बड़े महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर लगा ग्रहण
बिहार की राजधानी पटना में रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए शुरू किए गए एक बड़े प्रोजेक्ट की रफ्तार पर बड़ा ब्रेक लग गया है। करीब 95 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बनाए जा रहे नए रेल टर्मिनल का निर्माण कार्य तय सीमा बीतने के बाद भी अधूरा लटका हुआ है। इस स्थिति ने न केवल रेलवे प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन लाखों यात्रियों की उम्मीदों को भी झटका दिया है जो इस टर्मिनल के शुरू होने से सुगम यात्रा की उम्मीद लगाए बैठे थे।
वर्षों से क्षेत्र में ट्रेनों के बढ़ते दबाव को कम करने और यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं देने के उद्देश्य से इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की गई थी। शुरुआत में सब कुछ योजना के मुताबिक चलता दिख रहा था, लेकिन जमीनी स्तर पर तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों ने इस हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट को तय समयसीमा से कोसों दूर लाकर खड़ा कर दिया है।
क्यों अटका है 24 महीने बाद भी काम?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे निर्माण कार्य के पिछड़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह 'वाशिंग पिट' (Washing Pit) का निर्माण कार्य तय योजना के अनुसार आगे न बढ़ पाना है। रेलवे तकनीकी भाषा में वाशिंग पिट किसी भी आधुनिक टर्मिनल का दिल माना जाता है, क्योंकि यहीं पर लंबी दूरी की ट्रेनों की सफाई, मेंटेनेंस और वाटरिंग का काम होता है। इसके बिना कोई भी टर्मिनल पूरी तरह से संचालित नहीं किया जा सकता है।
निर्माण स्थल पर मिट्टी की स्थिति, जल निकासी की समस्याओं और डिजाइन में बार-बार किए गए बदलावों ने वाशिंग पिट के काम को बुरी तरह प्रभावित किया है। इंजीनियरों और ठेकेदारों के बीच आपसी समन्वय की कमी और प्रशासनिक लालफीताशाही के कारण पिछले 24 महीनों से यह महत्वपूर्ण हिस्सा लगभग ठप पड़ा हुआ है। नतीजा यह है कि स्टेशन की इमारत और पटरियों का काम होने के बावजूद, मुख्य ऑपरेशनल यूनिट तैयार न होने के कारण पूरा प्रोजेक्ट अधर में लटका है।
यात्रियों की बढ़ी मुश्किलें, समय और पैसे की हो रही बर्बादी
पटना जंक्शन और राजेंद्र नगर टर्मिनल पर पहले से ही यात्री भार अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा है। पीक आवर्स या त्योहारी सीजन में ट्रेनों की आवाजाही को मैनेज करना रेलवे अधिकारियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता है। इस नए टर्मिनल के शुरू होने से कई ट्रेनों को यहां शिफ्ट किए जाने की योजना थी, जिससे मुख्य स्टेशनों का बोझ कम होता।
- यात्री दबाव: पटना जंक्शन पर ट्रेनों का अतिरिक्त दबाव कम नहीं हो पा रहा है।
- वित्तीय नुकसान: प्रोजेक्ट में देरी के चलते लागत बढ़ने की पूरी संभावना है, जिसका बोझ अंततः जनता की गाढ़ी कमाई पर पड़ता है।
- सुविधाओं में देरी: आधुनिक वेटिंग लांग, पार्सल हब और बेहतर पार्किंग जैसी सुविधाएं फिलहाल कागजों तक ही सीमित रह गई हैं।
रेलवे बोर्ड और स्थानीय प्रशासन की समीक्षा बैठकें बेनतीजा
इस देरी को लेकर पिछले कुछ महीनों में कई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें हो चुकी हैं। रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर जोन के महाप्रबंधक स्तर तक के अधिकारी इस प्रोजेक्ट का निरीक्षण कर चुके हैं। हर बार निर्माण एजेंसी को कड़ी चेतावनी और नई डेडलाइन दी जाती है, लेकिन जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं। निर्माण स्थल पर मजदूरों की कम संख्या और आधुनिक मशीनों के अभाव साफ तौर पर देखे जा सकते हैं।
स्थानीय नागरिकों और रेल यात्रियों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का उपयोग होने वाली परियोजनाओं की इस तरह से अनदेखी क्यों की जा रही है। समय पर प्रोजेक्ट पूरा न होने से न सिर्फ सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है, बल्कि विकास कार्यों की गति पर भी सवालिया निशान लगते हैं।
आगे की क्या है योजना और कब तक पूरी होने की उम्मीद?
ताजा अपडेट के अनुसार, रेलवे अब इस प्रोजेक्ट को गति देने के लिए एक नई कार्ययोजना तैयार कर रहा है। वाशिंग पिट के निर्माण में आ रही तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए विशेष विशेषज्ञों की टीम बुलाई गई है। ठेका एजेंसी को भी सख्त हिदायत दी गई है कि यदि निर्धारित संशोधित समयावधि में काम पूरा नहीं किया गया, तो अनुबंध रद्द करने के साथ-साथ भारी पेनल्टी भी लगाई जा सकती है।
हालांकि, धरातल पर जिस सुस्ती से काम चल रहा है, उसे देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि आम जनता को इस आधुनिक रेल टर्मिनल की सौगात मिलने के लिए अभी और कितना इंतजार करना पड़ेगा। रेलवे के जानकारों का मानना है कि यदि प्रशासन ने अब भी कड़े कदम नहीं उठाए, तो इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट को पूरा होने में कई महीने और लग सकते हैं।