हिंदू सनातन संस्कृति में पितृ पक्ष का समय अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह विशेष अवधि है जब लोग अपनी पिछली पीढ़ियों यानी पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। इस वर्ष पितृ पक्ष को लेकर पंचांग में कुछ खास योग बन रहे हैं, जिनके बारे में हर श्रद्धालु को जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने धार्मिक अनुष्ठान समय पर और पूरी विधि-विधान के साथ संपन्न कर सकें।
कब से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष 2026?
पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष का आरंभ शनिवार, 26 सितंबर से होने जा रहा है। इन पंद्रह दिनों तक चलने वाले इस विशेष कालखंड का समापन 10 अक्टूबर को पितृ अमावस्या के दिन होगा। जैसे ही यह पखवाड़ा समाप्त होगा, उसके अगले दिन यानी 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र का पावन पर्व शुरू हो जाएगा। इन दिनों लोग अपने घरों में पुरखों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं ताकि पितृगण तृप्त होकर अपने परिजनों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दें।
30 सितंबर को बन रहा है विशेष तिथि संयोग
इस बार के श्राद्ध पक्ष में एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संयोग देखने को मिल रहा है। पंचांग के नियमों के अनुसार, इस बार 30 सितंबर को एक ही दिन दो तिथियों यानी चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध करना होगा। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
- तीस सितंबर को चतुर्थी तिथि दोपहर 2 बजकर 50 मिनट तक प्रभावी रहेगी।
- इसके तुरंत बाद पंचमी तिथि का आरंभ हो जाएगा।
- अगले दिन यानी 1 अक्टूबर को दोपहर का समय आने से पहले ही पंचमी तिथि समाप्त हो जाएगी।
- तिथि घटने और बढ़ने के इस गणितीय नियम के कारण, चतुर्थी और पंचमी दोनों का श्राद्ध 30 सितंबर की दोपहर को ही किया जाएगा।
ज्योतिषाचार्यों और जानकारों का मानना है कि श्राद्ध कर्म और पूजा-पाठ के लिए हमेशा दोपहर 12 बजे से पहले का समय सबसे उत्तम और उपयुक्त माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे तिथियों के इस फेर को ध्यान में रखते हुए अपने घरों में पंडितों की सलाह से सही समय पर अनुष्ठान पूरे करें।
सर्वपितृ अमावस्या का महत्व और अज्ञात तिथियों का समाधान
पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। यह दिन उन परिवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जिन्हें अपने किसी पूर्वज की मृत्यु की सटीक तिथि या महीना याद नहीं रहता है। यदि किसी अपने की पुण्यतिथि की जानकारी न हो, तो वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं। इस दिन सभी अज्ञात और ज्ञात पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।
श्राद्ध पक्ष में इन बातों का रखें विशेष ध्यान
पितृ पक्ष के इन पंद्रह दिनों के दौरान सात्विक जीवन जीने का विधान है। लोग अपने घरों में लहसुन-प्याज के बिना भोजन बनाते हैं और कई जगहों पर बाल या नाखून कटवाने से भी परहेज करते हैं। इस दौरान मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार ही उनका श्राद्ध करें।
- गरीबों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करें।
- गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का एक हिस्सा अवश्य निकालें (जिसे पंचबलि कर्म कहा जाता है)।
- मन में किसी भी प्रकार का द्वेष न रखकर पूरी श्रद्धा और शांत भाव से पूजा-पाठ करें।
मान्यता है कि विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पितृगण प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से घर-परिवार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा बरकत बनी रहती है। इसलिए इस पूरे पखवाड़े में अपनी परंपराओं का पालन करते हुए पूर्वजों का स्मरण अवश्य करें।