वैश्विक कूटनीति के पटल पर इस समय बड़े और चौंकाने वाले फेरबदल देखने को मिल रहे हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शुमार अमेरिका की ओर से जब व्यापारिक नीतियों में सख्ती बरती गई, तो कयास लगाए जाने लगे कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं इस दबाव को कैसे झेलेंगी। लेकिन भारत ने जिस परिपक्वता और दूरदर्शिता के साथ इस परिस्थिति का सामना किया है, उसने वैश्विक मंच पर एक नया अध्याय लिख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लाई गई नई टैरिफ पॉलिसी ने दुनिया भर के कई देशों के माथे पर बल ला दिया था, लेकिन नई दिल्ली ने इसे एक संकट के रूप में देखने के बजाय अपनी कूटनीतिक पहुंच का दायरा बढ़ाने के एक सुनहरे अवसर के रूप में भुनाया।
वर्तमान वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। इस बीच, प्रतिष्ठित अमेरिकी मीडिया संस्थान 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने भी भारत की इस सोची-समझी रणनीति की खुलकर सराहना की है। अखबार ने अपने विश्लेषण में माना है कि भारत अब किसी एक महाशक्ति पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म कर रहा है और वैश्विक स्तर पर कई देशों के साथ अपने संबंधों को नए आयाम दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कदम न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक अचूक सुरक्षा कवच भी साबित हो रहा है।
भारत को क्यों बदलना पड़ा अपना पुराना कूटनीतिक पैटर्न?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अब दशकों पुराने ढर्रे और एकतरफा निर्भरता को अलविदा कह दिया है। इसके स्थान पर 'प्लूरिलेटरल कूटनीति' (Plurilateral Diplomacy) को अपनाया जा रहा है। इस रणनीति का मूलमंत्र यह है कि देश किसी एक राष्ट्र या ब्लॉक पर पूरी तरह आश्रित रहने के बजाय, दुनिया भर के कई देशों के साथ व्यक्तिगत और मजबूत आर्थिक व रक्षा संबंध स्थापित करे।
इस बदलाव के पीछे ठोस कारण भी रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन की ओर से भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क (Tariffs) थोपे गए। इसके अलावा, भारत द्वारा रूस से किफायती दरों पर कच्चा तेल (Crude Oil) खरीदने के फैसले पर आपत्ति जताते हुए अमेरिका ने अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का दबाव बनाया। अमेरिकी पक्ष का तर्क था कि भारत के तेल आयात से यूक्रेन संघर्ष को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल रहा है। इन तमाम व्यापारिक अड़चनों के बीच भारत को अपने निर्यात के लिए नए और वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तलाश करना अनिवार्य हो गया था। इसके साथ ही, कूटनीतिक मोर्चे पर क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए भी भारत को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करने पड़े।
प्रधानमंत्री मोदी के ताबड़तोड़ दौरे और 'मास्टर स्ट्रोक'
आर्थिक दबावों का कड़ा जवाब देते हुए भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। पिछले एक साल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 से अधिक देशों की महत्वपूर्ण यात्राएं की हैं। वहीं दूसरी ओर, दुनिया भर के 13 से ज्यादा दिग्गज राष्ट्राध्यक्षों और शीर्ष नेताओं ने भारत का दौरा किया है। इन उच्च-स्तरीय बैठकों और दौरों का उद्देश्य केवल औपचारिक मुलाकातें करना नहीं था, बल्कि जमीन पर उतरकर बड़े व्यापारिक अनुबंध और रणनीतिक रक्षा समझौते करना था।
इन तमाम उपलब्धियों में सबसे बड़ी कामयाबी यूरोपीय संघ (EU) के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की दिशा में आगे बढ़ना रही है, जो दशकों से ठंडे बस्ते में पड़ा था। इस दूरगामी डील के तहत भारत ने कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में जैसे कि यूरोपीय गाड़ियों और वाइन पर कस्टम ड्यूटी को युक्तिसंगत बनाने जैसे कड़े फैसले लिए। इसके विपरीत, ब्रिटेन के साथ हुए समझौते के माध्यम से भारतीय वस्त्र उद्योग (Textiles) को वहां के बाजार में भारी टैक्स राहत मिली। देश के भीतर भी आयातित वस्तुओं जैसे स्कॉच व्हिस्की पर ड्यूटी में संतुलित कटौती की गई है ताकि वैश्विक व्यापारिक साझेदारों के साथ संतुलन बनाया जा सके।
दुनिया के हर कोने तक पहुंच रही है भारत की कूटनीति
- यूरोपीय और पश्चिमी देश: भारत अब पारंपरिक पश्चिमी गठबंधनों के साथ-साथ जर्मनी, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों के साथ तकनीक और ऊर्जा क्षेत्रों में गहरे संबंध बना रहा है।
- एशियाई और प्रशांत क्षेत्र: जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों के साथ सप्लाई चेन रेजिलिएंसी को मजबूत किया जा रहा है।
- मध्य पूर्व और मध्य एशिया: रणनीतिक रूप से संवेदनशील मिडिल ईस्ट और सेंट्रल एशिया के देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग को और प्रगाढ़ किया गया है।
- बहुपक्षीय मंच: शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों का प्रभावी उपयोग करते हुए भारत ने रूस और चीन के साथ भी एक व्यावहारिक संवाद बनाए रखा है, जिससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और शांति कायम रखी जा सके।
अमेरिकी मीडिया की वाहवाही और भविष्य के संकेत
जब एक अमेरिकी अखबार ने प्रधानमंत्री मोदी की इस कूटनीतिक शैली की तारीफ की, तो यह इस बात का प्रमाण था कि वैश्विक विश्लेषक भी भारत के बढ़ते रणनीतिक कद को अब नजरअंदाज नहीं कर सकते। अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं।
शंघाई सहयोग संगठन और अन्य क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने के बजाय अपने स्वतंत्र फैसलों के दम पर आगे बढ़ेगा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और नेविगेशन की स्वतंत्रता बनाए रखने में भारत की भूमिका आज रीढ़ की हड्डी साबित हो रही है। आने वाले दिनों में यह 'प्लूरिलेटरल' दृष्टिकोण भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में सबसे बड़ा हथियार साबित होगा, जहां हर देश भारत के साथ व्यापार करने को अपनी प्राथमिकता मानेगा।
