काठमांडू की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सरगर्मी काफी तेज हो गई है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के संयोजक पुष्पकमल दाहाल 'प्रचंड' ने मौजूदा सरकार के खिलाफ एक बड़े संघर्ष का बिगुल फूंकने की तैयारी कर ली है। सितंबर 2026 के इस सियासी घटनाक्रम में प्रचंड के तेवर काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि देश के सबसे बड़े पर्वों यानी दीपावली और छठ के तुरंत बाद सरकार के कथित दमन और ज्यादतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरा जाएगा।
किसान महासंघ के मंच से सरकार पर तीखा हमला
रविवार को आयोजित किसान महासंघ से जुड़े एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रचंड ने वर्तमान सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा शासनकाल में जनता और राजनीतिक विरोधियों पर दमन, ज्यादती और अत्याचार की पराकाष्ठा पार हो चुकी है। प्रचंड के मुताबिक, इस तानाशाही रवैये को चुपचाप बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।
उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि सरकार के इन कथित दमनात्मक कदमों का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक संयुक्त मोर्चा (Unified Front) बनाने की तत्काल आवश्यकता है। उनकी पार्टी इसी रणनीति के तहत जमीनी स्तर पर अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है।
विभिन्न दलों और बुद्धिजीवियों के साथ बैठकों का दौर जारी
- आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रचंड ने राजनीतिक जोड़-तोड़ और कूटनीतिक बैठकों का सिलसिला तेज कर दिया है। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए खुलासा किया कि:विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व के साथ लगातार संवाद किया जा रहा है।
- देश के बुद्धिजीवियों (Intellectuals) से रायशुमारी की जा रही है।
- नागरिक समाज (Civil Society) के प्रतिनिधियों को इस साझा मोर्चे में शामिल करने के लिए बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।
प्रचंड का दावा है कि इन वार्ताओं का परिणाम बेहद उत्साहजनक रहा है और बहुत जल्द एक मजबूत विपक्षी गठबंधन धरातल पर उतरता हुआ दिखाई देगा।
'प्रतिगमन' को हराने और क्रांति को आगे बढ़ाने का संकल्प
अपने भाषण के दौरान नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री ने वैचारिक मुद्दों को भी पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि देश को पीछे धकेलने वाली ताकतों यानी 'प्रतिगमन' को हर हाल में पराजित करना होगा। प्रचंड ने कहा कि यह समय चुप बैठने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए क्रांति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प लेने का है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी फिलहाल इसी वैचारिक और सांगठनिक प्रक्रिया के तहत चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है, ताकि आने वाले दिनों में सरकार पर निर्णायक दबाव बनाया जा सके।
त्योहारों के बाद तय होगी आंदोलन की अंतिम रणनीति
नेपाली परंपरा में दशैं (दशहरा), दीपावली और छठ पर्वों का विशेष सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व होता है। इन त्योहारों के दौरान देश का जनजीवन उत्सव में डूबा रहता है। यही वजह है कि प्रचंड ने रणनीतिक रूप से त्योहारों के तुरंत बाद के समय को चुना है।
उन्होंने घोषणा की है कि दशैं और तिहार (दीपावली-छठ) के बाद देश की तत्कालीन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का बारीकी से आकलन किया जाएगा। इसके बाद ही नए और उग्र आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत की जाएगी। जानकारों का मानना है कि त्योहारों के समाप्त होते ही नेपाल की राजनीति मेंवानर-युद्ध जैसे हालात देखने को मिल सकते हैं।
संसद से लेकर सड़क तक घेरने की योजना
यह पहला मौका नहीं है जब प्रचंड ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात कही हो। इससे पहले भी वह विपक्षी दलों को संसद के भीतर एकजुट करने की रणनीति पर काम कर चुके हैं। संसद के अंदर सरकार की नीतियों का विरोध करने के साथ-साथ अब सड़क पर उतरकर जनसमर्थन जुटाने की उनकी यह योजना सत्ताधारी दलों के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
आगामी दिनों में नेपाल की कूटनीतिक राजधानी काठमांडू का राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना है। देखना यह होगा कि क्या विपक्षी दल सचमुच एक मंच पर आकर सरकार के सामने बड़ी चुनौती पेश कर पाते हैं या फिर यह महज राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाती है।