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भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव: सरकारी बैसाखी छूटी, प्राइवेट सेक्टर बना ग्रोथ इंजन

भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव: सरकारी बैसाखी छूटी, प्राइवेट सेक्टर बना ग्रोथ इंजन

भारत की अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी ताकत का लोहा मनवाया है। एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहे जाने वाले भारत में अब वह बदलाव साफ तौर पर दिखने लगा है, जिसका इंतजार लंबे समय से किया जा रहा था। जी हां, देश में लंबे अरसे से सुस्त पड़े प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (निजी निवेश) की अब जोरदार वापसी हो चुकी है। इस नई रफ्तार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से मुकाबला करने के लिए और अधिक लचीला और मजबूत बना दिया है।

अप्रैल-जून तिमाही के शानदार आंकड़े

चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में देश की विकास दर (GDP) 7.8% दर्ज की गई है। इस शानदार आंकड़े ने एक बार फिर तमाम अर्थशास्त्रियों के अनुमानों को पीछे छोड़ दिया है। यह लगातार 12वीं तिमाही है जब भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूत मोमेंटम दिखाया है। ऐसे समय में जब दुनिया भर के देश महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं, भारत का यह प्रदर्शन बेहद उत्साहजनक माना जा रहा है।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, "Doom-sayers were doomed and India bloomed… yet again!" (निराशा फैलाने वाले एक बार फिर गलत साबित हुए और भारत खिल उठा)। हालांकि, सरकार के सामने युवाओं के बीच रोजगार के मोर्चे पर अभी भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं, जिनपर पैनी नजर रखी जा रही है।

सरकारी खर्च से आगे निकला प्राइवेट कैपिटल

इस पूरी आर्थिक तस्वीर के पीछे सबसे दिलचस्प और गौर करने वाली बात यह है कि अब ग्रोथ केवल सरकारी खर्च और आम उपभोक्ता की खपत (Consumption) पर निर्भर नहीं है। पिछले कई सालों से सरकार द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर किए जा रहे भारी-भरकम निवेश का असर अब दिखने लगा है। इसने प्राइवेट कैपिटल को भी मैदान में उतरने के लिए प्रेरित किया है।

आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में कुल निवेश में 11.9% की जोरदार तेजी दर्ज की गई है। नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) के आंकड़ों के अनुसार, ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) यानी अर्थव्यवस्था में कुल निवेश की हिस्सेदारी पिछले साल के 31.4% से बढ़कर 34.3% पर पहुंच गई है।

"कोविड के दौर के उतार-चढ़ाव को छोड़ दें, तो साल 2018 के बाद से यह सबसे मजबूत रियल इन्वेस्टमेंट प्रिंट है। यह कॉर्पोरेट कैपेक्स (Capex) की रफ्तार में सुधार के हमारे अनुमान को पुख्ता करता है," - सिटी बैंक के एनालिस्ट्स

ऑटोमोबाइल, रेलवे और डिफेंस में बूम

उद्योग मंडल एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल के अनुसार, रेलवे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर जैसे सेक्टर्स में निवेश तेजी से बढ़ा है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बड़ा बल मिला है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुमानों के मुताबिक, फैक्ट्रियों की क्षमता का उपयोग (Capacity Utilisation) इस साल जनवरी-मार्च तिमाही में करीब 77% के स्तर के करीब पहुंच गया था। इसी का नतीजा है कि ऑटोमोबाइल, रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर ने दिल खोलकर निवेश किया है।

समीक्षाधीन तिमाही के दौरान मुख्य रूप से प्राइवेट सेक्टर द्वारा संचालित पूंजीगत निवेश में पिछले साल की तुलना में 5 ट्रिलियन रुपये (लगभग 52.7 अरब डॉलर) से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सरकारी खजाने से लेकर बैंक क्रेडिट तक

पिछले दो सालों तक स्थिति यह थी कि देश में निवेश का पूरा दारोमदार सरकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च पर टिका हुआ था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मौजूदा वित्त वर्ष में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 12.2 ट्रिलियन रुपये (लगभग 133 अरब डॉलर) के खर्च का प्रस्ताव रखा है, जो पांच साल पहले के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है।

अब स्थिति यह है कि सरकार का यह पब्लिक स्पेंडिंग मॉडल प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को अपनी ओर खींच रहा है (Crowding-in effect)। इसका सीधा प्रमाण बैंकों के क्रेडिट ग्रोथ में मिलता है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई के अंत तक बैंक क्रेडिट में 10 वर्षों में सबसे तेज यानी 19% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि अकेले उद्योग जगत को मिलने वाला कर्ज 20% तक बढ़ा है।

टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ेगी अगली कड़ी

पारंपरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के अलावा भारत अब भविष्य की तकनीकों पर दांव लगा रहा है। देश में डेटा सेंटर्स, सेमीकंडक्टर और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश आ रहा है। गूगल और अमेजन जैसी ग्लोबल टेक्नोलॉजी दिग्गजों ने अगले पांच वर्षों में भारतीय डेटा सेंटर्स में 40 अरब डॉलर से अधिक का निवेश करने की घोषणा की है।

  • लिस्टेड भारतीय कंपनियों ने मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में अपने कैपेक्स में 11% की वृद्धि की।
  • कॉर्पोरेट जगत की बैलेंस शीट पिछले दशक के मुकाबले अब कहीं अधिक मजबूत और स्वस्थ स्थिति में है।
  • निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त फंडिंग और कम ब्याज दरों का समर्थन मिल रहा है।

रास्ते में कुछ चुनौतियां भी हैं

भले ही आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर बहुत चमकदार नजर आ रही हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि कुछ जोखिमों से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर रुपया आने वाले दिनों में इनपुट कॉस्ट को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा सुस्त मानसून और सरकार के शुरुआती खर्चों में कुछ नरमी आने से विकास की रफ्तार पर थोड़ा असर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, भारतीय अर्थव्यवस्था ने यह साबित कर दिया है कि वह बाहरी झटकों से निपटने में सक्षम है। प्राइवेट सेक्टर के आगे आने से देश की ग्रोथ अब एक मजबूत और टिकाऊ रास्ते पर चल पड़ी है, जो आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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काव्या त्रिपाठी

काव्या त्रिपाठी

Senior Editor (Business & Technology)

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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