भारतीय शेयर बाजार में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा लाए गए नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) मैकेनिज्म को लेकर बाजार जानकारों के बीच चर्चाओं का दौर जारी है। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह नियम लंबी अवधि के लिए बाजार को पारदर्शी और मजबूत बनाने की दिशा में एक सही कदम है, लेकिन इसे लागू करने की टाइमिंग और तैयारी को लेकर अभी भी कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। इक्विरस ग्रुप के डायरेक्टर और ट्रेडिंग हेड तेजस शाह ने इस नए नियम के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डाली है। आइए जानते हैं कि इस नए सिस्टम से बाजार में क्या बदलाव आए हैं और बड़े निवेशक इसे किस रूप में देख रहे हैं।
पुराने VWAP सिस्टम से कितना अलग है नया CAS मैकेनिज्म?
सेबी का यह नया नियम मुख्य रूप से विकसित बाजारों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन की तर्ज पर लाया गया है। पुराने सिस्टम में, दिन के आखिरी 30 मिनट के कारोबार के औसत मूल्य (VWAP) के आधार पर क्लोजिंग प्राइस तय किया जाता था। हालांकि, पिछले कुछ समय में खासकर जेन स्ट्रीट जैसी घटनाओं के बाद यह महसूस किया गया कि आखिरी पलों में बड़े ऑर्डर लगाकर पुराने सिस्टम में कीमतों को अपनी तरफ मोड़ा जा सकता था। इसी खामी को दूर करने और क्लोजिंग कीमतों की प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए इस नए सिस्टम की शुरुआत की गई है।
नए नियमों के अनुसार, दोपहर 3:15 बजे तक सामान्य ट्रेडिंग होती है। इसके बाद सभी पेंडिंग लिमिट और मार्केट ऑर्डर को CAS में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जबकि स्टॉप-लॉस ऑर्डर सिस्टम से हटा दिए जाते हैं। 3:15 से 3:30 बजे के बीच एक्सचेंज रेफरेंस प्राइस कैलकुलेट करते हैं। इसके बाद 3:20 से 3:25 बजे तक मार्केट या लिमिट ऑर्डर दिए जा सकते हैं, जबकि 3:25 बजे के बाद केवल लिमिट ऑर्डर ही स्वीकार किए जाते हैं। सत्र का अंत 3:27 से 3:30 बजे के बीच किसी भी यादृच्छिक (random) समय पर होता है ताकि आखिरी मिनट की हेराफेरी को रोका जा सके।
बाजार में कम वॉल्यूम और 'ब्लाइंड स्पॉट' की चुनौती
शुरुआती दौर में इस नए सिस्टम के तहत वॉल्यूम काफी कम देखा गया है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि बाजार के बड़े खिलाड़ी, जैसे आर्बिट्रेज फर्में और प्रोप्राइटरी (prop) ट्रेडिंग फर्में, अभी इस सिस्टम के साथ पूरी तरह तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं। चूंकि यह एक नया बदलाव है, इसलिए बाजार के तमाम दिग्गज किसी भी जोखिम से बचने के लिए फिलहाल 'वाच एंड वेट' की मुद्रा में नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि CAS के दौरान 5 से 7 मिनट तक चलने वाला प्राइस-मैचिंग मैकेनिज्म पर्दे के पीछे काम करता है। इसका मतलब यह है कि ट्रेडर्स को यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका ऑर्डर वास्तव में किस कीमत पर मैच होगा। इस 'ब्लाइंड स्पॉट' के कारण आंशिक निष्पादन (under-executions) का डर बना रहता है, जहां ऑर्डर पूरा न होकर केवल आंशिक रूप से ही एग्जिक्यूट हो पाता है। इसके अलावा, डेरिवेटिव्स (F&O) सेगमेंट का CAS के मुकाबले 10 मिनट अधिक यानी 3:40 बजे तक चलना भी एक बड़ा कारण है, जिसके चलते बड़े खिलाड़ी हेजिंग की अनिश्चितता के कारण फिलहाल इससे दूरियां बनाए हुए हैं.
क्या बड़े खिलाड़ी सिस्टम का गलत फायदा उठा रहे हैं?
शुरुआती दिनों में Nifty 50 और Sensex के क्लोजिंग प्राइस में जो भारी अंतर (divergence) देखने को मिला था, उसे लेकर बाजार में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। हालांकि, जानकारों का स्पष्ट कहना है कि इसे बड़े खिलाड़ियों द्वारा सिस्टम से छेड़छाड़ (gaming the system) के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह स्थिति मुख्य रूप से 'अज्ञात के डर' (fear of the unknown) और तरलता (liquidity) की कमी की वजह से पैदा हुई थी। जब तक खरीदार और बिकवाल समान मात्रा में एक्टिव नहीं हो जाते, तब तक इस तरह के उतार-चढ़ाव और स्टॉक-विशेष हलचल देखने को मिलती रहेगी।
रीयल-वर्ल्ड ट्रेडिंग पर इसका क्या असर होगा?
- मूल्य खोज में पारदर्शिता: अब क्लोजिंग प्राइस किसी एक तयशुदा आंकड़े पर निर्भर नहीं है, बल्कि ट्रेडर्स को अपनी पसंद के दाम पर बोली लगाने का मौका मिलता है।
- म्यूचुअल फंड्स का NAV: इस नए सिस्टम के आने से म्यूचुअल फंड्स के नेट एसेट वैल्यू (NAV) में थोड़ी अधिक अस्थिरता (volatility) देखने को मिल सकती है।
- रिटेल निवेशकों पर प्रभाव: छोटे और खुदरा निवेशकों के लिए सीधे तौर पर बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन यदि वे चाहें तो इस प्रक्रिया में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।
समय से पहले लागू हुआ या परिपक्वता की कमी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सैद्धांतिक रूप से सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन शायद भारतीय बाजार अभी इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं था। पश्चिमी बाजारों के मुकाबले भारतीय बाजार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी बहुत अधिक है, और अभी भी खुदरा स्तर पर जागरूकता उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए थी। यदि इस नए सिस्टम को लाइव करने से पहले पर्याप्त समय तक सिमुलेशन या पैरेलल रन (parallel run) कराया जाता, तो बाजार के सभी प्रतिभागियों को इसके साथ सहज होने का बेहतर अवसर मिल सकता था।
फिलहाल, बाजार को पूरी तरह स्थिर होने और संतुलन बनाने के लिए अभी कुछ वक्त की दरकार है। जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ेगी और अधिक से अधिक काउंटरपार्टीज इस सिस्टम का हिस्सा बनेंगी, लिक्विडिटी खुद-ब-खुद पटरी पर लौट आएगी। देखना यह होगा कि सेबी आने वाले दिनों में बाजार की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रक्रिया में और क्या कुछ सुधार या संशोधन करता है।
