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मेटा के नए टीन रूल्स से भारत में बाल सुरक्षा पर छिड़ी बड़ी बहस

मेटा के नए टीन रूल्स से भारत में बाल सुरक्षा पर छिड़ी बड़ी बहस

मेटा (Meta) द्वारा अमेरिका में अमेरिकी राज्यों के एक गठबंधन के साथ किए गए एक ऐतिहासिक समझौते ने भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा (Child Safety) को लेकर चल रही बहस को बिल्कुल नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस समझौते के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के फेसबुक और इंस्टाग्राम यूजर्स के लिए स्क्रीन टाइम, रात के समय ऐप के इस्तेमाल और नोटिफिकेशन्स पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमेरिका में हुए इस फैसले के बाद अब भारत में भी यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या टेक कंपनियों को भारतीय किशोरों के लिए भी इस तरह के कड़े प्रोडक्ट-लेवल नियम अपनाने चाहिए?

अमेरिका में क्या है मेटा का नया समझौता?

अमेरिका में अदालत द्वारा स्वीकृत इस नए फ्रेमवर्क के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिदिन केवल दो घंटे का स्क्रीन टाइम तय किया गया है। इसके अलावा, रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल पर रोक रहेगी और सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच नोटिफिकेशन्स म्यूट (Muted) रहेंगे। इतना ही नहीं, मेटा ऐसी उन्नत तकनीक पर भी काम कर रहा है जो उन किशोरों की पहचान कर सके जो अपनी असली उम्र छिपाकर गलत या वयस्क (Adult) जन्मतिथि दर्ज कर देते हैं।

यह समझौता अमेरिका में सोशल मीडिया के बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, उनकी लत (Addiction) और स्क्रीन टाइम पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर वर्षों चली कानूनी लड़ाइयों का परिणाम है। मेटा का यह भी कहना है कि उसकी मंशा माता-पिता को बच्चों पर अधिक नियंत्रण देने की है और उसने टिकटॉक तथा यूट्यूब जैसी अन्य कंपनियों से भी इसी तरह के सुरक्षा उपायों को अपनाने की अपील की है ताकि किशोर सुरक्षित रह सकें।

भारत के संदर्भ में क्या हैं चुनौतियां?

भारत में यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब मेटा पहले से ही बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के प्रसार को लेकर सरकारी जांच के दायरे में है और देश के नए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) फ्रेमवर्क के अनुपालन की तैयारी कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और भारत की नीतियां और उनकी जरूरतें एक-दूसरे से काफी अलग हैं।

दिल्ली स्थित रिसर्च फर्म 'द क्वांटम हब' (TQH) की संस्थापक पार्टनर अपराजिता भारती का कहना है कि भारत का डीपीजीपी (DPDP) फ्रेमवर्क मुख्य रूप से गोपनीयता (Privacy) से जुड़े जोखिमों और नुकसान पर केंद्रित है। इस कानून के तहत बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले माता-पिता की वेरिफिएबल सहमति (Verifiable Parental Consent) अनिवार्य है और बच्चों के विज्ञापनों या उनकी प्रोफाइलिंग पर रोक लगाई गई है।

दिल्ली की वकील श्रुति नारायण के अनुसार, "बच्चों की जानकारी जुटाने के लिए डीपीजीपीए के तहत अतिरिक्त जिम्मेदारियां तय होती हैं, जिसके लिए पैरेंट्रल वेरिफिकेशन जरूरी है। असली चुनौती यह है कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित कैसे रखा जाए, खासकर हानिकारक और लत लगाने वाली सामग्री से, और इसके साथ ही जरूरत से ज्यादा डेटा भी न जुटाया जाए।"

क्यों अमेरिका की तर्ज पर सीधे लागू नहीं हो सकते नियम?

विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अमेरिका में लागू किए गए नियमों को ज्यों का त्यों (Copy-Paste) भारत में लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा, क्योंकि भारत का सामाजिक और तकनीकी परिवेश बिल्कुल अलग है।

  • स्कूलों के नियम: अमेरिका में मेटा के समझौते के तहत स्कूल के समय में नोटिफिकेशन्स म्यूट किए जाते हैं, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह नियम ज्यादा प्रासंगिक नहीं है क्योंकि देश के अधिकांश स्कूलों में बच्चों को फोन ले जाने की अनुमति ही नहीं होती है।
  • शेयर किए जाने वाले डिवाइस: भारत में परिवारों के भीतर एक ही डिवाइस को कई लोग (विशेषकर बच्चे और माता-पिता) मिलकर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए यहां की 'सेफ्टी बाय डिजाइन' की अवधारणा में इस साझा उपयोग (Shared Device Usage) को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।

उम्र की पुष्टि (Age Assurance) की पेचीदगियां

भारत के डीपीजीपी नियमों के अनुपालन के लिए यह तय करना सबसे अहम हो जाता है कि यूजर वास्तव में बच्चा है या वयस्क। लेकिन उम्र की पुष्टि करना भी आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए भी व्यक्तिगत डेटा जुटाना पड़ सकता है।

श्रुति नारायण का मानना है कि समस्या का समाधान केवल उम्र के वेरिफिकेशन से नहीं हो सकता, क्योंकि इसे बायपास (Bypass) किया जा सकता है। इसके बजाय मेटा को अपनी कंटेंट-व्यूविंग नीतियों में अधिक पारदर्शिता लानी चाहिए और शोधकर्ताओं को स्वतंत्र रूप से अध्ययन करने की अनुमति देनी चाहिए ताकि सोशल मीडिया के प्रभावों का निष्पक्ष आकलन किया जा सके।

व्हाट्सएप द्वारा भारत में स्वैच्छिक आयु-घोषणा (Age-Declaration) की टेस्टिंग

इस बीच, मेटा के स्वामित्व वाले लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप ने भारत में पहले से ही एक स्वैच्छिक आयु-घोषणा तंत्र (Voluntary Age-Declaration Mechanism) की टेस्टिंग शुरू कर दी है। इसके तहत कुछ यूजर्स से उनकी जन्मतिथि साझा करने के लिए कहा जा रहा है। कंपनी का कहना है कि वह डीपीजीपी कानून लागू होने से पहले यूजर्स के लिए गोपनीयता-सुरक्षित तरीके से उनकी उम्र की पुष्टि करने के नए रास्ते तलाश रही है। हालांकि, फिलहाल यह कोई अनिवार्य पहचान-सत्यापन (Identity Verification) नहीं है, बल्कि एक परीक्षण मात्र है।

आगे की राह: भारत को अपनी साक्ष्यों पर आधारित नीति की जरूरत

विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को अंधी नकल करने के बजाय अपनी खुद की रिसर्च और डेटा जुटाना चाहिए। अपराजिता भारती का कहना है कि सरकार को ऑनलाइन बच्चों को होने वाले संभावित नुकसान पर देश के अपने आंकड़े जुटाने चाहिए और एक 'वेलबीइंग बाय डिजाइन' फ्रेमवर्क विकसित करना चाहिए जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो।

मेटा के लिए भारत में चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे बच्चों के डेटा और सीएसएएम (CSAM) से जुड़े सख्त नियमों का पालन करना है, तो दूसरी तरफ अन्य बाजारों में विकसित किए गए सुरक्षा उपायों को भारतीय उपकरणों, स्कूली शिक्षा और ऑनलाइन व्यवहार के पैटर्न के अनुसार ढालना है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय नियामक और टेक दिग्गज इस दिशा में क्या नया रास्ता निकालते हैं।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor (Business & Technology)

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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