पुणे राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी अपने चरम पर है और इस हलचल का केंद्र बना है साल 2026 का बहुप्रतीक्षित विधान परिषद (MLC) चुनाव। पुणे विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए राजनीतिक बिछात पूरी तरह बिछ चुकी है। इसी क्रम में सोमवार, 05 अक्टूबर 2026 को महायुति के अधिकृत उम्मीदवारों ने शक्ति प्रदर्शन के साथ अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि सत्ताधारी गठबंधन इस चुनाव को लेकर कितना गंभीर है और उनकी रणनीति कितनी पैनी है।
विधान भवन में दिखा महायुति का शक्ति प्रदर्शन
सोमवार को पुणे के विधान भवन का नजारा पूरी तरह से राजनीतिक रंग में रंगा हुआ था। पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. स्मिता योगेश जाधव और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कौस्तुभ गावडे ने महायुति के आधिकारिक उम्मीदवारों के रूप में अपने नामांकन के कागजात दाखिल किए। इस अवसर पर महायुति के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी ने विपक्ष को कड़ा संदेश देने का काम किया।
नामांकन दाखिल करने के दौरान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण स्वयं मौजूद रहे। उनके साथ-साथ केंद्रीय मंत्री मुरलीधर मोहोल, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांत पाटील, ग्राम विकास मंत्री जयकुमार गोरे, प्रदेश महासचिव राजेश पांडे, विधायक हेमंत रासने, महेश लांडगे, अमित गोरखे और भीमराव तापकीर समेत महायुति के कई प्रमुख नेता और पदाधिकारी उपस्थित रहे। इस दौरान पूर्व विधायक शरद लाड ने भी अपना नामांकन पत्र दाखिल किया, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं शुरू हो गई थीं, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने स्थिति को तुरंत स्पष्ट कर दिया।
रवींद्र चव्हाण का स्पष्ट बयान: 'शरद लाड का नामांकन सिर्फ एक डमी'
नामांकन प्रक्रिया के तुरंत बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने अंदरखाने चल रही चर्चाओं और बगावत की अटकलों पर पूरी तरह विराम लगा दिया। चव्हाण ने दो टूक शब्दों में कहा कि पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की कोई बगावत नहीं हुई है।
"पूर्व विधायक शरद लाड द्वारा दाखिल किया गया नामांकन पत्र किसी बगावत का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह पार्टी की रणनीति के तहत एक 'डमी उम्मीदवार' के रूप में दाखिल कराया गया है। महायुति के सभी घटक दलों के नेता और कार्यकर्ता पूरी तरह एकजुट हैं और हमारे अधिकृत उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए मैदान में उतर चुके हैं।" - रवींद्र चव्हाण, प्रदेश अध्यक्ष
चव्हाण ने आगे कहा कि डॉ. स्मिता जाधव को एक प्र-कुलगुरु के रूप में काम करने का लंबा और समृद्ध प्रशासनिक अनुभव है। उन्हें शैक्षणिक संस्थानों के सामने आने वाली व्यावहारिक समस्याओं और सरकार के साथ समन्वय बिठाने की प्रक्रिया की गहरी समझ है। वहीं दूसरी ओर, कौस्तुभ गावडे लंबे समय से पार्टी संगठन में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और जमीनी स्तर पर शिक्षण संस्थानों तथा शिक्षकों के ज्वलंत मुद्दों से अच्छी तरह वाकिफ हैं।
नाराज नेताओं को मनाने की कवायद और डमी फॉर्म का खेल
राजनीति में जब चुनाव आते हैं, तो टिकट चाहने वालों की लंबी कतार और भीतरखाने नाराजगी आम बात होती है। पुणे स्नातक और शिक्षक सीट पर भी कुछ ऐसा ही माहौल देखने को मिला था। हालांकि, महायुति का शीर्ष नेतृत्व इस मामले में पूरी तरह सतर्क नजर आ रहा है।
रवींद्र चव्हाण ने बताया कि पार्टी ने डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर पहले ही काम करना शुरू कर दिया था। कई इच्छुक उम्मीदवारों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की गई और उन्हें पार्टी के फैसले के बारे में समझाया गया। उनमें से कई नेताओं ने पार्टी हित को सर्वोपरि रखते हुए महायुति के लिए काम करने की सहमति दे दी है। इसके अलावा, कुछ रणनीतिक स्थानों पर पार्टी के निर्देश पर ही 'डमी' नामांकन दाखिल करवाए गए हैं ताकि तकनीकी रूप से कोई परेशानी न आए।
सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आ रही है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार जैसे महायुति के वरिष्ठ और कद्दावर नेता खुद नाराज चल रहे नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। गठबंधन का साफ मकसद है कि किसी भी प्रकार की आंतरिक कलह का फायदा विपक्ष को न मिलने पाए। चव्हाण ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले कुछ महीनों में मतदाता पंजीकरण के लिए कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत की है। पुणे के साथ-साथ नागपुर और अमरावती की सीटों पर भी महायुति के नेता और कार्यकर्ता पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
डॉ. स्मिता जाधव का विजन: रोजगार, स्टार्टअप और कौशल विकास
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतरीं डॉ. स्मिता योगेश जाधव ने नामांकन के बाद मीडिया से बातचीत में अपने इरादे साफ कर दिए। उनका फोकस पूरी तरह से युवाओं, स्नातकों और भविष्य की जरूरतों पर आधारित है।
- शैक्षणिक अनुभव का लाभ: पिछले 20 वर्षों के अपने शैक्षणिक और प्रशासनिक अनुभव को स्नातकों के हित में झोंकना।
- रोजगार और स्टार्टअप: युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देना।
- इन्क्यूबेशन सेंटर: आधुनिक समय की मांग को देखते हुए उच्च शिक्षा संस्थानों में इन्क्यूबेशन सेंटर और कौशल विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता देना।
- क्षेत्रीय समाधान: निर्वाचन क्षेत्र के पांचों जिलों की विशिष्ट आवश्यकताओं और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्नातकों की समस्याओं का स्थायी समाधान खोजना।
डॉ. जाधव ने कहा कि आज का युवा केवल पारंपरिक डिग्रियों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाना चाहता है। सरकार और युवाओं के बीच एक मजबूत सेतु का काम करते हुए उनकी प्राथमिकताओं को पूरा करना ही उनका मुख्य लक्ष्य होगा।
कौस्तुभ गावडे का संकल्प: शिक्षकों के हकों की लड़ाई
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से ताल ठोक रहे कौस्तुभ गावडे ने अपनी उम्मीदवारी पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि वे खुद एक शिक्षक रहे हैं, इसलिए वे शिक्षा जगत की एक-एक बारीकी और दर्द को भली-भांति समझते हैं। उन्होंने उन तमाम मुद्दों को उठाया जो लंबे समय से फाइलों में दबे पड़े हैं।
- पुरानी पेंशन योजना (OPS): शिक्षकों के बीच सबसे बड़े भावनात्मक और आर्थिक मुद्दे यानी पुरानी पेंशन बहाली को प्राथमिकता के साथ उठाना।
- टीईटी की अनिवार्यता: शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से जुड़े नियमों की पेचीदगियों और उससे उपजी समस्याओं का व्यावहारिक हल निकालना।
- गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ: शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य सरकारी कामों में उलझाने की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाना।
- संचमान्यता के मानदंड: संचमान्यता (Staffing Pattern) के जटिल नियमों के कारण अक्सर अतिरिक्त घोषित कर दिए जाने वाले शिक्षकों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
गावडे ने विश्वास जताया कि इन तमाम गंभीर और लंबे समय से अनसुलझे मुद्दों को वे सीधे विधान भवन के पटल पर रखेंगे और शिक्षकों को उनका वाजिब हक और न्याय दिलाकर रहेंगे।
आगे की सियासी चाल और मुकाबला
पुणे स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का यह चुनाव केवल एक सामान्य एमएलसी चुनाव नहीं है, बल्कि इसे आगामी राजनीतिक समीकरणों का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। महायुति ने जिस प्रकार से अपने अनुभवी और जमीनी चेहरों को मैदान में उतारा है, उससे मुकाबला बेहद दिलचस्प होने के पूरे आसार हैं। अब देखना यह होगा कि विपक्षी खेमा इस चुनौती का सामना किस रणनीति के साथ करता है और मतदाता किसे अपना प्रतिनिधि चुनकर विधान परिषद भेजते हैं। चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी और अधिक तेज होने की पूरी संभावना है।