महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से वह हलचल देखने को मिली है, जिसकी चर्चा लंबे समय से सियासी गलियारों में की जा रही थी। मुंबई की सड़कों पर ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि राजनीतिक पंडितों के समीकरण तक हिल गए। कभी सियासी तौर पर एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले चचेरे भाई राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक बार फिर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। मौका था मुंबई में निकाले गए ‘विराट गर्जना मोर्चा’ का, जिसने सरकार और चुनाव आयोग दोनों की नींद उड़ा दी है।
मुंबई की सड़कों पर ठाकरे बंधुओं का शक्ति प्रदर्शन
रविवार, 04 अक्टूबर 2026 को मुंबई का राजनीतिक पारा उस वक्त अपने चरम पर पहुंच गया जब शहर के प्रमुख मार्गों पर हजारों की संख्या में कार्यकर्ता और आम नागरिक सड़कों पर उतर आए। इस विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी हाइलाइट राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का एक ही मंच पर आना रहा। दोनों नेताओं ने एसआईआर (SIR) के प्रावधानों, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और आगामी चुनावों में बैलेट पेपर के इस्तेमाल की मांग को लेकर हुंकार भरी।
मोर्चे के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, लेकिन कार्यकर्ताओं में जो उत्साह और जोश था, वह देखते ही बनता था। हाथों में बैनर और तख्तियां लिए लोग नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे थे। हर कोई इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनना चाहता था जहां दो बड़े राजनीतिक दल और उनके कद्दावर नेता हाथ में हाथ डाले लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा की बात कर रहे थे।
आखिर क्या हैं मुख्य मांगें?
विराट गर्जना मोर्चे के मंच से विपक्षी नेताओं ने कई तीखे सवाल उठाए और कुछ ऐसी मांगें रखीं जिन पर देश भर में बहस छिड़ गई है। मोर्चे के दौरान निम्नलिखित तीन मुख्य बिंदुओं पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया:
- एसआईआर (SIR) को तुरंत रद्द करना: विपक्ष का आरोप है कि इस नई व्यवस्था से पारदर्शिता पर असर पड़ रहा है और जनता के अधिकारों का हनन हो रहा है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा: चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्षी दलों ने सीईसी के इस्तीफे की मांग की है।
- EVM हटाओ, बैलेट पेपर लाओ: चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग करते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की जगह पुराने पारंपरिक बैलेट पेपर से चुनाव कराने की पुरजोर वकालत की गई।
मंच से क्या बोले नेता?
विराट गर्जना मोर्चे को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने मौजूदा राजनीतिक हालात पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए अब जनता को खुद आगे आना होगा। संस्थानों की स्वायत्तता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब तक जनता का चुनाव प्रक्रिया से विश्वास नहीं उठेगा, तब तक सही मायने में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।
वहीं, राज ठाकरे ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज में सरकार और चुनाव आयोग को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि आवाज दबाने की जितनी कोशिश की जाएगी, यह जनसैलाब उतना ही बड़ा रूप लेता जाएगा। राज ठाकरे ने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी पार्टी या कुर्सी के लिए नहीं, बल्कि देश के संविधान और आम आदमी के मताधिकार की रक्षा के लिए है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज
मुंबई में हुए इस विशाल प्रदर्शन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राज और उद्धव ठाकरे इसी तरह से मिलकर आगे बढ़ते हैं, तो आने वाले समय में राज्य के चुनावी समीकरणों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों का यह एकजुट होना सत्ता पक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार और चुनाव आयोग इस ‘विराट गर्जना’ के बाद विपक्षी दलों की इन मांगों पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं या यह विरोध प्रदर्शन और अधिक उग्र रूप लेता है। फिलहाल, मुंबई से उठी इस राजनीतिक चिंगारी ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।