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पशु चिकित्सक से संघ प्रमुख तक: जानिए मोहन भागवत का अनोखा सफर और अनसुने किस्से

पशु चिकित्सक से संघ प्रमुख तक: जानिए मोहन भागवत का अनोखा सफर और अनसुने किस्से

भारतीय सामाजिक और राजनीतिक पटल पर यदि किसी एक संस्था और उसके नेतृत्व ने सबसे लंबी और गहरी छाप छोड़ी है, तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत हैं। आज यानी 11 सितंबर 2026 को मोहन भागवत अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं। महाराष्ट्र के चंद्रपुर की माटी से निकलकर देश के सबसे बड़े वैचारिक और सामाजिक संगठन के शीर्ष पर पहुंचने तक का उनका सफर न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति अपनी प्रतिबद्धता से इतिहास का रुख मोड़ सकता है।

शुरुआती जीवन और शिक्षा: जब पशु चिकित्सा को चुना करियर

मोहन भागवत का जन्म 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में एक ऐसे परिवार में हुआ था जो संघ की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके पिता मधुकराव भागवत संघ के शुरुआती और समर्पित प्रचारकों में से एक थे, जिनका प्रभाव मोहन भागवत के बचपन पर पड़ना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा महाराष्ट्र के ही नागपुर शहर में पूरी हुई। नागपुर वह केंद्र बिंदु है जहां से देश भर में चलने वाले कई सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी आंदोलनों की रूपरेखा तैयार होती है।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विज्ञान को चुना। उन्होंने पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) में डिग्री हासिल की। उस दौर में इस पेशेवर कोर्स को चुनना यह स्पष्ट करता है कि वे विज्ञान और प्रायोगिक ज्ञान में गहरी रुचि रखते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक एक पशु चिकित्सक के रूप में अपनी सेवाएं भी दीं। लेकिन उनके जीवन की दिशा कुछ और ही तय कर चुकी थी।

डॉक्टर का कोट छोड़कर थामा संघ का झंडा

करियर की शुरुआत में स्टेथोस्कोप थामने वाले मोहन भागवत के मन में राष्ट्र सेवा का बीज बचपन से ही बोया जा चुका था। पेशेवर जीवन में कदम रखने के कुछ ही समय बाद उन्होंने अपने भविष्य का एक बड़ा और निर्णायक फैसला लिया। उन्होंने अपने करियर को पीछे छोड़ते हुए अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित करने का संकल्प लिया।

एक साधारण प्रचारक के रूप में उन्होंने संगठन के भीतर काम करना शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्होंने धरातल पर रहकर संगठन की प्राथमिक इकाइयों को मजबूत करने का काम किया। चाहे शाखाओं का संचालन हो, युवाओं को जोड़ना हो या फिर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद स्थापित करना हो, उन्होंने हर जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाया।

संगठन की सीढ़ियां और जमीनी अनुभव

संघ के भीतर मोहन भागवत का सफर किसी एक दिन की छलांग नहीं, बल्कि दशकों की तपस्या का परिणाम है। उन्होंने स्थानीय स्तर से लेकर प्रातीय और फिर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न महत्वपूर्ण दायित्व संभाले। इस लंबी यात्रा के दौरान उन्होंने भारत के कोने-कोने का दौरा किया और देश की विविधता, उसकी समस्याओं और संभावनाओं को बहुत करीब से परखा।

उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वे हमेशा संवाद और समन्वय पर जोर देते हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं के बीच अनुशासन के साथ-साथ वैचारिक स्पष्टता को बढ़ावा दिया। संगठन के भीतर उनकी प्रशासनिक क्षमता और जटिल परिस्थितियों को संभालने के कौशल ने उन्हें जल्द ही केंद्रीय नेतृत्व की नजरों में ला दिया था।

वर्ष 2009: जब संभाली देश के सबसे बड़े संगठन की कमान

वर्ष 2009 का समय भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति और संघ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। के.एस. सुदर्शन के स्वास्थ्य कारणों से दायित्वमुक्त होने के बाद, संघ के शीर्ष नेतृत्व ने मोहन भागवत को सर्वसम्मति से नया सरसंघचालक (संघ प्रमुख) चुना। यह एक ऐसा समय था जब देश तेजी से बदल रहा था, वैचारिक और राजनीतिक समीकरण नए रूप ले रहे थे। ऐसे दौर में भागवत ने संगठन की कमान संभाली।

सरसंघचालक के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान संघ ने अपनी पहुंच और गतिविधियों का अभूतपूर्व विस्तार किया। उन्होंने न केवल पारंपरिक रूप से मजबूत समझे जाने वाले क्षेत्रों में संगठन को और गहराई दी, बल्कि आधुनिक समाज के नए तबकों—जैसे युवा पेशेवरों, बुद्धिजीवियों और शहरी वर्ग—तक भी संघ के विचारों को प्रभावी ढंग से पहुंचाया।

सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण पर जोर

मोहन भागवत के भाषणों और सार्वजनिक संबोधनों में हमेशा से सामाजिक समरसता (Social Harmony) और राष्ट्रीय एकता केंद्रीय बिंदु रहे हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब समाज के सभी वर्ग बिना किसी भेदभाव के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ें। वे अक्सर अपनी बैठकों और सम्मेलनों में जातिगत और क्षेत्रीय दूरियों को मिटाकर एकरस समाज के निर्माण की वकालत करते हैं।

  • पारिवारिक प्रबोधन: वे मानते हैं कि समाज की मूल इकाई परिवार है, और यदि परिवार संस्कारित होंगे तो राष्ट्र स्वतः मजबूत बनेगा।
  • आत्मनिर्भर भारत: आर्थिक मोर्चे पर भी वे स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों को देश की प्रगति के लिए अनिवार्य मानते हैं।
  • युवा शक्ति: देश की युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए आधुनिक तकनीक और विज्ञान में आगे बढ़ाने पर उनका विशेष जोर रहता है।

बदलते भारत के साथ संघ की नई तस्वीर

मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने अपने पारंपरिक स्वरूप से आगे बढ़कर समय के साथ सामंजस्य बिठाने की दिशा में कई बड़े कदम उठाए हैं। आज का संघ केवल पारंपरिक शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पर्यावरण संरक्षण, जल संचयन, ग्रामीण विकास और स्टार्टअप संस्कृति जैसे समकालीन विषयों पर भी मुखर होकर काम कर रहा है। भागवत ने इन सभी बदलावों के पीछे एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है, जो परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करता है।

जन्मदिन पर कार्यकर्ताओं में उत्साह और शुभकामनाओं का तांता

आज अपने 76वें जन्मदिन के अवसर पर मोहन भागवत को देश भर से राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संघ के लाखों स्वयंसेवकों की ओर से शुभकामनाएं मिल रही हैं। नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में इस अवसर पर विशेष उत्साह का वातावरण है। हालांकि, आमतौर पर वे अपने जन्मदिन को किसी भव्य उत्सव के रूप में मनाने से बचते हैं और इसे एक सामान्य कार्यदिवस की तरह ही बिताते हैं, फिर भी उनके समर्थकों और शुभचिंतकों के लिए यह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता।

चंद्रपुर के एक साधारण परिवार से उठकर, पशु चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने वाले और अंततः देश के सबसे बड़े वैचारिक संगठन के मार्गदर्शक बनने वाले मोहन भागवत का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि उद्देश्य स्पष्ट हो और निष्ठा अडिग हो, तो एक व्यक्ति अपने विचारों से पूरे देश की दिशा और दशा को प्रभावित कर सकता है। उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

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रोली सिंह

रोली सिंह

Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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