राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई है, जो किसी भी संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख देने के लिए काफी है। क्या आपने कभी कल्पना की है कि आज के इस आधुनिक दौर में भी देश के किसी राज्य में सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं, जिनके सिर पर अपनी छत तक नहीं है? राज्य सरकार ने खुद विधानसभा में यह स्वीकार किया है कि राजस्थान के कुल 611 सरकारी स्कूल बिना अपनी इमारतों के संचालित हो रहे हैं। इनमें पूरे 10 बालिका विद्यालय भी शामिल हैं, जहाँ बेटियां खुले आसमान के नीचे या फिर जुगाड़ के सहारे पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
विधानसभा में हुआ बड़ा खुलासा
यह चौंकाने वाला आंकड़ा तब सामने आया जब नेता प्रतिपक्ष (LoP) टीकाराम जूली ने विधानसभा में इस संबंध में सवाल पूछा। सरकार की ओर से समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (UDISE) 2025-26 के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की गई। आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के कई हिस्सों में तो हालात इतने बदतर हैं कि स्कूलों को या तो टीन शेड के नीचे चलाया जा रहा है या फिर उन्हें पशुओं के बाड़ों और गौशालाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।
राजधानी जयपुर का हाल भी बेहाल
जब बात राजधानी की आती है, तो विकास और व्यवस्था के तमाम दावे खोखले साबित होते नजर आते हैं। केवल जयपुर जिले में ही 38 ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जिनके पास अपना कोई भवन नहीं है। हालांकि, सबसे दयनीय स्थिति पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गृह जिले झालावाड़ के अकलेरा ब्लॉक की है, जहाँ अकेले 23 स्कूल बिना भवन के चल रहे हैं। इसके अलावा:
- खानपुर: 16 स्कूल बिना भवन
- झालरापाटन: 11 स्कूल बिना भवन
- फलौदी (बाप): 11 स्कूल बिना भवन
- बांसवाड़ा (छोट सरवन): 10 स्कूल बिना भवन
हाल ही में जयपुर के पास बगरू इलाके से एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया था, जहाँ एक स्कूल कथित तौर पर एक पशुओं के बाड़े में चलाया जा रहा था। जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक आशुतोष रांका के नेतृत्व में एक टीम ने वहां औचक निरीक्षण किया, तो स्थानीय स्तर पर भारी विरोध और विवाद देखने को मिला। उस स्कूल की पुरानी इमारत को खतरनाक घोषित कर पिछले साल ही बंद कर दिया गया था, लेकिन बच्चों के बैठने के लिए कोई ठोस वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई थी।
सिर्फ इमारतें ही नहीं, बुनियादी सुविधाओं का भी है भारी टोटा
संकट केवल बिना भवनों वाले स्कूलों तक सीमित नहीं है। जिन 64,484 सरकारी स्कूलों के पास अपने खुद के भवन हैं भी, उनकी अंदरूनी स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार:
- राज्य के 2,047 स्कूलों में शौचालय की कोई सुविधा नहीं है। शौचालय के मामले में बांसवाड़ा (188), डूंगरपुर (124) और उदयपुर (98) के हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं।
- राज्य के 1,049 स्कूलों में बच्चों के पीने के लिए साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है। इसमें दौसा जिला सबसे आगे है, जहाँ 96 स्कूलों में पेयजल संकट है।
सियासी गलियारों में भूचाल: 'पाप' और 'प्रत्यारोप' का दौर
इस आधिकारिक खुलासे के बाद राजस्थान की सियासत पूरी तरह गरमा गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। सरकार ने इस पूरी बदहाली का ठीकरा पिछली अशोक गहलोत सरकार पर फोड़ते हुए इसे उनका 'पाप' करार दिया है। सरकार का दावा है कि हाल ही में झालावाड़ में हुए एक स्कूल हादसे के बाद पूरे राज्य में सुरक्षा ऑडिट कराया गया, जिसके बाद यह भयानक सच्चाई सामने आई। वर्तमान प्रशासन का कहना है कि वे इस पुरानी व्यवस्था को सुधारने और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं। सरकार ने स्कूलों की मरम्मत के लिए 550 करोड़ रुपये और नए भवनों के निर्माण के लिए 450 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया है।
दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार के इन दावों को खारिज करते हुए तीखा पलटवार किया है। उनका कहना है कि मौजूदा सरकार के पास राज्य की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं है। जूली के मुताबिक, राज्य में कुल 3,768 स्कूल और उनके 83,783 कमरे पूरी तरह जर्जर और असुरक्षित हो चुके हैं, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
निष्कर्ष
शिक्षा किसी भी राष्ट्र और समाज की रीढ़ होती है। यदि नौनिहाल ही बुनियादी सुविधाओं, चार दीवारों और सुरक्षित छतों के लिए संघर्ष करते नजर आएंगे, तो उज्ज्वल भविष्य का सपना कैसे साकार होगा? यह समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर धरातल पर ठोस कदम उठाने का है, ताकि राजस्थान का हर बच्चा सुरक्षित माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सके।
