सनातन धर्म के इतिहास में आज का दिन बेहद खास और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। ब्रह्मलीन द्वयपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का 102वां प्राकट्योत्सव सोमवार, 14 सितंबर 2026 को काशी समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में पूरी श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर काशी के ऐतिहासिक श्रीविद्यामठ में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया, जहां सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहा।
काशी के श्रीविद्यामठ में गूंजे वैदिक मंत्र
वाराणसी के अस्सी स्थित श्रीविद्यामठ में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के प्राकट्योत्सव पर सुबह से ही वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई दे रही थी। मठ परिसर में ब्रह्मलीन शंकराचार्य की चरण पादुकाओं का पूजन अत्यंत विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। इसके बाद विद्वान ब्राह्मणों और पुजारियों द्वारा रुद्राभिषेक किया गया, जिसमें विश्व कल्याण और राष्ट्र की उन्नति की प्रार्थना की गई।
इस धार्मिक अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें 108 वैदिक विद्यार्थियों ने भाग लिया और सस्वर चतुर्वेद परायण किया। विद्यार्थियों के मुख से निकले वेदमंत्रों की ध्वनि से पूरा मठ परिसर गुंजायमान हो उठा। इसके पश्चात भजन-कीर्तन और एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
देशभर में मना उत्सव: ज्योर्तिमठ से सलधा धाम तक गूंजी गूंज
केवल काशी ही नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रमुख धार्मिक केंद्रों पर भी स्वामी स्वरूपानंद जी का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया गया। उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम के पास स्थित ज्योर्तिमठ और छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले स्थित सपाद लक्षेश्वर धाम सलधा में भी विशेष कार्यक्रमों का आयोजन हुआ।
सलधा धाम और ज्योर्तिमठ में उनके अनुयायियों ने चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके द्वारा सनातन धर्म के संरक्षण के लिए किए गए कार्यों को याद किया। भक्तों का कहना था कि स्वामी जी एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने जीवनभर धर्म की रक्षा और वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
अखंड ज्योति और तपस्या का प्रतीक
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज केवल एक संत नहीं थे, बल्कि वे सनातन परंपरा के एक ऐसे स्तंभ थे जिन्होंने हमेशा धर्म और अधर्म के बीच स्पष्ट रेखा खींची। उन्होंने देश की स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था और आजादी के बाद गौहत्या प्रतिबंध और राम मंदिर आंदोलन जैसे बड़े मुद्दों पर मुखर होकर आवाज उठाई थी।
- चरण पादुका पूजन: श्रीविद्यामठ में विशेष अनुष्ठान के दौरान संतों और भक्तों ने गुरु पादुका का पूजन किया।
- चतुर्वेद परायण: 108 वैदिक बटुकों द्वारा वेदों के पाठ ने कार्यक्रम को और भी अधिक दिव्य बना दिया।
- विशाल भंडारा: उत्सव के समापन पर आयोजित भंडारे में दूर-दराज से आए संतों और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
भक्तों में दिखा गहरा उत्साह
सोमवार को आयोजित इस प्राकट्योत्सव में देश के विभिन्न कोनों से आए संतों, महामंडलों और शिष्यों ने हिस्सा लिया। सभी ने एक स्वर में कहा कि स्वामी स्वरूपानंद जी के विचार और उनके आदर्श आज की युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर ही समाज में धर्म और नैतिकता की स्थापना की जा सकती है।
दिनभर चले कार्यक्रमों के अंत में आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया और सभी ने मिलकर उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य आज भी अपने अनुयायियों के दिलों में जीवित हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा देश और समाज के साथ है।