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वाराणसी के बजरडीहा में थमी बारिश पर नहीं उतरा पानी, नरक बनी गलियां

वाराणसी के बजरडीहा में थमी बारिश पर नहीं उतरा पानी, नरक बनी गलियां

बनारस यानी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां की हर गली एक नई कहानी कहती है। लेकिन सितंबर 2026 के इन दिनों में बजरडीहा और जोल्हा इलाके की गलियां किसी अलग ही दास्तां को बयां कर रही हैं—ऐसी दास्तां जो बदहाली, उपेक्षा और गंदे पानी के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर नागरिकों की तकलीफों से जुड़ी है। शहर में बारिश का दौर थमे हुए भले ही कई दिन बीत चुके हों, और आसमान साफ नजर आ रहा हो, लेकिन इस दक्षिणी वार्ड की तंग गलियों का हाल आज भी वैसा का वैसा ही है। आसमान से पानी बरसना बंद हो गया है, मगर जमीन पर खड़े गंदे पानी के समंदर ने स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को एक अंतहीन संघर्ष में बदल दिया है।

बारिश थमी, पर मुसीबतें बरकरार: क्या है असलियत?

सामान्य तौर पर जब बारिश रुकती है, तो प्रशासन और आम जनता दोनों राहत की सांस लेते हैं। पानी धीरे-धीरे या तो सूख जाता है या ड्रेनेज सिस्टम के जरिए निकल जाता है। लेकिन बजरडीहा और जोल्हा की भौगोलिक स्थिति और वहां के सीवर तंत्र ने एक अजीब पहेली पैदा कर दी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि क्षेत्र में पिछले कई दिनों से बारिश का नामोनिशान नहीं है, बावजूद इसके गलियों में पानी इस तरह जमा है जैसे मानो अभी-अभी कोई भारी मूसलाधार बारिश हुई हो।

यह स्थिति इस बात की गवाही दे रही है कि समस्या केवल मौसम की नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक गहरी और तकनीकी है। इलाके के बाशिंदों के मुताबिक, इस जलभराव के पीछे जलनिकासी तंत्र का पूरी तरह फेल हो जाना है। महीनों से नालियों की ठीक से सफाई न होने और सीवर लाइनों के ब्लॉक होने के कारण गंदा पानी गलियों में ही कैद होकर रह गया है।

जलभराव के मुख्य बिंदु और परेशानियां

  • पैदल चलना भी मुहाल: घरों से बाहर निकलते ही घुटनों तक गंदे पानी का सामना करना पड़ता है, जिससे बुजुर्गों और बच्चों का घर से बाहर निकलना पूरी तरह बंद हो गया है।
  • दुर्गंध और बीमारियों का खतरा: लगातार रुके हुए सड़े हुए पानी से उठने वाली दुर्गंध ने जीना मुहाल कर दिया है। मच्छरों के पनपने से मलेरिया और डेंगू जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा सिर पर मंडरा रहा है।
  • वाहन चालकों के लिए जोखिम: दोपहिया वाहन चालक अक्सर पानी के भीतर छुपे गड्ढों और चेंबर के खुले ढक्कनों के शिकार होकर गिर रहे हैं, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
  • व्यापार पर असर: स्थानीय स्तर पर छोटे दुकानदारों और कारोबारियों का धंधा चौपट हो गया है, क्योंकि ग्राहक गंदे पानी को पार कर दुकानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

चेंबरों में बालू और मलबे के जमने की आशंका

क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और युवाओं का एक प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे पर खुलकर सामने आया है। उनका मानना है कि मुख्य ड्रेनेज लाइनों और चेंबरों के अंदर बालू, गाद (Silt) और निर्माण कार्यों का मलबा बुरी तरह फंस चुका है। जब तक इन चेंबरों की गहराई से जांच कर अंदर जमा कचरे को बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक पानी की एक बूंद भी आगे नहीं खिसक सकती।

लोगों का यह भी कहना है कि नगर निगम द्वारा अक्सर कागजों में सफाई अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन धरातल पर उसकी कोई असलियत नजर नहीं आती। अगर समय रहते इन चेंबरों की डी-सिल्टिंग (सफाई) कर दी जाती, तो आज यह नौबत कभी न आती।

'सिर्फ पंप लगाना समाधान नहीं, जड़ पर वार करो'

नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए स्थानीय लोगों ने दो-टूक कहा है कि जलभराव की समस्या सामने आने पर केवल पंपिंग सेट लगाकर पानी खींच लेना कोई स्थायी इलाज नहीं है। यह तो महज एक दिखावा है जो कुछ घंटों की राहत देता है और अगली बार फिर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बन जाती है।

जनता की मांग है कि निगम के इंजीनियरों और अधिकारियों को कागजी बैठकों से बाहर निकलकर मौके पर आना चाहिए। उन्हें यह तलाशना होगा कि आखिर पानी का बहाव किस बिंदु पर और क्यों रुका है। सीवर लाइनों के स्लोप (ढलान) से लेकर मेनहोल तक की तकनीकी जांच होनी चाहिए ताकि इस समस्या का हमेशा के लिए खात्मा किया जा सके।

महाप्रबंधक और महापौर से लगाई गुहार

अब इस पूरे प्रकरण को लेकर स्थानीय लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। वार्ड के तमाम लोगों ने एकजुट होकर शहर के प्रथम नागरिक यानी महापौर और नगर निगम के उच्चाधिकारियों से गुहार लगाई है। उनकी मांग है कि इस दक्षिणी वार्ड की इस वीरान और गंदे पानी में डूबी गलियों का तत्काल स्थलीय निरीक्षण किया जाए।

लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो उन्हें नगर निगम कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। फिलहाल, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर कितनी जल्दी और कितनी संवेदनशीलता के साथ अपनी मशीनरी को सक्रिय करता है।

काशी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान के बीच बजरडीहा की यह जलभराव की तस्वीर प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ती है। देखना यह है कि जनता की यह चीख कब तक जिम्मेदार कुर्सियों तक पहुंचकर उन्हें नींद से जगाती है।

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रोली सिंह

रोली सिंह

Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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