बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के एक वर्चुअल भाषण ने भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों में बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। नई दिल्ली स्थित 'फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया' (FCCSA) में हसीना के लाइव संबोधन के बाद बांग्लादेश का विदेश मंत्रालय बुरी तरह भड़क गया है। ढाका ने भारत पर एक "भगोड़ी अपराधी" को अपनी जमीन से बांग्लादेश के खिलाफ जहर उगलने की इजाजत देने का गंभीर आरोप लगाया है।
दिल्ली से हुंकार और हसीना का बड़ा दावा
शेख हसीना ने अपने संबोधन में कहा कि उन्हें सत्ता से बेदखल करने की साजिश पर्दे के पीछे से रची गई थी। उन्होंने 2024 के विरोध प्रदर्शनों को केवल छात्रों का स्वतःस्फूर्त आंदोलन मानने से साफ इनकार कर दिया। अपनी सरकार के बचाव में हसीना ने दावा किया कि हिंसक उपद्रव के दौरान 3,000 से अधिक पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या की गई और करीब 460 पुलिस थानों को आग के हवाले कर दिया गया।
हसीना ने देश के मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा:
"बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मेरे देश लौटने पर भले ही जेल या गिरफ्तारी का सामना करना पड़े, लेकिन मैं अपनी जनता के बीच जरूर वापस आऊंगी।"
बांग्लादेश का तीखा हमला: हसीना को बताया 'नरसंहारक'
हसीना का बयान सामने आते ही बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने बेहद सख्त लहजे में आधिकारिक प्रेस रिलीज जारी की। ढाका ने पूर्व प्रधानमंत्री के लिए "सजायाफ्ता नरसंहारक" (Convicted Genocider) और "मास मर्डरर" जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया।
बांग्लादेश सरकार की मुख्य आपत्तियां:
- पूर्वाभास के बावजूद इजाजत: भारत को इस कार्यक्रम के कूटनीतिक परिणामों के बारे में पहले ही आगाह किया गया था।
- संप्रभुता का अपमान: जुलाई क्रांति की वर्षगांठ के दिन इस भाषण का प्रसारण बांग्लादेशी जनता और शहीदों की भावनाओं पर कुठाराघात है।
- आंकड़ों की अनसुनी: संयुक्त राष्ट्र द्वारा दर्ज मौतों के आंकड़ों को हसीना द्वारा झूठा बताना इतिहास बदलने की नाकाम कोशिश है।
प्रत्यर्पण संधि और भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असर
इस पूरे वाकये ने दोनों देशों के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है। बांग्लादेश ने याद दिलाया कि उसने 2013 की द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि के तहत शेख हसीना की वापसी की बार-बार मांग की है, लेकिन भारत की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। ढाका का स्पष्ट मानना है कि हसीना को भारतीय जमीन से मीडिया में बोलने की छूट देना द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है।