पीठ या रीढ़ की हड्डी में जरा सी भी तकलीफ इंसान की पूरी दिनचर्या को ठप कर सकती है। हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री की जानी-माने चेहरे और अभिनेत्री नुसरत भरूचा की रीढ़ की चोट ने एक बार फिर से स्पाइनल हेल्थ (Spinal Health) को लेकर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। बाली में हुए एक हादसे के बाद उनकी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर होने की खबर सामने आई, जिसके बाद उन्हें बेहतर मेडिकल केयर के लिए मुंबई लाया गया और उनकी टीम ने स्पाइन सर्जरी की जानकारी दी। हालांकि हर मामले में सर्जरी की जरूरत पड़े, यह जरूरी नहीं है। रीढ़ की हड्डियों से जुड़े फ्रैक्चर कई तरह के होते हैं, जिनमें से एक बेहद खास प्रकार है – वर्टिब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर (Vertebral Compression Fracture - VCF)।
अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिकल सर्जन्स (AANS) की एक रिसर्च के मुताबिक, रीढ़ की हड्डियों का फ्रैक्चर कई प्रकार का होता है और वीसीएफ (VCF) उन्हीं में से एक प्रमुख स्थिति है। इस मेडिकल कंडीशन के दौरान रीढ़ की हड्डी का एक हिस्सा काफी कमजोर हो जाता है, जिसे सीधा और स्थिर रखने के लिए कई बार मरीजों को पीठ का ब्रेस या गर्दन का कॉलर पहनने की सलाह दी जाती है। आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर यह समस्या क्या है, इसके लक्षण क्या हैं और यह किन कारणों से पैदा होती है।
वर्टिब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर (VCF) आखिर है क्या?
हमारी रीढ़ (Spine) कोई एक लंबी सीधी हड्डी नहीं है, बल्कि यह कई छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनी होती है, जिन्हें कशेरुका या वर्टिब्रा (Vertebrae) कहा जाता है। जब इनमें से किसी एक या एक से अधिक हड्डियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है या उनमें कोई अंदरूनी दरार आ जाती है, तो उसे वर्टिब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर कहा जाता है। इस प्रक्रिया में रीढ़ की हड्डी की कशेरुकाएं अंदर की तरफ दबने या सिकुड़ने लगती हैं।
यह समस्या आमतौर पर तब सामने आती है जब हड्डियां पहले से कमजोर हो चुकी हों। ऐसे मामलों में मामूली सी चोट लगना, अचानक गलत तरीके से उठना या हल्का सा गिर जाना भी इस खतरनाक फ्रैक्चर का कारण बन सकता है। इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति की हड्डियां पूरी तरह स्वस्थ और मजबूत हैं, तो इस तरह के फ्रैक्चर के पीछे कोई गंभीर या तेज दुर्घटना ही मुख्य वजह होती है।
रीढ़ की हड्डी समय के साथ कमजोर क्यों होने लगती है?
बढ़ती उम्र के साथ हमारे शरीर के कई अंगों की तरह हड्डियों की ताकत भी कम होने लगती है। लेकिन कुछ खास स्थितियां और बीमारियां इस प्रक्रिया को बेहद तेज कर देती हैं। रीढ़ की हड्डियों के कमजोर होने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हो सकते हैं:
- ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis): यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियां अंदर से खोखली और बेहद कमजोर हो जाती हैं, जिससे मामूली दबाव से भी उनके टूटने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
- उम्र का असर: बढ़ती उम्र के साथ शरीर में नए बोन टिशू बनने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
- पोषण की कमी: शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा का न होना हड्डियों के स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
- दवाइयों का प्रभाव: लंबे समय तक कुछ खास प्रकार की स्ट्रांग दवाइयों (जैसे स्टेरॉयड) का सेवन करने से भी हड्डियां कमजोर हो सकती हैं।
- कम फिजिकल एक्टिविटी: लगातार बैठे रहना या शारीरिक रूप से सक्रिय न रहना हड्डियों की डेंसिटी को कम करता है।
वर्टिब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर के मुख्य लक्षण
चोट लगने के बाद शरीर कई तरह के संकेत देता है। अगर किसी व्यक्ति को रीढ़ में चोट लगी है, तो उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। वीसीएफ या अन्य स्पाइनल फ्रैक्चर के लक्षणों को इन रूपों में पहचाना जा सकता है:
- पीठ के निचले या ऊपरी हिस्से में अचानक और तेज दर्द उठना।
- दर्द का लेटने या खड़े होने पर बढ़ना, जबकि आराम करने पर कुछ राहत मिलना।
- रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ झुक जाना या पोश्चर बदल जाना (जिसे कई बार कुबड़ापन भी कहा जाता है)।
- समय के साथ कद (Height) में थोड़ी कमी महसूस होना।
- यदि चोट गंभीर है और नसों पर दबाव पड़ रहा है, तो पैरों में सुन्नपन (Numbness), कमजोरी या चलने-फिरने में भारी परेशानी होना।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चोट लगने के बाद पैरों में लगातार सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो, तो बिना एक पल गंवाए तुरंत किसी अच्छे न्यूरोसर्जन या ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
क्या हर स्पाइनल फ्रैक्चर में सर्जरी की जरूरत होती है?
यह एक ऐसा सवाल है जो ज्यादातर मरीजों और उनके परिजनों के मन में उठता है। इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि फ्रैक्चर कितना गंभीर है, रीढ़ की स्थिरता (Spinal Stability) कैसी है और क्या इस चोट का असर सीधे तौर पर नसों या स्पाइनल कॉर्ड पर पड़ रहा है या नहीं।
मेडिकल साइंस के अनुसार, सभी स्पाइनल फ्रैक्चर के लिए सर्जरी अनिवार्य नहीं होती है। कई मामलों में, जिन्हें 'स्टेबल फ्रैक्चर' (Stable Fracture) कहा जाता है, उनका इलाज रूढ़िवादी तरीकों से किया जाता है। इसमें दर्द निवारक दवाएं, बेड रेस्ट, खास मेडिकल ब्रेस या कॉलर और डॉक्टर की कड़ी निगरानी शामिल होती है। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिकल सर्जन्स की रिसर्च के मुताबिक, वर्टिब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर का दर्द कई मामलों में समय के साथ खुद-ब-खुद या बिना सर्जरी के भी कम हो सकता है।
हालांकि, इसके विपरीत, यदि फ्रैक्चर बहुत जटिल है, हड्डी अपनी जगह से ज्यादा खिसक गई है या रीढ़ की मुख्य नसों पर गंभीर दबाव बन रहा है, तो मरीज को बचाने और उसे रिकवर करने के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है।
बचाव और सावधानी के उपाय
अपनी रीढ़ की हड्डी को दीर्घकालिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रखने के लिए जरूरी है कि आप अपनी जीवनशैली में कुछ सकारात्मक बदलाव करें। अपने आहार में डेयरी प्रोडक्ट्स, हरी पत्तेदार सब्जियां और कैल्शियम-विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करें। नियमित रूप से हल्की एक्सरसाइज, योग और वॉक करने से हड्डियों की डेंसिटी बेहतर बनी रहती है। साथ ही, भारी वजन उठाते समय हमेशा सही पोश्चर का ध्यान रखें ताकि रीढ़ की हड्डी पर अचानक अनचाहा दबाव न पड़े।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई समस्त जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और पाठकों की जानकारी के लिए है। इसे किसी भी तरह के पेशेवर मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प न समझें। रीढ़ की हड्डी या स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी समस्या के उत्पन्न होने पर हमेशा अपने नजदीकी योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।