उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर से आरक्षण और सामाजिक न्याय का मुद्दा पूरी शिद्दत के साथ गरमा गया है। प्रदेश के चार प्रमुख राजकीय मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की आरक्षण व्यवस्था को लेकर उपजे भारी विवाद के बाद अब राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी कड़ी में कांग्रेस पार्टी ने राज्य की सत्ताधारी सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए आर-पार की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। पार्टी की रणनीति साफ है कि इस मामले को केवल बयानों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे जन-जन तक पहुंचाया जाएगा।
राजधानी लखनऊ में प्रेस वार्ता के दौरान गरमाई सियासत
रविवार को राजधानी लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। इस दौरान उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रभारी और एआईसीसी अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने राज्य सरकार की नीतियों पर तीखे प्रहार करते हुए कहा कि वंचितों और दलितों के संवैधानिक अधिकारों पर सुनियोजित तरीके से डाका डाला जा रहा है, जिसे कांग्रेस पार्टी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी।
प्रेस वार्ता में पार्टी के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद रहे, जिनमें कांग्रेस मीडिया विभाग के चेयरमैन कुंवर सिंह निषाद और प्रदेश प्रवक्ता सचिन रावत प्रमुख रूप से शामिल थे। नेताओं ने एक सुर में कहा कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के हक की लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस का हर एक कार्यकर्ता सड़क से लेकर अदालत तक संघर्ष करने को पूरी तरह तैयार है।
क्या है पूरा मामला और क्यों मचा है बवाल?
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश के चार विशिष्ट जिलों में स्थापित राजकीय मेडिकल कॉलेजों से जुड़ा हुआ है। इन मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के पीछे एक विशेष सामाजिक उद्देश्य और कल्याणकारी योजना काम कर रही थी। आइए जानते हैं इस विवाद की पूरी पृष्ठभूमि:
- विशेष योजना के तहत स्थापना: दलितों और वंचितों के शैक्षणिक और सामाजिक कल्याण के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान (एससीपी) के तहत इन मेडिकल कॉलेजों को बनाया गया था।
- चार प्रमुख जिले: ये मेडिकल कॉलेज उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, अम्बेडकर नगर, कन्नौज और जालौन जिलों में स्थापित किए गए हैं।
- आरक्षण का मूल नियम: इन चारों कॉलेजों की कुल 200 सीटों में से नियमों के मुताबिक 70 प्रतिशत सीटें विशेष रूप से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिए आरक्षित थीं।
- अधिकारों पर संकट: हाल ही में इन सीटों की आरक्षण व्यवस्था में आए बदलाव और कथित तौर पर बरती गई लापरवाही ने दलित समाज के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
भाजपा सरकार की नीयत पर उठे गंभीर सवाल
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने मौजूदा सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि इन मेडिकल कॉलेजों की आरक्षण व्यवस्था में जो विवाद पैदा हुआ है, वह किसी प्रशासनिक भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कहा कि सरकार की लचर पैरवी और उदासीन रवैये के कारण दलित छात्रों के विशेष अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।
उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकारें संविधान को आंतरिक रूप से स्वीकार नहीं करती हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की धरती पर लगातार संविधान और सामाजिक न्याय की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सरकारी धन के कथित दुरुपयोग और हाशिए के समाज के अधिकारों की अनदेखी इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि शासन स्तर पर पिछड़ों और दलितों के प्रति क्या मानसिकता काम कर रही है।
गाँव-गाँव और गली-गली गूंजेगी 'दलित चौपाल'
सरकार के इस कथित दलित विरोधी रवैये का पुरजोर विरोध करने और समाज को जागरूक करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने एक व्यापक स्तर पर रणनीति तैयार की है। पार्टी अब चुप बैठने के मूड में नहीं है, बल्कि उसने राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है:
- प्रदेशव्यापी अभियान: उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में और सुदूर गांवों तक 'दलित चौपाल' का आयोजन किया जाएगा।
- अधिकारों के प्रति जागरूकता: इन चौपालों के माध्यम से दलित और वंचित समाज के लोगों को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के बारे में विस्तार से समझाया जाएगा।
- कथनी और करनी का भेद: भाजपा सरकार के दावों और उसकी वास्तविक नीतियों में कितना अंतर है, इसे जनता के सामने बेनकाब किया जाएगा।
- संघर्ष का विस्तार: यह आंदोलन केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर कानूनी विशेषज्ञों की मदद से अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधा सवाल
प्रेस वार्ता के दौरान कांग्रेस नेतृत्व ने सीधे तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस विवाद के घेरे में खड़ा किया। राजेंद्र पाल गौतम ने मुख्यमंत्री से स्पष्ट शब्दों में मांग की कि सरकार अपनी स्थिति पूरी तरह साफ करे। उन्होंने कहा कि:
"मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जनता के सामने आकर यह बताना चाहिए कि उनकी सरकार वास्तव में आरक्षण के पक्ष में है या इसके खिलाफ खड़ी है? सरकार अपनी मंशा को लेकर कोई पर्दा न रखे और दलितों के छींके गए अधिकारों को तत्काल प्रभाव से बहाल करने के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाए।"
आगामी राजनीतिक रस्साकशी के संकेत
विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से यह मुद्दा काफी तूल पकड़ सकता है। दलित वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सभी राजनीतिक दल लगातार सक्रिय रहते हैं। ऐसे में मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस का आक्रामक रुख अन्य विपक्षी दलों के लिए भी अपनी रणनीतियों को धार देने का एक नया अवसर बन गया है।
अब देखना यह होगा कि प्रदेश सरकार इस पूरे मामले पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देती है और क्या इन 200 सीटों की आरक्षण व्यवस्था को लेकर कोई नया संशोधन या स्पष्टीकरण सामने आता है। फिलहाल, कांग्रेस के 'दलित चौपाल' अभियान ने राज्य की राजनीतिक फिजाओं में गर्मी बढ़ा दी है और यह तय है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़क से लेकर सदन तक जोर-शोर से गूंजेगा।