महीनों की मेहनत पर फिरा पानी, करीब 20 लाख रुपये की आर्थिक क्षति का अनुमान
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के मकसूदापुर क्षेत्र में पराली जलाने के दौरान फैली आग की चपेट में आने से लगभग 25 किसानों की गन्ने की खड़ी फसल जलकर पूरी तरह राख हो गई। इस दुर्घटना में करीब 75 बीघा क्षेत्रफल में लहलहाती फसल नष्ट हो गई है, जिससे प्रभावित किसानों को लगभग 20 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। फसल के इस प्रकार अचानक नष्ट हो जाने से किसानों के समक्ष अब अपने परिवार के भरण-पोषण और आगामी कृषि सत्र की तैयारियों को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
कैसे फैली आग और कितना हुआ नुकसान
घटना की शुरुआत उस समय हुई जब मकसूदापुर इलाके में खेत में पराली जलाई जा रही थी। देखते ही देखते इस आग की लपटों ने विकराल रूप धारण कर लिया और यह अनियंत्रित होकर आसपास के अन्य खेतों तक फैल गई। खेतों में सूखी घास और फसल अवशेषों की मौजूदगी के कारण आग तेजी से आगे बढ़ी और वहां खड़ी गन्ने की फसल को अपनी आगोश में ले लिया। जब तक स्थानीय स्तर पर आग पर काबू पाने के प्रयास किए जाते और लोग मदद के लिए जुटते, तब तक आग ने बड़े भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया था। इस हादसे में कुल 25 किसानों की 75 बीघा फसल जलकर खाक हो गई, जिससे शुरुआती अनुमान के मुताबिक लगभग 20 लाख रुपये का नुकसान आंका गया है।
किसानों की आजीविका पर संकट
गन्ने की फसल को तैयार करने की प्रक्रिया काफी लंबी और खर्चीली होती है। किसानों को खेत की जुताई और तैयारी से लेकर बुवाई, नियमित सिंचाई, उर्वरकों के इस्तेमाल और मजदूरी पर लगातार पूंजी लगानी पड़ती है। कई महीनों की कड़ी मेहनत और देखरेख के बाद ही फसल कटाई के लिए तैयार होती है, जिससे किसानों को अपनी लागत निकालने और सालभर की जरूरतें पूरी करने की उम्मीद बंधती है। सीजन के अंतिम चरण में इस तरह फसल के स्वाहा होने से किसानों की पूरी वित्तीय गणित बिगड़ गई है। अब किसानों को इस भारी नुकसान की भरपाई की चिंता सता रही है।
प्रशासनिक मुआवजे को लेकर स्थिति और सतर्कता की जरूरत
हादसे के बाद प्रभावित किसानों को उम्मीद है कि जिला प्रशासन या कृषि विभाग खेतों में हुए नुकसान का वास्तविक आकलन कराएगा, ताकि उन्हें उचित मुआवजा मिल सके। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रशासनिक स्तर पर नुकसान के आकलन या मुआवजे के भुगतान को लेकर अभी तक किसी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। कृषि जानकारों का मानना है कि खेतों में पराली या फसल के अवशेष जलाना न केवल पर्यावरण और मिट्टी की उर्वरता के लिए हानिकारक है, बल्कि हवा चलने पर ऐसी घटनाएं आसपास की खड़ी फसलों के लिए बड़ा खतरा बन जाती हैं। इस दुर्घटना ने एक बार फिर पराली के सुरक्षित और वैज्ञानिक निस्तारण के तौर-तरीकों को अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।