शिक्षा की परिभाषा केवलता किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं होती, बल्कि जब ज्ञान सीधे समाज और प्रकृति के अनुभवों से जुड़ता है, तब वह संस्कार बन जाता है। सितंबर 2026 के इस सुहाने शनिवार को उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र वाराणसी में कुछ ऐसा ही अनूठा नजारा देखने को मिला। यहाँ के श्रीनगर कॉलोनी, अकथा पहड़िया स्थित प्रतिष्ठित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर के प्रांगण में एक ऐसी पाठशाला सजी, जिसके शिक्षक कोई साधारण गुरुजी नहीं, बल्कि देश की सरहदों की रक्षा करने वाले वीर सैनिक थे।
पेड़ की छांव में लगी देश के भविष्य की पर्यावरण क्लास
आमतौर पर कक्षाओं की चार दीवारों और ब्लैकबोर्ड के बीच सिमटने वाली पढ़ाई आज एक नए रूप में थी। 137 सीईटीएफ 39 जीआर गंगा टास्क फोर्स और नमामि गंगे गंगा विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भागीदारी' कार्यक्रम ने स्कूल के बच्चों के साथ-साथ पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। खुले आसमान के नीचे, विशाल पेड़ों की ठंडी छांव में जब देश के जांबाज सैनिकों ने बच्चों को पर्यावरण का पाठ पढ़ाया, तो वह दृश्य वाकई प्रेरणादायक था।
सूबेदार जगदीश चंद और नमामि गंगे के जिला संयोजक शिवम अग्रहरि के नेतृत्व में इस विशेष पर्यावरण साक्षरता अभियान की शुरुआत की गई। सैनिकों ने बच्चों को यह समझाया कि जिस तरह देश की सीमा की रक्षा करना एक सैनिक का कर्तव्य है, उसी तरह इस धरती और हमारी जीवनदायिनी नदियों की रक्षा करना हर एक नागरिक, विशेषकर युवा पीढ़ी का सबसे बड़ा धर्म है।
नन्हे हाथों ने मिट्ठी में रोपे जीवन के बीज
किताबों में पेड़ों के महत्व को पढ़ने वाले मासूम बच्चों के लिए आज का दिन बेहद खास था। उनके हाथों में किताबें नहीं, बल्कि खुरपी और पौधे थे। विद्यालय परिसर में बच्चों ने भारी उत्साह और उमंग के साथ दर्जनों नए पौधे रोपे। नन्हे-मुन्ने बच्चों के चेहरे पर पौधे लगाने की जो खुशी और चमक थी, वह देखते ही बनती थी। हर बच्चे ने इस बात का संकल्प लिया कि वे सिर्फ पौधे लगाएंगे ही नहीं, बल्कि उनके बड़े होने तक उनकी पूरी देखभाल भी करेंगे।
- पौधरोपण अभियान: विद्यालय परिसर में विभिन्न प्रजातियों के दर्जनों पौधे लगाए गए।
- वितरण: सभी विद्यार्थियों को घर ले जाने के लिए पौधे दिए गए ताकि वे अपने मोहल्लों में हरियाली बढ़ा सकें।
- जल संरक्षण: बच्चों को पानी की एक-एक बूंद बचाने और उसका सदुपयोग करने की शपथ दिलाई गई।
- गंगा निर्मलीकरण: मां गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए युवाओं को आगे आने का संदेश दिया गया।
'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' से गूंजा परिसर
जब बच्चों ने अपने छोटे-छोटे हाथों से मिट्टी को संवारकर उसमें पौधे को रोपा, तो पूरा विद्यालय परिसर देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' के उद्घोष ने पूरे माहौल को ऊर्जावान बना दिया। सैनिकों और बच्चों की यह सहभागिता इस बात का प्रतीक थी कि आने वाला भविष्य सुरक्षित हाथों में है और देश का युवा पर्यावरण के प्रति अब पूरी तरह से जागरूक हो रहा है।
विशेषज्ञों और शिक्षकों ने रखी अपनी बात
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण संकट आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से निपटने का एकमात्र उपाय अधिक से अधिक पेड़ लगाना और जल स्रोतों को बचाना है।
कार्यक्रम की समन्वयक डॉ. नलिनी पाठक और विद्यालय की प्रधानाचार्या प्रियंका यादव ने संयुक्त रूप से कहा कि बच्चों के मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान जगाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, "जब बच्चे खुद अपने हाथों से पौधे लगाते हैं, तो उनका पेड़ों के साथ एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है, जो उन्हें भविष्य में पर्यावरण प्रेमी नागरिक बनाता है।"
इस अवसर पर गंगा सेवक जय विश्वकर्मा, पद्मावती चतुर्वेदी, ममता सिंह, हृदयांश सिंह, सुरेंद्र सिंह, भीम सिंह और राजेश शुक्ला समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे, जिन्होंने बच्चों का उत्साहवर्धन किया और इस महाअभियान में अपनी सहभागिता निभाई।
भविष्य के लिए एक मजबूत संदेश
यह आयोजन सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति जवाबदेह बनाने की एक ठोस शुरुआत थी। वाराणसी की इस पावन भूमि से निकला यह संदेश दूर-दूर तक गया कि यदि हमें अपनी धरती को बचाना है, तो हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सैनिकों की इस अनूठी पहल ने यह साबित कर दिया कि देश की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि एक हरी-भरा और स्वस्थ पर्यावरण देकर भी की जा सकती है।