वाराणसी में दिखा मुंबई जैसा रंग: लालबाग के राजा की विसर्जन यात्रा में गूंजे ढोल-ताशे
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वाराणसी में दिखा मुंबई जैसा रंग: लालबाग के राजा की विसर्जन यात्रा में गूंजे ढोल-ताशे

वाराणसी में दिखा मुंबई जैसा रंग: लालबाग के राजा की विसर्जन यात्रा में गूंजे ढोल-ताशे

काशी की प्राचीन और संकरी गलियों में इन दिनों एक अलग ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उल्लास देखने को मिल रहा है। मौका था बाबा विश्वनाथ की नगरी में विराजे प्रसिद्ध 'लालबाग के राजा' की विसर्जन शोभायात्रा का। पांच दिवसीय गणेशोत्सव के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद, विघ्नहर्ता को अत्यंत भावुक और भव्य माहौल में विदाई दी गई। इस दौरान महाराष्ट्र की पारंपरिक संस्कृति और काशी की धार्मिक अनूठी परंपरा का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने हर किसी का मन मोह लिया।

ठठेरी बाजार में उमड़ा जनसैलाब, गूंजे बप्पा के जयकारे

चौक क्षेत्र के ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी (अग्रवाल भवन) में इस वर्ष भी मुंबई के प्रसिद्ध लालबाग के राजा की तर्ज पर भव्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। छह फीट ऊंची इस मनमोहक प्रतिमा के विसर्जन के लिए निकाली गई यात्रा ने पूरे शहर को भक्तिमय कर दिया। सुबह से ही पंडाल और उसके आसपास भक्तों का तांता लगा हुआ था। हर कोई बस एक बार बप्पा की एक झलक पाने के लिए बेताब दिखाई दे रहा था।

जैसे ही फूलों से सजे भव्य रथ पर लालबाग के राजा की प्रतिमा को विराजमान किया गया, पूरा क्षेत्र 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों सभी में बप्पा की विदाई को लेकर एक तरफ जहां उत्साह था, वहीं दूसरी तरफ अगले एक साल तक उनके वियोग की हल्की सी उदासी भी साफ झलक रही थी।

महाराष्ट्र के 80 सदस्यीय दल ने बांधा समां

इस विसर्जन यात्रा का सबसे बड़ा और मुख्य आकर्षण महाराष्ट्र से आया विशेष 80 सदस्यीय ढोल-ताशा दल रहा। जब इस दल ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर अपनी जोशीली थाप दी, तो ठठेरी बाजार और आसपास की गलियां ऊर्जा से भर उठीं। ढोल और ताशों की गूंज के साथ जब युवाओं ने पारंपरिक लेजिम और नृत्य प्रस्तुत किया, तो पूरा वातावरण उत्सव में बदल गया। काशीवासी भी खुद को रोक नहीं पाए और बप्पा के जयकारों के साथ ढोल की थाप पर जमकर थिरके।

स्थानीय दुकानदारों और मार्ग में खड़े श्रद्धालुओं ने बप्पा के रथ पर जगह-जगह पुष्पवर्षा की। संकरी गलियों की छतों और बालकनी से भी लोग इस ऐतिहासिक विसर्जन यात्रा का वीडियो बनाते और फूलों की बारिश करते नजर आए। सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम के बीच यह यात्रा अपने तय मार्ग से होते हुए आगे बढ़ी।

मुंबई के मुख्य कलाकारों द्वारा तैयार की गई थी प्रतिमा

आयोजन समिति से जुड़े लोगों ने बताया कि इस बार की यह छह फीट ऊंची प्रतिमा बेहद खास थी। इसे विशेष रूप से मुंबई से ही तैयार करवाकर वाराणसी मंगाया गया था। इस प्रतिमा को बनाने वाले कारीगर वही थे, जो मुंबई के मुख्य 'लालबागचा राजा' की विशालकाय मूर्तियों के निर्माण से जुड़े होते हैं। यही कारण था कि इस प्रतिमा की फिनिशिंग और भव्यता देखते ही बनती थी। पांच दिनों तक चले इस गणेशोत्सव के दौरान इस प्रतिमा ने हर दर्शनार्थी का ध्यान अपनी ओर खींचा।

पांच दिनों तक चले विविध धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान

इस पांच दिवसीय गणेशोत्सव की शुरुआत 14 सितंबर 2026 को पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई थी। इन पांच दिनों में रोजाना सुबह और शाम के वक्त भव्य महाआरतियों का आयोजन किया गया, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचे। महाआरती के अलावा भजन-कीर्तन और विभिन्न सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं ने भी उत्सव में चार चांद लगाए।

बच्चों से लेकर बड़ों तक ने इन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। नियमित रूप से मोदक का भोग और पूजन-अर्चन कर भक्तों ने सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। पांचवें दिन यानी आज विसर्जन के साथ ही इन पांच दिनों के पावन पर्व का औपचारिक समापन हुआ।

भावुक आंसुओं के साथ हुई बप्पा को अंतिम विदाई

शोभायात्रा जब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंची, तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। 'पुनश्च आगमनाय च' (अगले वर्ष फिर जल्दी आना) की कामना के साथ भक्तों ने भारी मन से विघ्नहर्ता को विदाई दी। महिलाओं ने पारंपरिक गीतों के माध्यम से बप्पा की महिमा का बखान किया।

काशी की तंग गलियों में गूंजते ढोल-ताशों के स्वर और 'गणपति बप्पा मोरया' के जयघोष ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आस्था की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। महाराष्ट्र की परंपरा जब काशी के सांस्कृतिक वैभव के साथ मिलती है, तो एक ऐसा अद्भुत दृश्य उत्पन्न होता है जो हमेशा के लिए स्मृतियों में दर्ज हो जाता है। बप्पा के विसर्जन के साथ ही अब सभी को अगले वर्ष 2027 के गणेशोत्सव का बेस्रबी से इंतजार रहेगा।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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