सनातन संस्कृति और आस्था के प्रमुख केंद्र वाराणसी में इन दिनों धार्मिक उल्लास अपने चरम पर है। शहर के प्रसिद्ध दुर्गाकुंड स्थित भगवती मां कुष्मांडा के दरबार में आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक श्रृंगार एवं संगीत महोत्सव का समापन बेहद भव्य और दिव्य माहौल में हुआ। महोत्सव के अंतिम दिन मां कुष्मांडा का स्वर्ण-जवाहर और दुर्लभ रत्नाभूषणों से ऐसा अलौकिक श्रृंगार किया गया कि दर्शन करने वाले हर शख्स की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं। मंदिर परिसर में अलसुबह से लेकर देर रात तक गूंजते रहे मां के जयकारों ने पूरे इलाके को भक्तिमय बना दिया।
पंचामृत स्नान और बनारसी लाल साड़ी में सजीं मां की दिव्य छवि
महोत्सव के अंतिम दिन मंदिर के महंत पंडित कौशलपति द्विवेदी और पंडित संजय दुबे के सानिध्य में पूरी वैदिक परंपरा और विधि-विधान के साथ मां कुष्मांडा को पंचामृत स्नान कराया गया। इसके बाद मां को पारंपरिक बनारसी लाल साड़ी और भव्य लाल चुनरी धारण कराई गई। मां के इस रूप को और अधिक मनोहारी बनाने के लिए विशेष रूप से कोलकाता से मंगाए गए ताजे गुलाब और रजनीगंधा के फूलों से पूरे दरबार को सजाया गया था। दीपों की टिमटिमाती रोशनी और सोंधी फूलों की महक के बीच मंदिर की छटा देखते ही बन रही थी।
मां को मांगटीका, नथिया, चमकता हुआ स्वर्ण मुकुट और विशेष फाटा हार धारण कराया गया था। इसके अलावा स्वर्ण-रजत युक्त मोतियों की लड़ियों और अनमोल रत्नाभूषणों से किए गए श्रृंगार ने मां के स्वरूप को बेहद भव्य और आकर्षक बना दिया। इस दुर्लभ छवि के दर्शन के लिए दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं और हर कोई इस अलौकिक पल को अपने कैमरे और आंखों में कैद करने को आतुर दिखा.
21 कलाकारों की स्वरांजलि से गूंजा प्रांगण, देवी गीतों ने बांधा समां
केवल दर्शन और पूजन ही नहीं, बल्कि संगीत के सतरंगी कार्यक्रमों ने भी इस तीन दिवसीय महोत्सव में चार चांद लगा दिए। अंतिम दिन आयोजित संगीत समारोह में पूर्वांचल के जाने-माने 21 कलाकारों ने अपनी मधुर आवाज में देवी गीत और पारंपरिक लोकगीत गाकर मां के चरणों में अनोखी स्वरांजलि अर्पित की। गोपाल राय, विजय कपूर, भावना सिंह, कल्पना सिंह, विदुषी वर्मा, करिश्मा पांडेय, पीयूष मिश्र, ज्योति माही, पवन परदेशी, ममता शर्मा, नियति वर्मा, प्रियंका पांडेय और अंजली ऊर्वशी जैसे प्रतिष्ठित कलाकारों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां दीं।
जब मंच से ‘जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी...’, ‘अम्बे चरण कमल है तेरे...’, ‘कैसे नाही इठलाऊं मेरी मईया है आयी...’ और पारंपरिक पचरा जैसे दिव्य गीत गूंजे, तो पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया। संगीत को जीवंत बनाने में संगतकारों का भी अहम योगदान रहा। तबले पर मोतीलाल शर्मा, ढोलक पर सोनू, कीबोर्ड पर नीरज, रामाश्रय व शिवांश, पैड पर राहुल और बैंजो पर जियाराम ने अपनी बेहतरीन संगत से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।
लगातार 12 घंटे चला विशाल अखंड भंडारा, 15 हजार भक्तों ने पाया प्रसाद
धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला में महाभोग और भंडारे का विशेष महत्व होता है। मां कुष्मांडा के दरबार में भी भोग आरती के ठीक बाद दोपहर 12 बजे से अखंड भंडारे की शुरुआत हुई, जो बिना रुके रात के 12 बजे तक यानी पूरे 12 घंटे अनवरत चलता रहा। दोपहर ढलते ही प्रसाद ग्रहण करने वाले श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं, जो शाम ढलने के बाद और लंबी होती चली गईं।
मंदिर के आयोजकों में शामिल पंडित विशेश्वर झा ‘सोनू’ ने जानकारी देते हुए बताया कि इस विराट अखंड भंडारे में कुल 15 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां का महाप्रसाद ग्रहण किया। कतारबद्ध होकर अनुशासित तरीके से प्रसाद पाने वाले इन भक्तों ने मां के दरबार में मत्था टेककर अपने परिवार की सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य की मंगल कामना की।
भक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना दुर्गाकुंड
इन तीन दिनों के दौरान वाराणसी का दुर्गाकुंड क्षेत्र केवल एक मंदिर परिसर नहीं, बल्कि पूरी तरह से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा का मुख्य केंद्र बना रहा। मां के अलग-अलग मनमोहक स्वरूपों के श्रृंगार, नियमित पूजन, भव्य महाआरती, भजनों की गूंज और लोकगीतों की मिठास ने श्रद्धालुओं को लगातार तीन दिनों तक एक अलौकिक लोक से जोड़े रखा।
कार्यक्रम के अंत में सभी सम्मानित कलाकारों का स्वागत मंदिर समिति के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा किया गया। कलाकारों का स्वागत करने वालों में मुख्य रूप से कौशलपति द्विवेदी, बिंदु दुबे और सोनू झा शामिल रहे, जबकि पूरे आयोजन का कुशल संयोजन और मंच संचालन प्रभुनाथ राय ‘दाढ़ी’ ने बखूबी निभाया। स्वर्णाभूषणों से दमकती मां की छवि, हवा में तैरती देवी गीतों की स्वर लहरियां और भंडारे में उमड़ा जनसैलाब इस बात की गवाही दे रहा था कि काशी में आस्था की यह धारा सदा इसी तरह प्रवाहित होती रहेगी।