धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में इस बार एक ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसने बाजारों की रौनक को कई गुना बढ़ा दिया है। इस साल 14 सितंबर 2026 को एक ही दिन हरतालिका तीज और गणेश उत्सव जैसे दो बड़े पर्व पड़ रहे हैं। इस दोहरे उत्सव के कारण शिव नगरी काशी में उत्साह का माहौल अपने चरम पर है। एक तरफ जहां सुहागिन महिलाएं हरतालिका तीज की तैयारियों में जुटी हैं, वहीं दूसरी तरफ विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्वागत करने के लिए पूरा शहर पलकें बिछाए बैठा है।
काशी के बाजारों में छाई बहार, डबल सेलिब्रेशन का क्रेज
त्योहारों के एक ही दिन आ जाने से वाराणसी के प्रमुख बाजारों में खरीदारों का सैलाब उमड़ पड़ा है। चौक, गोदौलिया, और काशी विश्वनाथ क्षेत्र के आसपास की गलियों में पैर रखने की जगह नहीं बची है। महिलाएं तीज के व्रत के लिए पारंपरिक शृंगार सामग्री, नए वस्त्र और पूजन थाली सजाने के सामान की खरीदारी में व्यस्त हैं। वहीं, युवा और श्रद्धालुगण अपने घरों और पंडालों में विराजमान करने के लिए भगवान गणेश की भव्य मूर्तियों की तलाश कर रहे हैं।
व्यापारी संघ के अनुसार, इस बार का कारोबार पिछले कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ सकता है। दोनों पर्वों के एक साथ होने के कारण पूजा-पाठ की सामग्री से लेकर फूलों और मिठाइयों तक की मांग में जबरदस्त उछाल आया है
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काशी की पारंपरिक वेशभूषा में नजर आएंगे गणपति
इस गणेश उत्सव की सबसे खास बात मूर्तिकारों द्वारा की जा रही विशेष तैयारियां हैं। काशी की सांस्कृतिक माटी से जुड़े मूर्तिकार इस बार गणपति बप्पा को एक बिल्कुल नए और अनोखे अवतार में ढाल रहे हैं। शहर के प्रसिद्ध मूर्तिकार अभिजीत विश्वास इस बार भगवान गणेश की एक ऐसी प्रतिमा तैयार कर रहे हैं, जो स्थानीय संस्कृति की खुशबू बिखेर रही है।
इस विशेष प्रतिमा में भगवान गणेश को ठेठ बनारसी अंदाज में दर्शाया गया है। बप्पा इस रूप में धोती-कुर्ता पहने हुए और अपने कंधे पर पारंपरिक गमछा रखे नजर आएंगे। काशी की इस सांस्कृतिक पहचान को बप्पा के रूप में ढालने का यह प्रयोग श्रद्धालुओं के बीच खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। मूर्तिकारों का मानना है कि यह अनोखा स्वरूप इस बार के उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण केंद्र साबित होग
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मूर्तिकारों के सामने मौसम और समय की दोहरी चुनौती
एक तरफ जहां भक्तों में भारी उत्साह है, वहीं दूसरी तरफ मूर्तिकारों की नींद उड़ी हुई है। सितंबर के इस मौसम में लगातार हो रही बारिश और वातावरण में मौजूद नमी (humidity) ने कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं समय पर सूख नहीं पा रही हैं, जिसके कारण उन पर रंग-रोगन और फाइनल टच देने का काम अटक गया है।
मूर्तिकार अभिजीत विश्वास ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि इस बार डिमांड इतनी ज्यादा है कि उन्हें कई नए ऑर्डर्स मना करने पड़े। समय की कमी और मौसम की बेरुखी के चलते कई एडवांस बुकिंग समय पर पूरी करना असंभव सा हो गया है। दिन-रात एक करने के बावजूद कारीगरों को तय समयसीमा के भीतर मूर्तियों को तैयार करने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
घर-घर और संस्थानों में बढ़ रहा है गणेश स्थापना का क्रेज
पिछले कुछ वर्षों में काशी ही नहीं बल्कि पूरे देश में गणेश उत्सव का दायरा काफी व्यापक हुआ है। अब केवल बड़े सार्वजनिक पंडालों तक ही यह पर्व सीमित नहीं रह गया है, बल्कि घर-घर, सोसाइटियों और व्यापारिक संस्थानों में भी बड़े पैमाने पर गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाने लगी हैं।
इस बदलती परंपरा के कारण हर साल गणेश मूर्तियों की मांग में लगातार इजाफा हो रहा है। जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में यह ट्रेंड और ज्यादा मजबूत होगा, जिससे स्थानीय कारीगरों और कलाकारों को अपनी कला दिखाने के और अधिक अवसर मिलेंगे।
निष्कर्ष: आस्था और उमंग का संगम
14 सितंबर 2026 का यह दिन काशी के इतिहास में एक यादगार दिन बनने जा रहा है। एक तरफ अखंड सौभाग्य का पर्व हरतालिका तीज, और दूसरी तरफ विघ्नविनाशक गणेशोत्सव का आगमन—इन दोनों का यह मिलन सनातन संस्कृति की उस खूबसूरती को दर्शाता है जो हर परिस्थिति में उत्सव मनाना सिखाती है। तमाम प्रशासनिक तैयारियों और बाजारों की चहल-पहल के बीच काशी पूरी तरह से सज चुकी है और हर कोई बस उस पल का इंतजार कर रहा है जब घर-घर गूंजेगा— 'गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।'