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वाराणसी में उमंगोत्सव का भव्य आयोजन: शिव आराधना से सजी लोक संस्कृति

वाराणसी में उमंगोत्सव का भव्य आयोजन: शिव आराधना से सजी लोक संस्कृति

धार्मिक नगरी वाराणसी में इन दिनों सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम मची हुई है। इसी कड़ी में भारतीय लोक परंपराओं और सावन-भादो के पावन पर्वों के उल्लास को मंच पर जीवंत करते हुए 'भारत विकास परिषद', काशी शाखा की ओर से एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम 'उमंगोत्सव' का आयोजन किया गया। इस विशेष आयोजन में सनातन संस्कृति की गहरी जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और महिला सहभागिता का एक ऐसा सुंदर संगम देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर दर्शक का मन मोह लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण पारंपरिक पर्वों का वह क्रम रहा, जिसने प्राचीन स्मृतियों को एक बार फिर से ताजा कर दिया।

शिव आराधना से शुरू हुआ सांस्कृतिक सफर

कार्यक्रम की शुरुआत बेहद आध्यात्मिक और मनमोहक अंदाज में हुई। मंच पर प्रस्तुत सांस्कृतिक सफर की शुरुआत भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के साथ की गई। इसके बाद एक के बाद एक ऐसे पर्वों को मंच पर उतारा गया, जो भारतीय जनजीवन और पूर्वांचल की संस्कृति के प्राण माने जाते हैं। नाग पंचमी के रोमांच, हरियाली तीज के हरे-भरे उल्लास, रक्षाबंधन के पवित्र भाई-बहन के स्नेह, कजरी की मिठास, जन्माष्टमी के अलौकिक आनंद, हरितालिका तीज के कठिन व्रत और गणेश चतुर्थी की मंगलमय आराधना तक के सफर को बेहद करीने से प्रस्तुत किया गया।

प्रत्येक प्रस्तुति के माध्यम से न केवल धार्मिक मान्यताओं को दर्शाया गया, बल्कि समाज में उन पर्वों की प्रासंगिकता और उत्सवधर्मिता को भी बहुत ही प्रभावी ढंग से रेखांकित किया गया। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय और पारंपरिक वेशभूषा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

पूर्वांचल की कजरी और सावन की मिठास

जब बात सावन और भादो की हो, और पूर्वांचल की लोक संस्कृति का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। 'उमंगोत्सव' के मंच पर जब कजरी की प्रस्तुतियां शुरू हुईं, तो पूरा हॉल सावन की फुहारों और लोकगीतों की मिठास में डूब गया। पारंपरिक लोकगीतों की धुनों के साथ सावन के झूले, सखियों का उल्लास और लोकजीवन के वास्तविक भाव मंच पर जीवंत हो उठे।

इस दौरान महिलाओं और युवतियों की उस पारंपरिक सहभागिता को भी बखूबी दर्शाया गया, जो सदियों से हमारी ग्रामीण और शहरी संस्कृति का हिस्सा रही है। सावन के महीने में समूह में बैठकर लोकगीत गाने और मल्हार की तान छेड़ने की जो परंपरा धूमिल हो रही है, उसे इस मंच पर देखकर बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं और युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती नजर आई।

प्रमुख पर्वों की एक-एक कर सजी भव्य झांकियां

  • हरियाली तीज: इस प्रस्तुति में चारों तरफ हरियाली, महिलाओं के हरे परिधान, सखियों के संग झूला झूलने के आनंद और सावन की मस्ती को जीवंत किया गया।
  • रक्षाबंधन: भाई और बहन के पवित्र रिश्ते की डोर को समर्पित इस प्रसंग ने पारिवारिक मूल्यों और स्नेह की गहराई को मंच पर उतारा।
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य और उनकी बाल लीलाओं के सांस्कृतिक मंचन ने दर्शकों को द्वापर युग की याद दिला दी।
  • हरितालिका तीज: माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव के प्रति उनकी अचल आस्था को समर्पित इस प्रस्तुति ने सभी को भावुक कर दिया।
  • गणेश चतुर्थी: विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना, उनके आगमन की खुशी और मंगलकामनाओं के साथ इस सांस्कृतिक यात्रा का समापन हुआ।

मनोरंजन और आधुनिकता का तड़का

पारंपरिक और धार्मिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ इस आयोजन में दर्शकों के मनोरंजन का भी पूरा ख्याल रखा गया था। कार्यक्रम के दौरान आयोजित हाउजी गेम, मनमोहक नृत्य और सामाजिक संदेश देती हुई स्किट (नुक्कड़ नाटक) ने दर्शकों की जमकर तालियां बटोरीं। इन आधुनिक और मनोरंजक गतिविधियों ने कार्यक्रम में एक अलग ही ऊर्जा भर दी, जिससे बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी ने इसका भरपूर आनंद लिया। हालांकि, इन सब के बीच भी कार्यक्रम की मूल आत्मा भारतीय संस्कृति और प्राचीन लोक परंपराओं से ही जुड़ी रही।

सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की पहल

आयोजकों का मानना था कि इस तरह के कार्यक्रम केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि यह हमारी उस सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम हैं जो धीरे-धीरे आधुनिकीकरण की आंधी में पीछे छूटती जा रही है। सावन और भादो के इन पर्वों को सिर्फ कैलेंडर के पन्नों तक सीमित न रखकर, इन्हें लोक स्मृतियों और सामाजिक समरसता के रूप में मनाए जाने का संदेश इस मंच से दिया गया।

सफल संयोजन और प्रबंधन

इस भव्य आयोजन को सफलता के मुकाम तक पहुँचाने में कई समर्पित चेहरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कार्यक्रम का बेहतरीन संयोजन अल्पना अग्रवाल, बरखा जैन, रोशनी अग्रवाल, विनीता अग्रवाल एवं शालिनी अग्रवाल द्वारा किया गया। वहीं आयोजन को सुचारू रूप से चलाने में संस्था के अध्यक्ष सौरभ जैन, महिला संयोजिका संगीता रस्तोगी, सचिव डॉ. अमित कुमार सिंह और जीवन खन्ना का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ।

वाराणसी में हुआ यह आयोजन इस बात का गवाह है कि आज भी हमारी लोक संस्कृति और पर्वों के प्रति लोगों का प्रेम और उत्साह कम नहीं हुआ है, जरूरत है तो बस ऐसे ही मंचों के जरिए उन्हें जीवंत बनाए रखने की।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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